दासता के टीलों में दबे भारत के नव अन्वेषक प्रो. लाल

    दिनांक 02-मई-2020   
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जो देश और समाज अपने पुरखों, अपने संघर्षों , अपमान और गौरव गाथा रचने वालों को भूल जाता है उसका न वर्तमान होता है और न ही भविष्य. हम्पी को जलने वाले , दिल्ली मैं अठारह नरसंहार करने वाले, १५२७ में राणा सांग को हारने के बाद खनुआ में हज़ारों हिन्दुओं के सरों का पहाड़ बनाने वाला बाबर था तो १५६८ में चित्तौडग़ढ़ जीतने के बाद अकबर द्वारा अकेले चित्तोड़ में तीस हज़ार हिन्दुओं का कत्लेआम और पंजाब में सिख-हिन्दुओं पर भयानक अत्याचार और जुल्म हमारे मानस को आंदोलित नहीं करते. इस के साथ ही मुस्लिम और अंग्रेजों के साथ ईसाई जुल्म तथा धर्मान्तरण की त्रासदी ने भारत की काया और मन , दोनों को घायल किया. इनसब दास कालों का एक सबसे बड़ा प्रभाव हमारी मानसिकता और शिक्षा में अपनी विरासत के प्रति हे भाव का निर्माण होने लगा. आज भी दिल्ली को सिर्फ और सिर्फ एक मुस्लिम नगर के रूप में दिखाया जाता है और अंतरार्ष्ट्रीय विरासत दिवस पर २७ हिन्दू-जैन मंदिरों को तोड़ कर बनी क़ुतुब मीनार को देश के गौरव के रूप में प्रदर्शित करने वाले हिन्दू नेता और प्रशासक ही होते हैं.
ऐसे समय में राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाले और गुलामी के खंडहरों में दबी राष्ट्रीय विरासत को उजागर करने वाले पुरातत्वविद राष्ट्र के आचार्य ही मने जाने चाहिए. प्रो ब्रज बिहारी लाल एक ऐसे ही महान पुरातत्वविद हैं जो तक्ष शिला से लेकर हस्तिनापुर और अयोध्या तक मील का पत्थर मणी जाने वाली पुरातात्विक खोजों के लिए प्रसिद्ध हैं. उन्होंने ने ही अयोध्या में राम मंदिर के अवशेष खोज निकले थे जिनके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या निर्णय दिया.
यह आनंद का विषय है कि प्रो. लाल २ मई को सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहें हैं। वे दिल्ली में रहते हैं और अभी भी चैतन्य और अच्छी स्मृति रखते हैं. उनका जीवन भारत में भारत की खोज जैसा ही कहा जा सकता है.
उन्होंने मूलतः अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि के अवशेष खोजे , आर्य आक्रमण अवधारणा झूठी सिद्ध की, दिल्ली के मुस्लिम आवरण में दबी इंद्रप्रस्थ के अवशेष निकाले। उनके शताब्दी वर्ष पर प्रणाम। उनकी दीर्घायु और स्वस्थ जीवन हेतु प्रार्थना। उनके शताब्दी समारोह समिति में देश के मूर्धन्य विद्वान, भारतविद प्रशासक शामिल -#केएनदीक्षित,#बीआरमणि #केकेमुहम्मद #बीएम पांडे #मीनाक्षीजैन #डेविडफ्राले #वसंतशिंदे #डॉ कृष्णगोपाल #अलोककुमार (कार्य। अध्यक्ष वि हि प ) #चम्पतराय (महासचिव वि हि प) #नृपेन्द्रमिश्र (पूर्वप्रमुखसचिव प्रधानमंत्री),
जो देश अपने महान बौद्धिक शिखरों का सम्मान नहीं करता उसका क्या भविष्य होगा ? प्रो ब्रजबासी लाल ने अकेले प्रामाणिक खोजों से महाभारत और रामायण के कालखंड निर्धारित किये और सिद्ध किया दोनों सत्य इतिहास हैं मिथ नहीं. भारत विरोधी वामाच्छादित व पश्चिमी अवधारणाओं के विरुद्ध एक चट्टानी सत्य विद्वत शक्ति का नाम है प्रो। लाल। २ मई को १००वे वर्ष में उनके पदार्पण पर रा स्वसंघ सरकार्यवाह श्री कृष्णगोपाल जी, केंद्रीय संस्कृति मंत्री श्री प्रहलाद सिंह पटेल जी उनका सम्मान करेंगे , उनको प्रणाम करने उनके घर जायेंगे .
वे कौन से प्रमुख पुरातात्विक अन्वेषण थे जिनके आधार पर प्रो लाल को इस सदी का महानतम पुरातत्वविद कहा जा सकता है ? वे क्या कारन थे कि उनको २००० में पद्मभूषण उनको भारत रत्न के लिए भी नामित करने की मांग है ?
दिल्ली को अभी तक एक मध्य युगीन इस्लामिक नगर के रूप में ही प्रचारित और मान्य किया जाता रहा है. स्वदेशी, विदेशी आगंतुकों को केवल हुमायूँ का मकबरा, २७ मंदिरों को तोड़ कर बने क़ुतुब मीनार, लोधी का मकबरा, लाल किला ही दिखाया जाता रहा.
१. प्रो बी बी लाल ने १९५४-५५ में दिल्ली में पुराने किले के पास टीलों में खुदाई शुरू की और वहां महाभारत कालीन अवशेष खोद निकाले। उस क्षेत्र विशेष का राजस्व विभाग के दस्तावेजों में आज भी नाम इंद्रप्रस्थ मौजा है। सम्पूर्ण विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश होगा जहाँ उसकी प्राचीन धरोहर, जो विश्व में सर्वाधिक प्राचीन और अटूट सातत्य वाली एकमात्र सभ्यता है, को दिखाने का एक भी स्थान नहीं बना है जहाँ देस विदेश के आगंतुक हमारी महान धरोहर देख सकें. इसका प्रो लाल को बहुत दुःख है.
२. प्रो लाल ने जर्मनी के विद्वान प्रो मैक्समूलर द्वारा ऋग्वेद की प्राचीनता १२०० ईसापूर्व बताये जाने को मिथ्या साबित किया और कहा कि मैक्समूलर साहब ने गंभीरता से इसका आंकलन नहीं किया। उन्होंने अकाट्य तर्कों और प्रमाणों से ऋग्वेद की कालावधि तीन हज़ार ईसापूर्व पूर्व और उस से भी अधिक पीछे की सिद्ध की।
३. ब्रिटिश मानवशास्त्रियों और पुरातत्वविदों ने भारत में अपने आक्रमण और शासन को सही सिद्ध करने तथा स्थानीय सनातनधर्मी प्राचीन समाज को बाहरी आक्रामक बताकर समाज में विभाजन पैदा करने के उद्देश्य से आर्य आक्रमण अवधारणा प्रचारित की थी. इसको वामपंथियों ने आज तक पढ़ाया और दुर्भाग्य से पढ़ा भी रहे हैं. प्रो लाल ने इस भ्रामक प्रचार को तोडा और सिद्ध किया कि न तो आर्य आक्रामक थे और न ही धीमे धीमे आने वाले प्रवासी। बल्कि आर्य इसी देश के मूल निवासी थे. इसकेसाथ उन्होंने आदिवासी शब्द के मिथ्या प्रयोग को भी ध्वस्त किया क्योंकि जब सभी भारतीय मूल निवासी हैं तो एक वर्ग को आदिवासी कहना दूसरे वर्ग को स्वतः बाहरी, या आक्रामक बता देता है. इसलिए आदिवासी शब्द के स्थान पर केवल जनजातीय शब्द ही प्रयोग करना चाहिए.
उन्होंने पुरातात्विक खोजों से सिद्ध किया कि ऋग्वेद और हड़प्पा सभ्यताएँ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इस प्रकार ऋग्वेदिक लोग ही हड़प्पा सभ्यता के रचयिता थे। उन्होंने सिद्ध किया कि यह कहना कि भारत में आर्य मध्य एशिया से पूर्व की और आये गलत है। वास्तविकता यह है कि प्रायः २००० ईसापूर्व वैदिक लोगों का एक वर्ग भारत से पश्चिम की ओर प्रवास कर रहा था। उन्होंने पश्चिमी तर्क को गलत सिद्ध किया कि ऋग्वेद में जिस वनस्पति का वर्णन है वह ठण्डे क्षेत्रों से सम्बंधित है अतः आर्य पश्चिमी ठण्डे इलाकों से भारत आए होंगे. उन्होंने ऋग्वेद के व्यापक अध्ययन के बाद बताया कि उसमें जिस प्रकार की वनस्पति का उल्लेख है वह पूर्णतः भारतीय उपमहाद्वीप से सम्बंधित है और यहीं पायी जाती है अतः वनस्पति का वर्णन भी यही सिद्ध करता है कि आर्य मूल भारतीय थे.
आज भी अनेक इतिहासकार और साहित्यकार रामायण और महाभारत को एक मिथ और कवि की कल्पना कहते हैं. प्रो लाल ने राम की ऐतिहासिकता सिद्ध की और महाभारत का निश्चित कालखंड बताकर उसके समय के अवशेषों की खुदाई से महाभारत को सत्य निरूपित कर पश्चिमी और वामपंथियों के मुंह बंद कर दिए. अयोध्या में उन्होंने श्री रामजन्मभूमि के अवशेष खोज कर सभी इस्लामिक जिहादी कट्टरपंथियों और वामपंथियों को चुप करा दिया. उन्ही की खोजों पर सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय आधारित है.
उनकी कुछ प्रसिद्ध पुस्तकों में राम तथा राम सेतु की ऐतिहासिकता , महाभारत का कालखंड एवं ऐतिहासिकता , सरस्वती का सतत प्रवाह , दक्षिण एशिया की प्राचीनतम सभ्यता , आर्यों का मूल निवास , आदि हैं.
कालीबंगन और हस्तिनापुर में उनकी पुरातात्विक खोजों ने भारत को विश्व की सबसे प्राचीन और सबसे उन्नत और समृद्ध सभ्यता के रूप में स्थापित किया. उन्होंने कालीबंगन में २००० वर्ष पुरानी हयड्रोलिक इंजीनियरिंग के प्रमाण खोजे और विश्व का प्रथम खेत भी हरप्पा सभ्यता में खोजा .
उनके विषय में , उनके जन्म, डिग्रियों , पुस्तकों, सम्मानों के बारे में एक लेख में सब लिख पाना असंभव है. वे २ मई १९२१ को झाँसी में जन्मे थे। संस्कृत में वेद मुख्य विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम ए किया. सर मोर्टिमर व्हीलर के साथ तक्षशिला में काम किया. १९६८ से ७२ तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक रहे। सन २००० में उनको पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. उन्होंने बीस ग्रन्थ और १५० शोध पत्र लिखें हैं जिन पर उन्हें रूस के संत पीटर्स बर्ग पुरातत्व संस्थान से मानद डिलिट की उपाधि मिली है
वे वास्तव में भारत के नवीन अन्वेषक हैं. शतायु वर्ष में प्रवेश पर उनका अभिनन्दन भारत की विरासत का ही वंदन है