संवेदनशील समाज : यूं बह रही हैसेवा की सरिता

    दिनांक 20-मई-2020
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डॉ. राजेश कुमार 
दिल्ली और सूरत की दो घटनाओं ने बता दिया है कि सेवा करने के लिए न तो अमीर होना जरूरी है और न ही प्रचार की आवश्यकता है। सूरत में धनेश्वर जेना ने अपने बच्चे के नामांकन के लिए जो पैसा जोड़ा था, उसे आम आदमी के पेट भरने में लगा दिया है, वहीं दिल्ली में एक अधेड़ व्यक्ति चुपके से एक झोपड़ी में खाना पहुंचा रहा है
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अपनी रसोई में खाना बनाने की तैयारी करते धनेश्वर जेना और उनके साथी
 
 
मन से भी धनी हैं धनेश्वर
कुछ समय पहले सूरत से सटे उपनगर उधना के पटेल नगर स्थित हेडगेवार बस्ती में ओडिशा से आए धनेश्वर जेना ने अपना बसेरा बनाया। वही उनकी दुकान है, और वही मकान भी। धनेश्वर 12वीं करने के बाद गांव छोड़कर आंखों में कुछ बनने का सपना लिए सूरत की ओर चले पड़ थे। यहां आकर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और सामाजिक सेवा में रत हो गए। एक बेहद सामान्य घर से आए धनेश्वर राष्ट्रप्रेम, मानव सेवा और समाज कल्याण के विचारों से इतने प्रभावित थे कि शादी न करके अपना जीवन संघ के नाम करना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक कारणों से 2015 में उन्हें चिन्मयी नामक कन्या से शादी करनी पड़ी।
 
आज जेना दम्पति का पुत्र आदित्य चार साल का हो गया है। धनेश्वर अपने पुत्र आदित्य को शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहते थे। इसलिए वे कुछ पैसा भी जमा करने लगे। थोड़े-थोड़े से ही उन्होंने करीब 1,25,000 रु. जमा कर लिया था। अभी वे आदित्य का नामांकन कराते कि उससे पहले वैश्विक महामारी आ गई।
 
आसपास की झुग्गी में गरीबी और भूखमरी से जूझते लोगों की दयनीय दशा देखकर धनेश्वर का समाज प्रेम जाग उठा। उन्होंने अपने सुसंस्कृत कोमल ह्रदय को संभालते हुए एक कड़ा फैसला लिया जिसका असर उनके पुत्र के भविष्य पर पड़ सकता है। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक देशव्यापी ‘लॉकडाउन’ रहेगा, तब तक अपने आसपास के निराश्रित परिवारों को निरंतर भोजन सेवा देंगे। उनकी अर्धांगिनी ने उनके इस निर्णय में पूरा सहयोग दिया। धनेश्वर ने 24 मार्च से ही एक सेवा-रसोई शुरू कर दी। रोज 500-600 लोगों का खाना बनाने लगे। उनका यह प्रयत्न निरंतर चलता रहा और लोग जुड़ते गए। आज भी वहां प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को भोजन, रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ाने वाला काढ़ा और बच्चों को दूध परोसा जा रहा है।
 
वे प्रतिदिन अपने परिवार के साथ घर में ही संघ की प्रार्थना करते हैं। धन्य है भारत माता का यह सुपुत्र और उनका परिवार, जो इस कठिन परिस्थिति में उनका साथ दे रहा है। जब तक ऐसे स्वयंसेवक नागरिक समाज में हैं, निश्चित ही हम किसी भी आपत्ति को हरा सकते हैं।
 
सेवा ही पूजा
‘लॉकडाउन’ के शुरुआती चरण होने के कारण लोगों के मन में भय, घबराहट और एक अजीब तरह की बेचैनी चल रही थी। साधन संपन्न लोग महीने-दोे महीने तक का राशन एवं अपने रोजमर्रा के सामान को घर में जमा करने लगे थे। इस सबके बीच सबसे बड़ी गाज उन लोगों पर गिरी, जो सड़क पर सुविधाविहीन जीवन जीने को अभिशप्त हैं। सहस्राब्दी के सबसे कठिन काल ‘कोरोना काल’ के इस विकट परिस्थिति में यूं तो सरकार, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों द्वारा एवं व्यक्तिगत रूप से भी काफी व्यापक स्तर पर काम किया जा रहा है। ऐसा ही एक काम दिल्ली के रोहिणी में देखने को मिला।
 
रोहिणी को दिल्ली ही नहीं, परंतु एशिया की सबसे व्यवस्थित रूप से बसाई गई आवासीय कॉलोनी के रूप में जाना जाता है। इसलिए यहां आपको झुग्गी बस्तियां देखने को नहीं मिलेंगी। परंतु सड़क किनारे, फ्लाईओवर के नीचे यदा-कदा अन्य स्थानों पर कुछ साधनहीन लोग आपको अवश्य ही दिख जाएंगे। रोहिणी सेक्टर 18 और सेक्टर 15 के बीच में एक छोटी-सी नहर बहती है।
 
जैसा कि हम सभी जानते हैं, हिंदू मान्यताओं में नदी, तालाब आदि का विशेष महत्व है। आमतौर पर लोग इस नहर पर रोज सुबह-शाम पूजा, स्नान करने एवं पूजा आदि की सामग्री विसर्जित करने, गाय को रोटी खिलाने आया करते हैं। उसी नहर के एक किनारे एक बूढ़ा आदमी प्लास्टिक की एक छोटी झुग्गी बनाकर बैठा रहता है। झुग्गी इतनी छोटी कि सिर्फ एक आदमी घुटने के बल उसमें प्रवेश कर सकता है। ऐसी स्थिति में इसमें भला चूल्हा कैसे जलेगा और चूल्हा नहीं जलेगा तो खाना बनने का सवाल ही नहीं है।
 
उन दिनों सड़क पर लगाए गए अवरोध और पुलिस की सख्ती के कारण लोगों की आवाजाही भी न के बराबर हो गई थी। बड़े समूह में फुटपाथ पर जीवन बसर करने वालों पर लोगों का ध्यान अक्सर चला भी जाता है, परंतु कम चलताऊ फुटपाथ पर अकेले रहने वाले लोगों पर ध्यान कम ही जा पाता है। लेकिन कहते हैं न कि ईश्वर सबका ख्याल रखता है। ईश्वर की कृपा से उस बूढ़े पर एक समाजसेवी की दृष्टि पड़ी है। अक्सर रोज सुबह देखता हूं कि एक गाड़ी उस झुग्गी के पास आकर रुकती है। उसमें से एक तिलकधारी, जो अपने चेहरे को भगवा गमछे से ढक कर रखता है, अधेड़ उम्र का आदमी अपने हाथों से उस भिखारी को खाने की थैली थमा कर आगे बढ़ जाता है। पिछले लगभग डेढ़ महीने से यह घटनाक्रम अनवरत चल रहा है।
 
दूसरी घटना पुलिस वालों से जुड़ी हुई है। रोहिणी पश्चिम मेट्रो स्टेशन से स्वर्ण जयंती पार्क के साथ सेक्टर 15 की तरफ आने के क्रम में सेक्टर 15 के समीप नट जाति के तीन-चार परिवार फुटपाथ पर ही अपना डेरा जमाए हुए हैं। पुलिस नाके से बमुश्किल 20-25 मीटर की दूरी पर ये लोग रह रहे हैं। प्रत्येक परिवार में पांच-छह लोगों के साथ-साथ एक-दो कुत्ते और बंदर भी हैं। इनके घर में लकड़ी के अस्थायी चूल्हे, जो मिट्टी से बने हुए हैं, ‘लॉकडाउन’ के कारण जल नहीं पा रहे थे।
 
जब पुलिस वालों को इसकी जानकारी हुई तो वे लोग इन्हें राशन देने लगे। जब भी उस सड़क से जरूरी काम से गुजरता हूं तब उन नट परिवारों के बच्चों को अपने कुत्तों और बंदर के साथ बेफिक्र होकर खेलते हुए देखकर दिल्ली पुलिस का मानवीय चेहरा एकदम से सामने आ जाता है। आमतौर पर पुलिस की कठोर छवि ही हम सबके जेहन में होती है। लेकिन अब यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ‘लॉकडाउन’ को प्रभावी रूप से लागू करवाने में पुलिस के डंडे के डर से ज्यादा कारगर उनका यह मानवीय चेहरा साबित हो रहा है।
 
इन तीनों घटनाओं से एक बात सिद्ध होती है कि सेवा करने के लिए कोई उम्र नहीं होती है और न ही धनी होने की आवश्यकता है। यदि आपके मन में सेवा की भावना है, तो आप साधनविहीन होते हुए भी सेवा कर सकते हैं। 
सूरत से युवराज और दिल्ली से