भारत के सबसे शुरुआती आर्थिक चिंतकों में से एक थे बाबासाहेब

    दिनांक 20-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 39:-

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भीमराव आंबेडकर 20वीं सदी में अर्थशास्त्र की एडवांस ट्रेनिंग करने वाले गिने-चुने विद्यार्थियों में एक थे। 20 जुलाई, 1913 से उन्होंने अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से अपनी पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई शुरू की थी। पोस्ट ग्रेजुएशन में उनका विषय- ‘एडमिनिस्ट्रेशन आफ फाईनेंस आफ ईस्ट इंडिया कंपनी 1792 से 1822’ था, जिसमें कंपनी के अंधाधुंध शोषण के कारण भारत की आर्थिक दयनीयता में बढ़ोतरी होने का सजीव चित्रण था। उनके शीर्ष ग्रंथ- ‘द इवोल्यूशन आफ प्रोविंशियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ में वंचितों को लेकर उनकी वेदना स्पष्ट नजर आती है। यह पुस्तक ब्रिटिश इंडिया के सन् 1833 से 1921 के बीच केन्द्र व राज्यों के बीच आर्थिक संबंधों को उजागर करती है। इसमें भूमिकर, नमक कर, स्टाम्प ड्यूटी जैसे घातक करों के कारण उत्पन्न हुई आर्थिक पद्धति की खामी, शिक्षण पर खर्च की बजाए गैर उत्पादन खर्च पर ध्यान दिलाया गया है और सौंपे गए काम, सौंपी गई आवक एवं विभाजनयुक्त आर्थिक योजना के साथ-साथ आर्थिक विकेन्द्रीकरण के जरिए गरीबों के उद्धार पर जोर दिया गया है।
उभरते युवा अर्थशास्त्री
आंबेडकर ने वर्ष 1917 में 26 वर्ष की उम्र में अर्थशास्त्र में शोध किया। उनके शोध का विषय ‘नेशनल डिविडेंड आफ इंडिया- ए हिस्टोरिक एंड एनालिटिकल स्टडी’ था, इसमें ब्रिटिश शासन की आलोचना होने से अवरोधों के बीच 1925 में ‘इवोल्यूशन आफ प्रोविंशियल फाईनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ नाम से इनकी पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में ब्रिटिश सरकार की आर्थिक पद्धति के संपूर्ण केन्द्रीयकरण एवं सरेआम इसकी निष्फलता का तथ्यात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया। डॉ. आंबेडकर ने केन्द्र व राज्यों के बीच आर्थिक संबंधों के साथ कई अहम पहलुओं को भी उजागर किया। उनकी दलील थी कि रेलवे, रोड, कैनाल जैसे सार्वजनिक सुविधा वालों कामों पर किसी भी दलीय व्यवस्था की ओर से किए गए खर्च के आधार पर उसका आकलन हो। क्योंकि सन् 1834 से 1848 के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से भारत में किया गया संपूर्ण खर्च मानचेस्टर शहर की जलापूर्ति पर किए गए खर्च से कम था।
इस तथ्य को उजागर कर आंबेडकर ने ब्रिटिश लोगों की ओर से भारतीयों पर किए जाने वाले अन्याय का पर्दाफाश किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि सन् 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त करने के बाद उसकी भारत की देनदारी का सारा भार कंपनी की कारस्तानी से भारत के गरीबों पर लाद दिया गया।