महामारी पर भारी राजनीति

    दिनांक 20-मई-2020
Total Views |
राजेश प्रभु सलगांवकर
मुम्बई बचाओ अभियान की इस तीसरी कड़ी में उद्धव की खिचड़ी सरकार की ढुलमुल नीतियों से मुम्बई में कोरोना वायरस संक्रमण बढ़ते जाने का खुलासा किया जा रहा है। काबू से बाहर हो रहे हालात वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं ने और बिगाड़ रखे हैं। उनकी शह पर ‘लॉकडाउन’ मजाक बन कर रह गया है
WX_1  H x W: 0  
महामारी को न्योता: मुम्बई में सड़क किनारे लगी सब्जी मंडी। ‘लॉकडाउन’ के बावजूद जगह-जगह ऐसी भीड़ दिखती है।
 
मुम्बई में स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। इस समाचार के लिखे जाने तक यहां कोरोना वायरस पीड़ितों की संख्या 15,000 पार कर गई है। रोजाना 1,000 से 1,200 तक मरीज बढ़ रहे हैं। मुम्बई की सबसे बड़ी समस्या वे छोटे घर, घनी बस्तियां और छोटी-छोटी गलियों में बसे बाजार हैं, जहां ‘सामाजिक दूरी’ का पालन नहीं हो पा रहा है। कहीं तो लोग हर कष्ट झेलकर भी घरों में रह रहे हैं, वहीं कुछ इलाकों में लोग मानो महामारी फैलाने के लिए घरों से निकल कर घूमते रहते हैं। ये लोग न तो ‘लॉकडाउन’ को मान रहे हैं और न ही किसी कानून को।
 
शुरू से अव्यवस्था
‘लॉकडाउन’ के पहले दिन से ही मुम्बई के बाजारों में अव्यवस्था बनी हुई है। जो दुकानदार पहले से ही ग्राहकों के घर सामान पहुंचाते थे, उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया गया। इस कारण लोगों को आवश्यक वस्तुओं के लिए घर से निकलना पड़ा और ‘सामाजिक दूरी’ की धज्जियां उड़ीं। पहले तो दूध भी बंद करा दिया गया था, लेकिन बाद में घर-घर दूध पहुंचाने की अनुमति मिल गई। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं को भी घर तक पहुंचाने से मना कर दिया गया। इस कारण भी लोग अपने घरों से निकले। सब्जी मंडियों में भी लोग आते-जाते रहे।
 
मंडियों में ‘सामाजिक दूरी’ के पालन पर जोर नहीं दिया गया। इन कारणों से मुम्बई में वायरस का फैलाव हुआ, जो कम होने का नाम नहीं ले रहा है। दुकानदारों को लेकर विभिन्न सरकारी विभागों में कोई समन्वय नहीं दिख रहा है। एक विभाग कुछ कहता है और दूसरा कुछ और। इस कारण लोगों में भ्रम की स्थिति बनी रहती है और इसका लाभ वायरस उठा रहा है। यदि सरकार दुकानदारों को घर-घर सामान पहुंचाने की अनुमति देती तो शायद बाजारों में भीड़ नहीं होती। मुम्बई में आम लोगों के घर बहुत ही छोटे होते हैं। उनमें घर के सदस्य ही बहुत मुश्किल से रह पाते हैं। ऐसी स्थिति में कुछ महीनों का राशन खरीदकर घर में रखना संभव नहीं है। इसलिए ज्यादातर लोग अपनी आवश्यकतानुसार राशन खरीदते हैं। बहुत लोग तो प्रतिदिन राशन खरीदते हैं। इस कारण भी बाजारों में भीड़ बनी ही रहती है। मुम्बई में जनसंख्या के हिसाब से सब्जी मंडियां कम हैं। आम तौर पर सब्जी विक्रेता सड़क किनारे ही सब्जी बेचते हैं। इनमें से ज्यादातर के पास लाइसेंस होते हैं। जब प्रशासन ने इन्हें भी सब्जी की दुकान लगाने से मना कर दिया तो लोग सब्जी खरीदने के लिए दूर-दूर तक जाने लगे। इस वजह से भी मरीजों की संख्या बढ़ी है।
 
मुम्बई में किराना सामान की आपूर्ति नवी मुम्बई में वाशी स्थित कृषि उत्पन्न बाजार समिति (एपीएमसी) मंडी के माध्यम से होती है। यह इतनी बड़ी है कि यहां से पूरे महाराष्ट्र के साथ कई अन्य राज्यों में भी अनाज और फलों की आपूर्ति होती है। यहां शुरू में ही 15 वायरस पीड़ितों की जानकारी मिली थी। इसके बावजूद मंडी को बंद नहीं किया गया। अब पता चला है कि इस मंडी में 150 से अधिक लोग वायरस से पीड़ित हैं। इस मंडी को बंद नहीं करने के पीछे भी राजनीतिक दल हैं। बता दें कि ज्यादातर कृषि मंडियों की समितियों पर एनसीपी और कांग्रेस का प्रभाव है। हालांकि ऐसी मंडियों को पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, इसलिए उनमें सरकार को विशेष सावधानी रखने की जरूरत थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
 
होमियोपैथी और आयुर्वेद की दुकानें बंद
वर्तमान वायरस के उपचार में देशभर में होमियोपैथी तथा आयुर्वेद की औषधियों का अच्छा उपयोग हो रहा है। जर्मनी तथा ईरान में भी वायरस पीड़ितों को होमियोपैथी की दवा दी जा रही है। पर महाराष्ट्र सरकार ने इन दोनों पद्धतियों की दवाई दुकानें बंद करवा दी हैं। कुछ दिन पहले इन्हें खोलने की अनुमति दी गई है, पर ये दुकानें ज्यादातर समय बंद ही रहती हैं। इसके बावजूद महाराष्ट्र सरकार ने सभी पुलिसकर्मियों को वायरस से बचाने के लिए होमियोपैथी औषधि देने का निर्णय लिया है।
 
घर तक पहुंचाई जाएगी शराब!
अनाज, सब्जी, दवाई आदि को घर-घर पहुंचाने की अनुमति नहीं देने वाली महाराष्टÑ सरकार ने घर-घर शराब पहुंचाने का निर्णय लिया है। अधिकांश नागरिकों ने इस निर्णय का विरोध किया है। भाजपा प्रदेश के चंद्रकांत दादा पाटिल ने कहा है कि सरकार शराब की जगह अन्य आवश्यक वस्तुओं को घर-घर पहुंचाने की व्यवस्था करे।
 
मनपा आयुक्त पर ठीकरा
अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए राज्य सरकार ने सारा दोष मुम्बई नगर पालिका (मनपा) पर मढ़ दिया है। मनपा के आयुक्त प्रवीण परदेशी का तबादला कर दिया गया है। उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे के करीबी माने जाने वाले इकबालसिंह चहल को आयुक्त बनाया गया है। प्रवीण परदेशी ईमानदार अधिकारी माने जाते हैं। उनके समय ही तय हुआ था कि वायरस से मरने वाले सभी लोगों के शवों को, चाहे वे किसी भी मत-मजहब के हों, जलाया जाएगा। लेकिन निर्णय के कुछ घंटे बाद ही मंत्री नवाब मलिक के दबाव पर उस फैसले को वापस ले लिया गया था। चर्चा है कि राज्य के मुख्य सचिव अजय मेहता और प्रवीण परदेशी के बीच चल रही अनबन के कारण परदेशी को मनपा आयुक्त के पद से हटाया गया है।
 
मुम्बई तथा महाराष्ट्र को महामारी में झोंकने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार गृहमंत्री अनिल देशमुख तथा स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे को माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि ये दोनों दोषी तब्लीगियों के विरुद्ध कोई भी कार्रवाई नहीं होने देते हैं और इस कारण उनकी मनमानी चल रही है। यही कारण है कि मुस्लिम-बहुल इलाकों में ‘लॉकडाउन’ केवल एक मजाक बन कर रह गया है। इसका खामियाजा मुम्बई सहित पूरा महाराष्ट्र भुगत रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जिस प्रशासनिक तंत्र को इस महामारी के समय कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहिए, वह आपस में ही लड़ रहा है।
 
लोग कह रहे हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों पर मुख्यमंत्री की कोई पकड़ नहीं रह गई है। अधिकारी सत्तारूढ़ किसी ने किसी राजीतिक दल या नेता के चहेते हैं, और वे इसलिए मुख्यमंत्री की बातों को भी गंभीरता से नहीं लेते हैं। आशा है कि सरकार स्थिति की गंभीरता को समझेगी और वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर लोगों को महामारी से बचाने के लिए कोई ठोस कार्य करेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)