भारत-वापसी का वैश्विक अभियान

    दिनांक 20-मई-2020
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सत्यवतीनन्दन
 
कोरोना वैश्विक महामारी ने लोगों को असुरक्षा से भर दिया है। विभिन्न कार्यों से विदेशों में गये भारतीय भारत लौटने को बेताब हैं। उनकी इच्छा को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने विश्व का सबसे बड़ा वतन वापसी का अभियान छेड़ा है
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 वंदे भारत मिशन के अंतर्गत कुआलालम्पुर से कोच्चि आने वाली एयर इंडिया की उड़ान से देश लौट रहे भारतीय प्रसन्न मुद्रा में
24 मार्च को जब कोरोना वायरस महामारी के कहर से भारत को बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी ने 4 घंटे के नोटिस पर पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की थी तो शायद ही भारत में ज्यादातर लोगों को कोविड-19 की गंभीरता का अहसास हुआ होगा। कुछ आवाजें इसके विरोध में उठीं, लेकिन जल्द ही दुनियाभर से आ रही भयावह तस्वीरों और आकड़ों ने इस लॉकडाउन को सही साबित कर दिया। करीब 50 दिन से चल रहा यह लॉकडाउन बहुत से जीवन को बचाने में तो कामयाब रहा, लेकिन जीवनचर्या को इसने बहुत हद तक तहस-नहस कर दिया।
 
भारत सरकार के आंकड़े के अनुसार, करीब 2.80 करोड़ भारतीय मूल के लोग विदेशों में रहते हैं, जिनमें 1.70 करोड़ के करीब अनिवासी भारतीय (नॉन रेजिडेंट इंडियन) और बाकि ओसीआई (ओवरसीज सिटीजन आॅफ इंडिया) कार्डधारक हैं। इनमें से बहुत से शिक्षा, रोजगार, व्यापार और पर्यटन के लिए विदेश जाते हैं। कुछ यही कहानी भारत के अंदर की भी है। भारत के नागरिक पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में शिक्षा, रोजगार और पर्यटन के लिए जाते हैं। लोकतांत्रिक देश है। आप कहीं भी जा सकते हैं, कहीं भी रह सकते हैं। अंदरूनी आवाजाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय रेल प्रतिदिन 2.30 करोड़ यानी आॅस्ट्रेलिया की आबादी बराबर यात्रियों को अपने गंतव्य तक ले जाती है।
 
दुनियाभर में कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन ने करोड़ों लोगों का रोजगार छीन लिया। इससे विदेश और देश दोनों में रहने वाले भारतीय भी अछूते नहीं हैं।
 
विदेशों में रह रहे भारतीयों को रोजगार न रहने की सूरत में बिना किसी सरकारी मदद के अपनी बचत पर ही निर्भर रहना है। ऐसे में कोरोना वायरस को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण बड़ी संख्या में लोग वापस भारत लौट जाना चाहते हैं। भारत के संघीय ढांचे के हिसाब से लॉकडाउन के आदेश के बाद प्रत्येक राज्य को अपने यहां के निवासियों के लिए भोजन और दूसरे प्रबंध सुनिश्चित करने थे। इसके लिए केंद्र सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये का प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज दिया, जिसके तहत गरीबों को गेहूं, चावल और दाल के अलावा महिलाओं, वृद्धों और किसानों को नगद मदद भी दी गई। लेकिन कई राज्यों की सरकारों के गैर-जिम्मेदाराना रुख के कारण प्रवासी श्रमिकों को न तो ठीक से सुविधाएं दी गईं और न ही जानकारी। कई जगह तो फैक्ट्रियां और बाजार बंद होने के कारण इन प्रवासी श्रमिकों को वापस अपने राज्य लौट जाने के लिए उकसाया भी गया।
 
ऐसे में जगह-जगह से श्रमिकों के बिना किसी यातायात साधन के सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर के लिए पैदल ही निकल जाने की तस्वीरें सामने आने लगीं। यूएसपी यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ व्याख्याता अमित सरवल बताते हैं कि इसमें भारतीय मीडिया की भी बेहद खराब भूमिका रही। उनके अनुसार, प्रवासी श्रमिकों के बड़ी संख्या में सड़क पर आने की शुरुआत देश की राजधानी दिल्ली में फैली अफवाह से हुई। टीवी चैनल पर गलत जानकारी के साथ इसे दिखाया गया, जिससे स्थिति और खराब हो गई। उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों ने अपने संसाधनों के बल पर बेहतरीन काम किया, लेकिन ज्यादातर राज्य प्रवासी श्रमिकों को मूल राज्य की समस्या मान कर उन्हें अपने यहां से जाने देने को ही समस्या का समाधान मान बैठे। खैर, पहली मई से शुरू हुई श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से कुछ राहत तो मिली, लेकिन सही जानकारी के अभाव में पैदल यात्रा कर रहे श्रमिक और उनके परिवारों की त्रासद स्थिति की तस्वीरें आती रहीं।
 
अंतत भारत सरकार के गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को राज्य सरकारों को पत्र लिखकर कहना पड़ा कि अगर कहीं भी प्रवासी मजदूर पैदल जाते दिखे तो उन्हें सीधे पास के शेल्टर में ले जाया जाए। वहां उनके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था की जाए। इसके बाद श्रमिक एक्सप्रेस या बस से उन्हें उनके घर तक पहुंचाया जाए। भारत सरकार के सचिव के इस पत्र में ऐसी कोई बात नहीं लिखी गई थी, जिसे सामान्य समझ रखने वाला प्रशासनिक अधिकारी खुद न समझ सके। ऐसे में राज्य सरकारें और उनका पूरा प्रशासन तंत्र यह बात क्यों नहीं समझ सका? दरअसल इस आपदा के समय भी भारत में राज्य सरकारें राजनीतिक फायदे और नुकसान के आधार पर अपने फैसले लेती दिखती हैं। भारतीय रेलवे द्वारा सभी श्रमिक ट्रेनों के किराये का 85 प्रतिशत खुद सहन करने और बाकी 15 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा उठाए जाने के स्पष्ट आदेश के बाद भी किराये को मुद्दा बनाकर आर्थिक संकट का सामना कर रहे श्रमिकों को डराने की कोशिश की गई। अमित सरवल मानते हैं कि महाराष्ट्र में हुआ ट्रेन हादसा इसका एक उदाहरण है। बावजूद इसके 1 मई से अब तक करीब 366 श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों का संचालन किया गया है और इनमंक करीब चार लाख से ज्यादा प्रवासी श्रमिकों उनके घर तक पहुंचाया गया है। इस बीच, भारतीय रेलवे ने सामान्य ट्रेनों के परिचालन को दोबारा से शुरू करने की घोषणा भी कर दी है।
 
वहीं, विदेश में रह रहे भारतीय भी बदली परिस्थिति में अपने देश लौट जाना चाहते हैं। उनके लिए भी भारत सरकार ने तीन चरण के ‘वंदे भारत मिशन’ के तहत एयर इंडिया और उसकी सहायक एयर इंडिया एक्सप्रेस द्वारा करीब 70 देशों से दो लाख भारतीयों को वापस लाने की मुहिम शुरू की है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार, पहले चरण में विदेश में फंसे 14,800 भारतीयों को वापस लाया गया। दूसरा चरण 16 मई से शुरू होगा। आने वाले हफ्तों में उड़ानों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। दुनियाभर में फैले भारतीय दूतावास और महावाणिज्य दूतावासों द्वारा स्वदेश लौटने की योजना बनाने वाले भारतीयों की सूची बनाई जा रही है। भारतीय द्वारा किए जाने वाले आॅनलाइन पंजीकरण के आधार पर यह सूची बनाई जा रही है। सूचना के इस दौर में भी पूरी जानकारी एक स्थान पर मिलने का अभाव यहां भी देखने को मिला।
 
अमित सरवल बताते हैं कि मध्य-पूर्व के देशों में ही करीब 3 लाख लोगों ने वापसी केलिए पंजीकरण कराया है। ऐसे में सरकार द्वारा तय किये गए मानकों के आधार पर बहुत से वापस लौटने के इच्छुक लोग पहली खेप में वापस नहीं आ पाएंगे। इन सभी को परिस्थितियों को ध्यान में रख कर सही सूचना उपलब्ध कराना बेहद आवश्यक है। अमित सरवल कहते हैं कि भारत सरकार को वंदे भारत मिशन एप लांच करना चाहिए था, जिससे वापसी के इच्छुक लोगों को पंजीकरण करने में ओर जानकारी हासिल करने में आसानी होती। कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए रेलवे हो या एयर इंडिया, दोनों ही जगह बोर्डिंग के समय सभी यात्रियों को थर्मल स्क्रीनिंग होगी। जिन यात्रियों में कोरोना के लक्षण नहीं पाए जाएंगे, उन्हें ही यात्रा की अनुमति दी जा रही है।
 
विदेश में रह रहे लोगों को वैसे तो सामान्य परिस्थिति में लुधियाना, मेरठ, सूरत या पुणे से निकल कर न्यूयॉर्क, लंदन, सिडनी और सिंगापुर खूब भाते हैं, लेकिन इस आपदा में बड़ी संख्या में लोग बस घर (भारत) लौट जाना चाहते हैं। भारत के अंदर भी कहानी बिल्कुल ऐसी ही है। समस्तीपुर, बलिया, मेवात और शहडोल से शिक्षा और रोजगार के लिए बड़े शहरों में पहुंचे लोग भी इस अनिश्चितता के माहौल में सिर्फ घर लौटना चाहते हैं। अधिकतर लोगों का कहना है कि घर पर जो भी स्थिति होगी, वह उन्हें स्वीकार्य है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)