टीआरएफ़-कश्मीर में आतंक का नया पाकिस्तानी मुखौटा

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टीआरएफ़ (द रेसिस्टेंस फ्रंट) के जरिए आईएसआई कश्मीर में मृतप्राय हो चुके जिहादी तंत्र को एक नया नाम देकर खड़ा करने का प्रयास कर रही है।
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बीते वर्ष में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जम्मू—कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त करते हुये इसे दो केंद्र शासित क्षेत्रों में बांट दिया गया। यह कश्मीर में बढ़ते इस्लामिक आतंक को समाप्त करने और कश्मीरी खिलाफत की स्थापना को रोकने की दिशा में एक अपरिहार्य सामरिक कदम था। इस निर्णय के बाद तो मानों पाकिस्तान में उथल—पुथल आ गया। इमरान की गीदड़ भभकी से लेकर मुस्लिम मुल्कों के आगे गिड़गिड़ाने के बाद भी जब उन्हें कोई सफलता नहीं तो सीमा पार से आतंकी घुसपैठ और प्रोपेगंडा का उन्होंने सहारा लिया। लेकिन भारत ने उनके हर पैंतरे को न केवल काटा बल्कि उचित जवाब दिया। तो दूसरी तरफ भारत ने दुनिया के सामने पाकिस्तान की आतंकियों के देश की छवि को बड़े दमदारी और तथ्यों के साथ रखा। दुनिया ने भी इस बात को माना और पाकिस्तान को न केवल लताड़ा बल्कि वैश्विक संस्थाओं ने उसकी मुश्के कसनी शुरू कर दीं। इस दौरान उसने फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स (एफ़एटीएफ़) के सामने यह दर्शाने की कोशिश की कि वह आतंकियों को नहीं पालता है। लेकिन यह महज दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं था।
कश्मीर पर मुंह की खाने के बाद भी पाकिस्तान घाटी को अशांत करने का अभी भी कोई मौका नहीं चूकता है। दुनिया की नजरों से बचने और कश्मीर में जिहाद जारी रखने के लिए आईएसआई ने पाकिस्तान पोषित जिहादी समूहों का संयुक्त नामकरण टीआरएफ़ (द रेसिस्टेंस फ्रंट) कर दिया। टीआरएफ़ का इस्लामिक नाम न रखकर अंग्रेज़ी नाम और ट्विटर अकाउंट उसके अधिक अंतर्राष्ट्रीय ध्यानाकर्षण के मद्देनजर किया गया है। पाकिस्तान के इस नए आतंकी समूह के कश्मीर स्थित सदस्य हिजबुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर—ए—तैयबा और अल-बदर हैं। इस संयुक्त आतंकी समूह, टीआरएफ़ को पाकिस्तान द्वारा पंथनिरपेक्ष और स्थानीय कश्मीरी दिखाने के प्रयास के पीछे कश्मीरी मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना है। टीआरएफ़ का गठन पाकिस्तान की पुरानी सामरिक नीति का अंग है, जहां वह आर्थिक प्रतिबंधों के भय से आतंकी संगठनों की रिब्रांडिंग करता आया है, जिसके पीछे उसके शक्तिशाली अंतर्राष्ट्रीय मित्र राष्ट्रों की पर्दे के पीछे की चेतावनियाँ भी रहती हैं।
 
इस संगठन की शुरुआत टेलीग्राम पर कश्मीर में सक्रिय इस्लामिक आतंकी संगठनों के मुखपत्र के रूप में हुई। यह 12 अक्टूबर से कश्मीर में हो रही सभी आतंकी हिंसक घटनाओं की ज़िम्मेदारी लेना शुरू करता है। साउथ एशिया आतंकी पोर्टल (एसएटीपी) के अनुसार 12 अक्टूबर, 2019 में इसके आने के बाद से 17 लोगों की हत्या हुईं जिसमें 16 सुरक्षा बलों और 1 सामान्य नागरिक की बात स्वीकार करते हुये यह अपने 7 आतंकियों के मरने की बात भी स्वीकार करता है। इस प्रकार यह कश्मीर के विभिन्न आतंकी संगठनों के सभी चिन्हित आतंकियों के हमलों की ज़िम्मेदारी लेकर एक नए संयुक्त संगठन के गठन की घोषणा का प्रयास करता है।
इस्लामिक आतंकवाद को नए नाम के साथ प्रस्तुत करने का यह पुराना पाकिस्तानी अनुभव है। पूरे दक्षिण एशिया में उसके इस्लामिक आतंकी संगठन सामयिक अंतर्राष्ट्रीय दबावों के साथ अपनी पहचान बदलते आए हैं। अफगानिस्तान और भारत के लिए यह एक सामान्य घटना है। 1980 के दशक से लेकर अब तक अनेक जिहादी संगठन जन्में और समाप्त हुये। जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार टीआरएफ़ द्वारा जिन आतंकियों के उससे संबन्धित होने की बात स्वीकारी गयी वह सभी आतंकी लश्कर-ए-तैयबा आतंकी संगठन के थे। यह संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ही बदला हुआ नाम है, जो कश्मीर में सभी आतंकी संगठनों के अभियानों का समन्वय करेगा।
 
यह संगठन लश्कर को संचालित करने वाले तीन प्रमुख सरगनाओं द्वारा ही नियंत्रित है। आईएसआई और पाकिस्तानी सेना इस नए संगठन के माध्यम से कश्मीर के सभी आतंकी अभियानों को नियंत्रित करेंगे, जिससे वर्तमान समय में इस संगठन से उसके संबंध स्थापित करने में समय लगे। यह सब कार्यवाई पाकिस्तान द्वारा 21 से 26 जून को बीजिंग में होने वाली एफ़एटीएफ़ की बैठक में उसके ऊपर लग रहे आतंकी संगठनों की सहायता के आरोपों से बचने के लिए है। कई महीनों से एफ़एटीएफ़ द्वारा पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने का विषय चर्चा में बना हुआ था परंतु फिर भी वह अभी तक छूटता आया है। कोरोना के कारण एफ़एटीएफ़ की यह बैठक भी आगे बढ़ रही है। ऐसे में तब तक पाकिस्तान और आईएसआई टीआरएफ़ के जरिए कश्मीर में इस्लामिक आतंकी संगठनों के प्रशिक्षण और अभियानों को सुदृढ़ करने में लगा हुआ है।
टीआरएफ़ ने अभी तक जिन आतंकी घटनाओं की ज़िम्मेदारी ली है, वह सभी अभियान आतंकियों के पहले से बेहतर प्रशिक्षण और मनोबल को इंगित करते हैं। कश्मीरी आतंकी अब प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तानी वीजा लेकर अटारी के रास्ते ही जाने लग गए हैं और कई बार तो प्रशिक्षण के बाद इसी रास्ते से वापसी भी करते हैं।
 
यह जानकारियां धीरे-धीरे खुफिया सूत्रों से मिल रही हैं। अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया के लिए दोहा शांति समझौते में पाकिस्तान की भूमिका के बदले अमेरिका उसे कुछ सामरिक छूट अवश्य देगा या उसके दुष्कृत्यों से आंखें हटा सकता है। आने वाले लगभग एक वर्ष में अमेरिका अपने वैश्विक सैन्य संगठन के साथ अफगानिस्तान से बाहर होगा और यह समय पाकिस्तान के अफगानिस्तान और भारत में अपने सामरिक इस्लामिक आतंकी संगठनों को उन्मुक्त छोड़ने का समय होगा।
 
जैसा कि उसने 1989 में सोविएत-अफगान युद्ध की समाप्ति पर किया था। कश्मीर में 1990 के दशक में इस्लामिक आतंक की वृद्धि लगभग इन्हीं क्षेत्रीय राजनीतिक और भू-सामरिक परिस्थितियों में हुयी थी। परंतु इस बार भारत में राजनीतिक और सामरिक परिस्थितियां अवश्य बदली हैं।
उल्लेखनीय है कि थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरावने ने टीआरएफ़ को टेरर रिवाइवल फ्रंट का सही नामकरण दिया है क्योंकि आईएसआई कश्मीर में मृतप्राय हो चुके जिहादी तंत्र को एक नया नाम देकर खड़ा करने का प्रयास कर रही है। वह उसकी हिंसक आक्रामकता से युवाओं को जुडने के लिए प्रेरित करना चाहती है। उन्होने कहा कि इस समय बढ़ती आतंकी घटनाओं का प्रमुख कारण बदलता मौसम भी है क्योंकि बर्फ पिघलने के दौरान सीमा पार से आने वाले आतंकियों की घुसपैठ की राह आसान हो जाती है। साथ ही साथ रमजान का महीना भी जिहादी आतंक में वृद्धि का प्रमुख कारण रहा है। इस महीने में मरना प्रत्येक जिहादी की इच्छा रहती है। ऐसे में भारतीय सेना यकीनन उन्हें मार गिराकर उनके मंसूबे को पूरा कर भी रही है।