दुनिया का सबसे अधिक देखा जाने वाला धारावाहिक ‘रामायण’ इन वजहों से बना भव्य

    दिनांक 20-मई-2020
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डॉ. संतोष कुमार तिवारी 
‘रामायण’ की शूटिंग शुरू करने से पहले रामानंद सागर चार दिनों के लिए गोरखपुर आए थे। यहां उन्‍होंने गीता प्रेस के लीला मंदिर में मौजूद सैकड़ों देवी-देवताओं की तस्‍वीरें देखीं। उसी के आधार पर उन्‍होंने अपनी धारावाहिक के पात्रों की पोशाक, उनके रंग और आभूषणों का चुनाव किया।
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हाल ही में रामानंद सागर द्वारा निर्मित ‘रामायण’ धारावाहिक का तीस साल बाद दूरदर्शन पर पुनर्प्रसारण हुआ। इसने टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और दुनिया का सबसे अधिक देखा जाने वाला धारावाहिक बन गया। 16 अप्रैल,2020 को सर्वाधिक 7.70 करोड़ लोगों ने इसे देखा। खास बात यह है कि ‘रामायण’ बनाने से पहले रामानंद सागर चार दिनों के लिए गोरखपुर स्थित गीता प्रेस आए थे। गीता प्रेस में देवी-देवताओं के सैकड़ों मनभावन चित्र रखे हुए हैं। रामानंद सागर ने बारीकी से उन चित्रों को बारीकी से देखा। चित्रों में देवी-देवताओं के वस्‍त्र, उनके रंग और आभूषणों के आधार पर ही उन्‍होंने अपनी धारावाहिक के पात्रों राम, लक्ष्मण, सीता, कौशल्या, हनुमान, सुग्रीव आदि के वस्‍त्र, उनके रंग और आभूषण का चुनाव किया। गीता प्रेस के ये चित्र ‘कल्याण’, रामचरितमानस आदि ग्रंथों में छप चुके हैं। इन ग्रंथों की अब तक 50 करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं।
‘कल्याण’ के संपादक ब्रह्मलीन श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार उपाख्‍य ‘भाईजी’ चित्रों के महत्व को समझते थे। 1926 में जब मुंबई से ‘कल्याण’ का प्रकाशन शुरू हुआ तो पहले साल उन्होंने शहर के लक्ष्मी आर्ट प्रिंटिंग वर्क्स से कुछ चित्र लिए। एक वर्ष बाद जब ‘कल्याण’ की छपाई गीता प्रेस गोरखपुर में होने लगी, तब उन्होंने देशभर में चित्रकारों को ढूंढना शुरू कर दिया। इस कड़ी में उन्‍होंने कोलकाता, अमदाबाद, इंदौर, नाथद्वारा (राजस्थान), त्रावणकोर, लखनऊ, मथुरा आदि कई स्थानों पर चित्रकारों से संपर्क किया। गीता प्रेस और ‘कल्‍याण’ के लिए उन्‍हें जीवंत चित्रों की जरूरत थी। उन्‍हें रंगीन और रेखा चित्र की जरूरत थी। गोरखपुर से दूर बैठे चित्रकारों ने लक्ष्मी, गणेश, राम, कृष्ण, सरस्वती, विष्णु, शिव आदि तमाम देवी-देवताओं के चित्र बनाए जो ‘कल्याण’ में छपे भी। लेकिन भाईजी को सर्वोत्तम और शास्त्रीय पद्धति के चित्रों की तलाश थी। चित्रकारों के दूसरे शहरों में होने के कारण भी उन्‍हें कुछ व्‍यावहारिक दिक्‍कतें आ रही थीं, इसलिए वह अच्छे चित्रकार की खोज में लगे रहे। उन दिनों अफगानिस्‍तान, बर्मा और पाकिस्‍तान भी भारत का हिस्‍सा था। डाक से ही चित्र भेजे और मंगाए जाते थे। कई बार ऐसा भी हुआ कि किसी चित्रकार ने डाक से चित्र भेजा जो रास्‍ते में ही खराब हो गया या मिला ही नहीं। इन सब कारणों से चित्रकारों के साथ संबंध बिगड़ने की आशंका भी बनी रहती थी। इसलिए भाईजी चाहते थे कि गीता प्रेस के लिए अधिकतर चित्र गोरखपुर में ही बनें। यहां वे चित्रकार से अपने हिसाब से चित्र बनवा सकते थे। ईश्‍वरीय कृपा से बिना विज्ञापन दिए उन्‍हें ऐसे चित्रकार मिल भी गए।

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बी.के. मित्रा द्वारा बनाया गया सुरसा का चित्र।
 
एक बार भाईजी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी (1885-1990) के झूंसी (प्रयागराज) स्थित आश्रम गए। वहां बिनय कुमार नामक एक चित्रकार से उनकी मुलाकात हुई। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी की अनुमति के बाद उसे गोरखपुर ले आए। यही बी.के. मित्रा उनका मुख्‍या चित्रकार बना। बादी में जगन्नाथ और भगवानदास नामक दो और चित्रकार आ गए। दोनों गोरखपुर के ही रहने वाले थे। हालांकि भाईजी बाहरी चित्रकारों के चित्र भी खरीदते थे, लेकिन इन तीनों पर उनकी निर्भरता सर्वाधिक थी। गीता प्रेस के लीला चित्र मंदिर और गीता प्रेस के पुस्‍तकालय इन तीनों के बनाए हजारों चित्र आज भी सुरक्षित हैं। आम लोग इसे देख सकते हैं। इन्‍हीं चित्रों का अध्‍ययन करने के लिए रामानंद सागर गोरखपुर आए थे। उनकी धारावाहिक में इन चित्रों की झलक मिलती है।
बी. के. मित्रा (1884-1974): इनके पिताजी काशी नरेश के निजी सचिव थे। बिनय पांच भाइयों में सबसे छोटे थे। वह घर में कोयले से चित्र बनाते थे, जिसके लिए अक्‍सर उन्‍हें डांट-फटकार लगती थी। एक बार इनके पड़ोस में एक विवाह समारोह था। पड़ोसी ने बिनय से दीवार पर केले का पौधा और गणेश का चित्र बनाने को कहा। इस काम के उन्हें कुछ पैसे भी मिले, जो उनकी पहली कमाई थी। इसके बाद वह प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के संपर्क में आए, जहां से भाईजी उन्‍हें गोरखपुर ले गए। बिनय जन्मजात चित्रकार थे। उनका कोई गुरु नहीं था। उन्‍होंने करीब 37 साल तक गीता प्रेस के लिए चित्र बनाया। 1968 के आसपास उनकी आंखें खराब हो गईं थीं। फिर वे गीताप्रेस के लिए चित्र नहीं बना पाए। 14 जुलाई, 1974 को गोरखपुर के उत्तरी हुमायूंपुर क्षेत्र में उनका निधन हो गया। उनके दो बड़े भाइयों की भी चित्रकारी में रुचि थी।

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गीता प्रेस के चित्रकार जगन्‍नाथ द्वारा अशोक वाटिका में माता सीता और हनुमान का बनाया गया मनमोहक चित्र।
 
जगन्नाथ: जगन्नाथ नाम के दो चित्रकारों ने गीता प्रेस के लिए चित्र बनाए हैं। एक का नाम था जगन्नाथ, जबकि दूसरे का नाम जगन्नाथ प्रसाद गुप्त था। जगन्‍नाथ प्रसाद गुप्‍त रेलवे में काम करते थे। गीता प्रेस के लिए उन्होने भी कुछ चित्र बनाए। लेकिन यहां बात हो रही है जगन्‍नाथजी की। भाईजी से उनकी भेंट बिनय मित्रा के कारण हुई थी। शुरुआत में इन्‍होंने देवी-देवताओं के सुंदर और सजीव चित्र बनाए, लेकिन बाद में भाईजी ने उन्‍हें गीता प्रेस के मुख्यद्वार का मॉडल बनाने की ज़िम्मेदारी भी सौंप दी। देशभर के देवालयों की शैली को मिलाकर बने इस द्वार का उद्घाटन देश के प्रथम राष्‍ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1955 में किया था। उन्‍होंने जगन्‍नाथ की कलाशैली की बहुत प्रशंसा की थी।
 
जब जगन्नाथजी की प्रशंसा गोरखपुर में महंत दिग्विजयनाथ के कानों तक पहुंची तो उन्होंने भी उनसे गोरक्षनाथ मंदिर का मॉडल बनाने को कहा। गोरखनाथ मंदिर उसी मॉडल के अनुरूप बनाया गया है। जगन्नाथजी ने गीता प्रेस के लिए चित्र बनाने के साथ-साथ ‘भागवती कथा’ के 111 खंडों के लिए भी चित्र बनाए, जिसका प्रकाशन श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा स्थापित संकीर्तन भवन (प्रयागराज) ने किया। जगन्नाथजी की जन्‍म तिथि स्‍पष्‍ट नहीं है। कोई 1900 बताता है तो कोई 1909। गीता प्रेस में लंबे समय तक काम करने वाले श्री हरि कृष्ण दुजारी ने बताया कि जगन्नाथजी का निधन 1962 में हुआ था। अभी श्री दुजारी की उम्र 75 वर्ष से अधिक है। उनके पिताजी, भाई और दूर के रिश्‍ते के एक भाई भी गीता प्रेस में काम करते थे।

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इस चित्र को भगवानदास ने बनाया था।
 
भगवानदास: जिस प्रकार मित्रा बाबू के संपर्क में आकर जगन्नाथजी गीता प्रेस का हिस्सा बने, भगवानदासजी के साथ भी वही हुआ। भाईजी की देव कल्‍पनाओं के आधार पर भगवानदास ने भी कल्‍याण, रामचरितमानस, महापुराण, श्रीमद्भागवत जैसे ग्रंथों के लिए हजारों चित्र बनाए। गीता प्रेस के लिए चित्र बनाने का सिलसिला उनकी अंतिम सांस तक चला। ‘कल्‍याण’ के उपासना अंक (जनवरी 1968) में भाईजी ने लिखा, ‘‘हमारे पुराने चित्रकार श्री बी.के. मित्रा महोदय की आंखें खराब हो गईं। वे चित्र निर्माण का कार्य नहीं कर पाते। दूसरे कुशल चित्रकार श्री जगन्नाथ का देहावसान हो गया।
 
श्री भगवानदास हैं, वे कुशल चित्रकार हैं, पर इन दिनों वे भी प्राय: अस्वस्थ रहते हैं, इससे हमारी इच्छानुसार चित्र नहीं दिए जा सके, तथापि जो चित्र दिए गए हैं, वे बड़े सुंदर हैं तथा भावपूर्ण हैं।’’ इसके बाद ‘कल्याण’ के मार्च 1968 में ‘चित्रकार की आवश्यकता’ शीर्षक से एक विज्ञापन प्रकाशित किया गया- ‘‘गीता प्रेस के कुशल चित्रकार श्री बिनय कुमार मित्रा की आंखें खराब हो गईं, इसलिए वे चित्र नहीं बना सकते। दूसरे चित्रकार श्री जगन्नाथ का असमय देहावसान हो गया। तीसरे श्री भगवनदास हैं, वे अच्छे चित्र अंकित कराते हैं, परन्तु स्वास्थ्य खराब रहने के कारण समय पर पूरा काम कर नहीं पा रहे हैं। इसलिए एक ऐसे चित्रकार की अवश्यकता है, जो श्री बिनय कुमार मित्रा महोदय की कलम की तरह हमारे बताए अनुसार ठीक समय पर शास्त्रीय चित्र बनाकर दे सकें। उनकी नियुक्ति उचित मासिक वेतन पर की जा सकती है अथवा वे प्रति चित्र का उचित मूल्य ले सकते हैं या चित्र केवल ब्लॉक बनाने के लिए उचित न्योछावर पर देकर ब्लॉक बन जाने पर वापस ले सकते हैं। जो चित्रकार काम करना चाहें, संपादक ‘कल्याण’ पो. गीताप्रेस (गोरखपुर), उत्तरप्रदेश के पते पर पत्र-व्यवहार करें।’’
इन तीन चित्रकारों के अलावा बाहर के कुछ चित्रकारों ने भी गीता प्रेस के लिए चित्र बनाए। इनमें दो-एक मुस्लिम और कुछ महिलाएं भी हैं। हालांकि इन्‍होंने बहुत थोड़े चित्र ही बनाए। दुजारीजी ने बताया कि ‘कल्याण’ के चौथे वर्ष यानी 1930 में श्री बी. के. मित्रा गोरखपुर आ गए थे। इसके बाद से बाहरी चित्रकारों के चित्र छपने कम हो गए, लेकिन बिल्कुल बंद नहीं किया गया। बाहरी चित्रकारों की सूची बहुत लंबी है, पर इनमें दो नाम प्रमुख हैं- नाथद्वारा (राजस्थान) के घासीराम तथा कई शहरों में रहे दत्तात्रेय दामोदर देओलालिकर।
अवैतनिक थे गीता प्रेस के चित्रकार
 
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4. गीता प्रेस के मुख्‍य चित्रकार बी.के. मित्रा
 
दुजारीजी के अनुसार, मित्राबाबू, जगन्नाथजी और भगवानदासजी गीता प्रेस में नियमित वेतन पर काम नहीं करते थे। उन्‍हें प्रति रंगीन चित्र 10-15 रुपये और रेखा चित्र के पांच रुपये मिलते थे। उस समय 10-15 रुपये बहुत बड़ी रकम होती थी। साथ ही, भाईजी इनके भोजन और घर की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उठाते थे। वह सबसे ज्यादा ध्यान मित्राबाबू का रखते थे। वह उन्हें सर्वाधिक प्रिय थे। इसके बाद जगन्नाथजी और भगवानदास जी। दुजारीजी के अनुसार, भाईजी को इन तीनों में से जिससे भी चित्र बनवाना होता था, उसे सामने बैठाकर अपनी कल्पना समझाते थे। चित्र के विभिन्न रंगों का चयन भी भाईजी ही करते थे। भाईजी उनको यह भी बताते थे कि किस देवी देवता को कौन-सा वस्त्र और आभूषण पहनना है, उसका प्रभा मंडल कैसा होगा आदि-आदि। यह सब काम शास्त्रीय पद्धति से होता था। चित्र बन जाने पर भाईजी उसमें सुधार भी करवाते थे।
लीला चित्र मंदिर

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बी.के. मित्रा गीता प्रेस के मुख्‍य चित्रकार थे। यह चित्र भी उन्‍हीं के द्वारा बनाया गया है।
 
गीता प्रेस के लीला चित्र मंदिर और पुस्तकालय में एक ओर बी.के.मित्रा, जगन्नाथ और भगवानदास द्वारा बनाए गए सैकड़ों चित्र सुरक्षित और संरक्षित हैं, वहीं पुस्‍तकालय में संस्कृत, हिन्दी, बांग्‍ला आदि कई भाषाओं की दुर्लभ पांडुलिपियां भी संरक्षित हैं। लीला चित्र मंदिर में देवी-देवताओं के 700 से अधिक चित्र हैं। इनकी सुंदरता देखकर मन भावविभोर हो जाता है। हर चित्र में एक कथा छुपी हुई है। इनमें से कई चित्र त्रिविमीय भी हैं। लीला चित्र मंदिर में पूर्व की तरफ भगवान श्री कृष्ण के चित्र हैं। पश्चिम की तरफ श्रीराम के लीला-चित्र हैं। दक्षिण की तरफ दशावतार तथा इससे जुड़े चित्र हैं, तो उत्तर की ओर नवदुर्गा समेत अनेक देवियों के चित्र हैं। इन चित्रों में से अधिकतर बी.के. मित्रा, जगन्नाथ और भगवानदास ने बनाए हैं। इसके अलावा वहां 600 से अधिक पेंटिंग्स भी हैं। इनमें मेवड़ी शैली में भगवान कृष्ण की लीला दिखाई गई है। ये मेवाड़ से लाकर किसी ने भाईजी को भेंट की थीं। इसी तरह जयपुर, मुग़ल, ओरिएंटल आर्ट की भी पेंटिंग्स हैं। इस चित्र मंदिर की दीवारों पर पूरी गीता लिखी हुई है और देश के महान संतों की वाणी भी अंकित है। लीला चित्र मंदिर का उद्घाटन 1955 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने किया था। गोरखपुर स्थित यह चित्र मंदिर भक्तजनों और सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है। दुजारीजी ने बताया कि 1939 से 1943 तक भाईजी अपने पैतृक गांव रतनगढ़ (राजस्थान) में रहे। वहीं से वह संपादकीय विभाग का कार्य देख रहे थे। बाद में वह अपने साथ मित्राबाबू और जगन्नाथजी को भी वहां ले गए थे।