गीता प्रेस की पुस्तकें अब ‘एप’ पर

    दिनांक 21-मई-2020
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डॉ. संतोष कुमार तिवारी
गीता प्रेस अभी तक लोगों को लागत से भी कम मूल्य पर पुस्तकें उपलब्ध कराती आई है। लेकिन अब इसने गीता सेवा ट्रस्ट एप पर अपने द्वारा प्रकाशित व अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ पढ़ने के लिए उपलब्ध कराये हैं। गीता प्रेस ने 15 भाषाओं में 1700 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। ये सभी एप पर उपलब्ध होंगे 

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गीता प्रेस सदैव से लागत से कम मूल्य पर भक्ति ग्रंथों और अन्य आध्यात्मिक रुचि की पुस्तकों का प्रकाशन करती आ रही है। ये पुस्तकें लागत से भी कम मूल्य पर पाठकों को उपलब्ध कराई जाती हैं। लेकिन अब नये ‘एप’ के जरिए ये पुस्तकें जनसाधारण को मुफ्त में उपलब्ध कराई जा रही हैं। गीता सेवा ट्रस्ट का यह एप है- https://gitaseva.org/app जिसे दुनिया के किसी भी कोने में एंड्रायड फोन, लैपटाप या टैबलेट में डाउनलोड किया जा सकता है। इस एप को डाउनलोड करने के बाद कोई भी गीता प्रेस की पुस्तकें मुफ्त में पढ़ सकता है। फिलहाल इस एप पर हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, तमिल, बांग्ला और कन्नड़ भाषाओं में 213 पुस्तकें उपलब्ध हैं। अभी इस एप पर अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाएंगी।
 
गीता प्रेस की 1700 से अधिक पुस्तकें हैं। ये पुस्तकें हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, तमिल, बांग्ला, उर्दू, कन्नड़, असमिया, मलयालम, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलुगु और नेपाली भाषाओं में हैं। इन सभी पुस्तकों को गीता सेवा ट्रस्ट के एप पर अपलोड किया जाएगा। यह काम बहुत बड़ा है और धीमी रफ्तार से चल रहा है, इसलिए इसमें काफी समय लग सकता है। इस एप पर गीता पाठ, सुन्दरकाण्ड, रामकथा, वाल्मीकि रामायण, भजन, कीर्तन, आरती, आदि भी हैं। अब तक 1600 से अधिक आॅडियो सामाग्री एप पर अपलोड हो चुकी है। गीता प्रेस के संस्थापक ब्रह्मलीन श्री जयदयाल गोयंदकाजी (1885-1965), ‘कल्याण’ के आदिसंपादक ब्रह्मलीन श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार उपाख्य भाईजी (1892-1971) और ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी (1904-2005) के प्रवचन भी इस एप पर हैं।
 
 
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गीता प्रेस द्वारा हिन्दी अनुवाद के साथ छापे गये कूर्म पुराण के आरंभिक पृष्ठ।
 
गीता प्रेस 1926 से हिन्दी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का प्रकाशन कर रहा है। हर वर्ष ‘कल्याण’ का एक विशेषांक निकलता है। अब तक इसके 94 विशेषांक निकल चुके हैं। इनमें से 50 से अधिक विशेषांक ऐसे हैं, जिनका पुन:प्रकाशन आज भी किया जाता है। लगभग सभी विशेषांक 500 से 800 पृष्ठों के है। साथ ही, हर वर्ष गीता प्रेस की अंग्रेजी मासिक पत्रिका ‘कल्याण-कल्पतरु’ के भी विशेषांक निकलते हैं। इन सभी को भी गीता सेवा ट्रस्ट के एप पर अपलोड किया जाना है। 2021 में ‘कल्याण-कल्पतरु’ का विशेषांक उपासना-विषय पर होगा।
 
 
एप पर उपलब्ध हैं ये पुस्तकें
हिन्दी और संस्कृत भाषा में पुस्तकें
 
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गीता सेवा ट्रस्ट मोबाइल एप
 
  • श्रीमद्भगवद्गीता: श्रीमद्भगवद्गीता (भाषा टीका सहित), श्रीमद्भगवद्गीता (महात्म्य हिंदी-टीका सहित), श्रीमद्भगवद्गीता (मूल), श्रीमद्भगवद्गीता पदच्छेद, श्रीमद्भगवद्गीता तत्व विवेचनी, गीता ज्ञान प्रवेशिका, गीता प्रबोधनी, श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी, गीता चिन्तन।

  • तुलसी साहित्य: श्रीरामचरितमानस (मूल), सुन्दरकाण्ड (मूल), श्रीरामचरितमानस (सटीक), सुन्दरकाण्ड (सटीक), बरवै रामायण, गीतावली, वैराग्य संदीपनी, कवितावली, हनुमान बाहुक, जानकी मंगल , पार्वती मंगल, रामाज्ञा प्रश्न, श्रीकृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका।

  • दैनिक पूजा-पाठ: श्रीदुर्गा सप्तशती (हिन्दी अनुवाद सहित) शिवमहिम्न: स्तोत्र, श्रीनारायणकवच, संध्योपासन विधि और तर्पण एवं बलिवैश्वदेव विधि, सन्ध्या, सन्ध्या गायत्री का महत्त्व और ब्रह्मचर्य, तर्पण विधि, अमोघ शिव कवच, रामरक्षा स्तोत्रम्, बलिवैश्वदेव विधि, गजलगीता, श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् (नामावलि: सहित), आरती संग्रह, श्रीहनुमान चालीसा, मनुस्मृति:, नित्यकर्म प्रयोग, श्रीदुर्गासप्तशती (मूल), श्रीरामकृष्णलीला भजनावली, भजन संग्रह, शतनामस्तोत्र संग्रह, चेतावनी पद संग्रह, स्तोत्ररतनावली, हरेरामभजन (16 माला), श्रावणमासमहात्म्य, नित्यस्तुति: गजेन्द्रमोक्ष, संतानगोपालस्तोत्र (संतान प्राप्ति के शास्त्रीय उपाय), श्रीदुर्गा चालीसा एवं, श्रीविन्ध्येश्वरी चालीसा, श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम (मूलमात्रम), भीष्मस्तवराज:, श्रीशिवचालीसा, आदित्यहृदयस्तोत्रम। पुराण: श्रीमद्भागवत महापुराणम (मूलमात्रम्)

  • सूरदास साहित्य: सूर विनय पत्रिका, अनुराग पदावली, सूर रामचरितावली, विरह पदावली।
    हनुमान प्रसाद पोद्दार साहित्य: पद रत्नाकर, गीता चिन्तन, साधन पथ, प्रार्थना, सुखी बनने के उपाय, अमृत कण, मानव जीवन का लक्ष्य, ईश्वर की सत्ता और महत्ता, श्रीरामरितमानस (सटीक), सुन्दरकाण्ड (सटीक)।
    जयदयाल गोयन्दका साहित्य: श्रीमद्भगवद्गीता तत्त्व विवेचनी, गीता के परम प्रचारक, ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप, उद्धार कैसे हो?, साधन-कल्पतरु, शीघ्र कल्याण के सोपान, स्त्रियों के लिए कर्तव्य शिक्षा, सच्ची सलाह, अमूल्य वचन, आत्मोद्धार के साधन, ईश्वर और संसार, महत्त्वपूर्ण चेतावनी, नल दमयन्ती, श्रीप्रेम भक्ति प्रकाश, कर्मयोग का तत्त्व, तत्त्व चिन्तामणि, भगवत्प्रेम की प्राप्ति कैसे हो?, मनुष्य का परम कर्तव्य, परम साधन।

  • स्वामी रामसुखदास साहित्य: साधन सुधा सिन्धु, गीता ज्ञान प्रवेशिका, मानवमात्र के कल्याण के लिए, सार संग्रह, क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?, गीता माधुर्य, एक संत की वसीयत, सत्संग के अमृत कण, गीता प्रबोधनी, श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी, शिखा (चोटी) धारण की आवश्यकता, कल्याणकारी प्रवचन।

  • बाल कल्याण हेतु पुस्तकें: सच्चे और ईमानदार बालक , गुरु और माता-पिता के भक्त बालक, लघु सिद्धान्त कौमुदी, बड़ों के जीवन से शिक्षा, एक लोटा पानी, परलोक और पुनर्जन्म की सत्य घटनाएं, पिता की सीख , बाल अमृत वचन, सती द्रौपदी, उपयोगी कहानियां, वीर बालक।

  • भक्त चरित्र: भक्त सप्तरत्न, भक्त रत्नाकर, भक्त नारी, भक्त कुसुम, भक्तराज ध्रुव, भक्त दिवाकर, श्रीश्रीचैतन्य चरितावली, भक्त सौरभ, श्रीजैमिनीयाश्वमेधपर्व, प्रेमी भक्त, प्राचीन भक्त, भक्त बालक, भक्त सरोज, भक्त नारी, भक्त सप्तरत्न, भक्त महिलारत्न, भक्त सौरभ, भक्त पंचरत्न, भक्त सुमन, भक्त कुसुम, भक्त सुधाकर, भक्तराज हनुमान, प्रेमी भक्त उद्धव, सत्यप्रेमी हरिश्चन्द्र, श्रीभीष्मपितामह।
    (इनके अतिरिक्त एप पर तमिल भाषा में 17 पुस्तकें, कन्नड़ में 39, बांग्ला में 2 और अंग्रेजी में 24 पुस्तकें हैं।)
 
 
एप की आवश्यकता क्यों पड़ी?
संचार तकनीक में लगातार से तेजी से बदलाव आ रहे हैं। नई पीढ़ी बहुत सी चीजें अब आॅनलाइन ही पढ़ना पसंद करती है। साथ ही, लोगों के घर भी छोटे होते जा रहे हैं। घर में मोटी-मोटी पुस्तकों को सुरक्षित रखने की भी समस्या होती है।
इस समय देश के 50 से अधिक रेलवे प्लेटफार्मों पर गीता प्रेस के बुक स्टॉल हैं। इसके अतिरिक्त देश के 20 से अधिक शहरों में गीता प्रेस की निजी दुकानें या शाखाएं हैं। नेपाल में भी एक शाखा है। फिर भी देश के ग्रामीण इलाकों में लोगों को गीता प्रेस की पुस्तकें खरीदने में समस्या होती है। गीता सेवा ट्रस्ट का यह एप इन समस्याओं का निदान है। आज गांवों तक स्मार्ट फोन और इंटरनेट की पहुंच हो गई है। इसके कारण गांवों में साक्षरता भी बढ़ रही है। इसके अलावा, विदेशों में भी गीता प्रेस की पुस्तकों की मांग बनी रहती है। मोटी-मोटी किताबें विदेश भेजने में पुस्तक के मूल्य से ज्यादा डाक खर्च आ जाता है। अब यदि किसी को विदेश या देश में गीता, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, हनुमान चालीसा, हनुमान बाहुक आदि पढ़ना है तो वह सीधे इस एप के माध्यम से पढ़ सकता है। हनुमान चालीसा की तरह हनुमान बाहुक भी गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार गोस्वामीजी की भुजा में अत्यंत पीड़ा थी। वह इस पीड़ा से बहुत परेशान थे। दर्द के निवारण के लिए उन्होंने
ईश्वर से प्रार्थना की। भगवान से उनकी यही प्रार्थना हनुमान बाहुक में है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि गीता सेवा ट्रस्ट एप के बावजूद भी गीता प्रेस अपनी सभी पुस्तकों का मुद्रण जारी रखेगी, क्योंकि अब भी देश और विदेश की बहुत बड़ी आबादी, खासतौर से बुजुर्ग किताबें पढ़ने के अभ्यस्त हैं। उन्हें मोबाइल फोन पर पढ़ना पसन्द नहीं है। औसतन प्रतिदिन गीता प्रेस में 50,000 पुस्तकें मुद्रित होती हैं।
 
1923 में हुई एक छोटी सी शुरुआत
1920 के आसपास की बात है। श्री जयदयाल गोयंदकाजी (1885-1965) कोलकाता में सत्संग करवाते थे। उन दिनों सत्संग के लिए न कोई मंच बनता था और न ही कोई प्रचार होता था। धीरे-धीरे सत्संगियों की संख्या बढ़ती गई और सभी को स्वाध्याय के लिए श्रीमद्भगवद् गीता अर्थात गीता की अवश्यकता हुई। परन्तु शुद्ध पाठ और सही अर्थ की गीता सुलभ नहीं हो पा रही थी। सुलभता से ऐसी गीता मिल सके, इसके लिए श्री गोयंदकाजी ने कोलकाता के वणिक प्रेस में 5,000 प्रतियां छपवार्इं। लेकिन ये प्रतियां बहुत जल्दी खत्म हो गईं। दोबारा 6,000 प्रतियों का दूसरा संस्करण छपवाया गया, पर उसमें अशुद्धियों को ठीक करने में बहुत दिक्कत हो रही थी। तब श्री गोयंदकाजी ने अपना प्रेस लगाने की सोची। गोरखपुर के दो कर्मठ मित्रों, घनश्याम दासजी जालान और महावीर प्रसादजी पोद्दार ने उन्हें सुझाव दिया कि प्रेस उनके शहर में खोली जाए जिससे प्रेस की देखभाल भी करेंगे। उनके भरोसे पर 1923 में गोरखपुर में करीब 10 रुपये में एक छोटा सा घर किराए पर लिया गया। उस घर में एक हैंडप्रेस लगायी गयी और गीता प्रेस की स्थापना हुई। लेकिन हैंडप्रेस में छपाई का काम बहुत धीरे-धीरे होता था। हैंडप्रेस में तीन कुशल व्यक्ति एक घंटे में मुश्किल से 100 पृष्ठ ही छाप सकते थे। समय के साथ प्रेस का विस्तार होता गया। श्री जयदयाल गोयंदकाजी (सेठजी) और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी (भाईजी) द्वारा लिखित पुस्तकें, गीता (हिन्दी अनुवाद सहित) और रामचरितमानस आदि वहां से प्रकाशित होने लगीं। सेठजी, भाईजी, स्वामी रामसुखदासजी तथा कुछ अन्य लोगों के निष्काम सहयोग और समर्पण से धीरे-धीरे गीता प्रेस सनातन धर्म साहित्य का विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशन केंद्र बन गया।
 
 
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 श्री वेंकटेश्वर मुद्रणालय में छपे कूर्म पुराण का एक पृष्ठ। 
 
गीता प्रेस लागत से कम मूल्य पर पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराती है। गीता प्रेस की स्थापना के पहले गीता की पुस्तक मिलनी दुर्लभ थीं। मिलती भी तो उसमें काफी अशुद्धियां होती थीं और उसका मूल्य चुकाना सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं था। हिन्दू धर्म की तमाम पुस्तकें संस्कृत में है। तब महाभारत का मूलसहित हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध नहीं था। हमारे कई पुराण भी तब हिन्दी में उपलब्ध नहीं थे। गीता प्रेस ने इन सभी पुस्तकों का न केवल हिन्दी में अनुवाद कराया, बल्कि इसका प्रकाशन कर सस्ती दर पर सर्वसाधारण को सुलभ कराया। गीता प्रेस की स्थापना के पहले वाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, आदि हिन्दू धर्म की कुछ पुस्तकें बाजार में थीं, परन्तु उनका मूल्य इतना ज्यादा होता था कि लोग इसे खरीद नहीं पाते थे। इसके अतिरिक्त उन पुस्तकों की छपाई, बाइंडिंग आदि उतनी अच्छी नहीं थी जितनी कि गीता प्रेस की थी।
 
मुंबई में श्री वेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय था। उसकी स्थापना 1871 में हुई थी। इसने भी बड़ी संख्या में हिन्दू धार्मिक पुस्तकें छापीं, लेकिन वह एक व्यापारिक प्रेस थी। इसका उद्देश्य लाभ कमाना था। वह गीता प्रेस की तरह सनतान धर्म को समर्पित नहीं था। इसके अलावा श्री वेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय की कुछ पुस्तकों को पढ़ने में भी दिक्कत होती थी। जैसे- एक श्लोक में चार पद होते हैं। पहली पंक्ति में दो पद लिखे जाते हैं और दूसरी पंक्ति में आगे के दो पद लिखे जाते हैं। इस प्रकार एक श्लोक को दो पंक्तियों में लिखा जाना चाहिए, परंतु उनकी पुस्तकों में कभी-कभी उसे एक ही पंक्ति में लिखने का प्रयास होता था। इससे छपाई में लगने वाला कागज तो बच जाता था, परंतु पुस्तक को पढ़ने में दिक्कत होती थी। दूसरी ओर गीता प्रेस ने देवी-देवताओं के मनमोहक चित्रों के साथ अपनी पुस्तकें पाठकों तक पहुंचाईं। इस कारण भी वे ज्यादा लोकप्रिय हुईं। गीता प्रेस की पुस्तकों में देवी-देवताओं के जो चित्र हैं, उनमें से अधिकतर श्री बी.के. मित्रा, श्री भगवान और श्री जगन्नाथ नामक चित्रकारों ने बनाए हैं। यहां यह बता देना भी जरूरी है कि ‘कल्याण’ के प्रारंभिक अंकों की लगभग एक वर्ष तक छपाई श्री वेंकटेश्वर मुद्रणालय में ही हुई थी। बाद में इसकी छपाई गोरखपुर में होने लगी।
 
इंटरनेट की दुनिया में गीता सेवा ट्रस्ट एप लाना एक महत्वपूर्ण कदम है। सबसे विशेष बात यह है कि यह एप ‘यूजर फ्रेंडली’ है। इसमें किसी भी पुस्तक, भजन या प्रवचन को आसानी से ढूंढा जा सकता है। धीरे-धीरे जब इस एप पर विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित गीता प्रेस की सभी पुस्तकें अपलोड हो जाएंगी, तब सनातन धर्म को समर्पित कुछ अन्य संस्थाओं की पुस्तकें, प्रवचन आदि भी अपलोड होंगे। एप में प्रस्तुत सामग्री में सजीवता लाने के लिए एनीमेशन तकनीक का भी प्रयोग किया जाएगा।
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)