इम्तिहान के बदले मान

    दिनांक 21-मई-2020
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राजेन्द्र गोयल
विद्यार्थियों को वही विषय क्यों न पढ़ाए जाएं जो उनकी रुचि के हों? क्यों न उनका मूल्यांकन आज की परीक्षा प्रणाली से रटने की उनकी महारथ की बजाय उनकी समझ के दायरे से किया जाए? कोरोना काल ने विद्यार्थी के इम्तिहान के मायने बदलने का मौका दिया है जिसका लाभ उठाया जाना चाहिए
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परीक्षा हॉल में परीक्षा देते छात्र-छात्राएं (फाइल चित्र)
 
परीक्षा के लिए पढ़ो, अध्ययन करो! परीक्षा समाप्त, पढ़ाई खत्म! पिछली कक्षा का प्रश्न पूछ लिया जाए तो सीधा सा उत्तर मिलता है कि, यह हमारे वर्तमान पाठ्यक्रम में नहीं है। इसमें संदेह नहीं है कि वर्तमान परीक्षा प्रणाली ने एक बड़े उद्योग को बढ़ावा दिया है। इसने बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को तनावग्रस्त किया है। विद्यार्थी के अंक प्रदर्शन से न केवल उसकी सफलता और विफलता को मापा जाता है बल्कि उसके ‘ज्ञान’ का पता भी अंकों से लगता है। जबकि आज कई उदाहरण हैं, जिनको ‘असफल’ कहकर विद्यालय से निकाल दिया गया, पर आज उनमें से कई ने वैज्ञानिक, गणितज्ञ, उच्च कोटि के खिलाड़ी, सफल व्यापारी, बड़ी कम्पनी के प्रमुख या प्रेरक विभूति बनकर समाज में सफल व्यक्ति के रूप में पहचान बनाई। वर्तमान परीक्षा तंत्र भी कुछ इस तरह का बन गया है कि पूरे वर्ष परीक्षा चलती ही रहती है। शिक्षा विभाग हर समय परीक्षा की तैयारी में ही लगा रहता है। ऐसे में शिक्षक और विद्यार्थी इन परीक्षाओं के मध्य सिलेबस पूरा कराने की भागमभाग में लगे रहते हैं, शिक्षण-अधिगम तो कहीं खो सा जाता है। जब शिक्षा का सारा तंत्र परीक्षा—केंद्र्रित है तो मतलब यह कि यदि परीक्षा नहीं हुई तो शिक्षा भी नहीं हुई।
 
एन.सी.एफ.-2005 ने इस परीक्षा तंत्र को नकारकर बाल केंद्रित शिक्षा और उसके सतत मूल्यांकन पर जोर दिया। बाल केंद्रित शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को सभी शिक्षाविदों ने स्वीकारा है लेकिन इस पर अभी तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाई है। एन.डी.पी. और सी.सी.ई. को लाया ही इसी आधार पर गया था, परंतु दोनों का लगभग सभी स्तरों पर विरोध होने लगा। कारण जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।
 
सर्वांगीण विकास ही उद्देश्य
शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को विषय वस्तु को रटाकर पास-फेल करना नहीं, बल्कि उसका सर्वांगीण विकास करना है। शिक्षा की उपलब्धि इस बात में है कि स्वयं छात्र, शिक्षक और अभिभावकों को लगातार लगे कि बच्चे में समुचित विकास हो रहा है। मूल्यांकन सतत चलने वाली प्रक्रिया है। मूल्यांकन मुख्यत: तीन स्तरों का होता है। पहला, क्या विद्यार्थी में विषय-वस्तु की पूरी स्पष्टता है? दूसरा, उसे उसकी कितनी समझ बनी, उसने उसे कितना आत्मसात किया? और तीसरा, क्या वह शिक्षा द्वारा प्राप्त ज्ञान का प्रयोग किसी समस्या के हल में कर सकता है? उसमें ऐसा कौशल आया कि वह समाजोपयोगी कोई नई चीज बना सके या खोज कर सके? अत: मूल्यांकन स्वयं विद्यार्थी द्वारा, माता-पिता द्वारा और शिक्षक द्वारा लगातार किया जाए तब उसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे।
 
हमारा वर्तमान परीक्षा तंत्र पूरी तरह अविश्वास से भरा हुआ है, यहां पहले से ही मान कर चलते हैं कि पेपर 'लीक' होगा इसलिए सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। विद्यार्थी नकल करेगा, इसके लिए अलग से प्रावधान करने पड़ते हैं। ऐसे में तो परीक्षा की पवित्रता ही समाप्त हो जाती है। इसलिए आज वर्तमान मूल्यांकन पद्धति को बदलने का यह सुअवसर है। इसके लिए कुछ सुझाव हैं, इन पर और चर्चा करके कोई ठोस आकार दिया जा सकता है।
 
  1.  हम ऐसी मूल्यांकन पद्धति विकसित कर सकते हैं, जिसमें याद करके या रट कर प्राप्त किये अंकों के आधार पर ही केवल निर्णय न हो, सतत और व्यापक मूल्यांकन हो।

  2.  महाभारत में एक प्रसंग आता है जब गुरु द्रोणाचार्य सभी को दूर पेड़ पर निशाना लगाने को कहते हैं तो निशाना लगाने से पहले यह नहीं पूछते कि ‘बताओ, बाण क्यों मार रहे हो? यह भी नहीं पूछते कि कैसे मारोगे? वह पूछते हैं, बताओ क्या दिख रहा है? अर्थात आपकी दृष्टि क्या है?’ मूल्यांकन में विद्यार्थी की दृष्टि का बड़ा महत्व होता है। इस बदली हुई परिस्थिति में हमें यह विकसित करना होगा।

  3. एक ही चुटकुला दो-तीन बार सुनने पर आनंद नहीं देता, हंसी नहीं आती क्योंकि उसका मर्म पता होता है। एक पहेली यदि कोई पूछता है और अगर उसे वह पहले से पता है तो तुरंत बोलता है कि ‘यह मुझे पता है, यह मजेदार नहीं।’ फिर ‘समझ में आ गया है’, ऐसा कहने के बाद विद्यार्थी किसी विषय को बार-बार दोहरा कैसे सकते हैं? परीक्षा में जाने से पहले उसे वह रटना क्यों पड़ता है? सीधा सा मतलब है कि विषय वस्तु की समझ उसे नहीं हुई, हमने बस मान लिया। विषय-वस्तु की उसे स्पष्टता हुई या नहीं, इसका मूल्यांकन उसी समय जरूरी है।

  4. फिसलपट्टी की सीड़ी पर एक छोटा बच्चा चढ़कर दूसरी तरफ से फिसलता है। थोड़ी देर उसे मजा आता है, लेकिन कुछ समय पश्चात वह फिसलने वाली जगह से ऊपर चढ़ना शुरू कर देता है, उसे वहां चुनौती नजर आती है। बच्चों को चुनौतीपूर्ण कार्य करने में बड़ा मजा आता है। बच्चे को ऐसा चुनौतीपूर्ण कार्य देकर मूल्यांकन करेंगे तो उसके व्यक्तित्व का विकास होगा।

  5. वर्तमान में लगभग 10,000 गुरुकुल चल रहे हैं। एक समय था जब सारा विश्व शिक्षा अध्ययन करने भारत में आता था और हम विश्व गुरु कहलाते थे। हमारी गुरुकुल शिक्षा पद्धति में लागू मूल्यांकन पद्दति से आज बहुत कुछ जानने, समझने और अपनाने की आवश्यकता है। गुरुकुल पद्धति के आधार पर मूल्यांकन पद्धति विकसित करके बच्चों को जिन विषयों में अधिक रुचि है उन्हें उच्च स्तर तक ले जाने की और जिनमें कम रुचि है उन्हें धीरे—धीरे सिखाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे न विषय का तनाव होगा और न मूल्यांकन का, अर्थात आज चयन आधारित व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता है। यह छात्र और शिक्षक दोनों मिलकर तय करें। इसके लिए सिलेबस को भी नया स्वरूप देकर पूरी तरह भारतीय किया जाए।

  6. विद्यार्थी का समग्र आकलन हो, उसे अपनी विषय-वस्तु का उपयोग समाज में करना आ जाए, उसे लगे कि मेरा भी समाज में बड़ा योगदान हो सकता है।

  7. नैतिक शिक्षा और शाश्वत जीवन मूल्यों की केवल जानकारी ही न हो, विद्यार्थी ने उसे पूरी तरह आत्मसात कर लिया है, यह आचरण और व्यवहार से पता लगना चाहिए। इसका भी मूल्यांकन हो।

  8. वसुधैव कुटुम्बकम का भाव जागृत हो। सभी मेरे अपने हैं। इनका दु:ख—दर्द मेरा भी है। सभी सम्प्रदायों का सम्मान करें। मूल्यांकन में इस बात का भी स्थान हो।

  9. पर्यावरण संरक्षण आदि ऐसे अनेक विषय हैं जिनकी जानकारी आज बहुत जरूरी है। इनको मूल्यांकन में जोड़ने से विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होगा।

  10. एक निश्चित समय में सिलेबस आधारित परीक्षा प्रणाली में विषय वस्तु के प्रश्न ही नहीं, दैनिक जीवन से संबंधित समस्याओं के प्रश्न भी होने चाहिए।
 
चायनीज कोरोना वायरस से उपजे इस संक्रमणकाल ने आज यह अवसर दिया है कि इसे चुनौती मानते हुए परीक्षा का एक ऐसा लचीला तंत्र विकसित करें जिसमें विद्यार्थी स्वयं से पूछे कि आज उसमें क्या परिवर्तन आया। इसके लिए चिंतन के समय कुछ शिक्षकों को भी साथ रखने से यह अधिक प्रभावी और वास्तविक स्वरूप ले पायेगा।
(लेखक शिक्षा निदेशालय, दिल्ली में गणित के प्रवक्ता और दिल्ली अध्यापक परिषद के महामंत्री हैं)