नाकाम सरकार, बढ़ती महामारी

    दिनांक 21-मई-2020
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देवेंद्र फणनवीस
महामारी से लड़ने में महाराष्ट्र सरकार नाकाम साबित होती दिख रही है। राजधानी मुम्बई सहित पूरा राज्य वायरस की भयंकर चपेट में है

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आज महाराष्ट्र में वायरस से पीड़ित मरीजों की संख्या देश में सबसे अधिक है। 31 प्रतिशत मरीज इसी राज्य में हैं। इस महामारी के कारण पूरे देश में जितनी भी मौतें हुई हैं, उनमें 40 प्रतिशत महाराष्ट्र से हैं। वायरस की जांच करने में महाराष्ट्र देश में चौथे या पांचवें क्रमांक पर है। देश में जितने लोगों की जांच हो रही है, उनमें से तीन प्रतिशत वायरस पीड़ित मिल रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र में यह प्रतिशत15 है। इस संकट से निकलने के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण, उचित नियोजन और आपसी समन्वय की आवश्यकता है, लेकिन दुर्भाग्य से महाराष्ट्र में ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
 
इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि कोरोना योद्धा ही बीमार हो रहे हैं। लगभग 1,000 पुलिसकर्मी, 400 से अधिक चिकित्सक,नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मी वायरस से पीड़ित हो चुके हैं। आज मुम्बई के विविध अस्पतालों से जो वीडियो सामने आ रहे हैं, वे आम आदमी को डराने वाले हैं। प्रतिदिन करीब 1,000 नए रोगी मिल रहे हैं। लोगों में दहशत का माहौल बन रहा है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोतरी करने के साथ-साथ अच्छे नियोजन की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र को लगभग 2,90,000 पीपीई किट तथा 8,00000 एन-95 मास्क दिए हैं। फिर भी राज्य में इन चीजों की कमी दिख रही है। ऐसा उचित नियोजन के अभाव में हो रहा है। महामारी से लड़ने के लिए केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र को 468 करोड़ रु. भी दिए हैं।
 
समन्वय का अभाव
प्रशासनिक स्तर पर बड़ी मात्रा में समन्वय का अभाव है। मंत्रालय से जो आदेश जारी होते हैं, उसके दूसरे ही दिन स्थानीय प्रशासन से उनसे उलट आदेश जारी किए जाते हैं। राज्य परिवहन निगम की बसों में बिना भाड़ा यात्रा करने का विषय हो या दुकानों को खेलने के आदेश हों, इन सभी बातों में समन्वय का अभाव दिख रहा है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व को मार्ग निकालना पड़ता है, पर ऐसा भी नहीं हुआ। इस कारण भीड़ पर नियंत्रण नहीं हो पाया है। लोग खरीददारी के लिए बाहर निकल जाते हैं। केंद्र सरकार द्वारा पर्याप्त अनाज उपलब्ध कराने के बाद भी राशन वितरण में गड़बड़ी हो रही है। लोगों को अनाज देने के बजाय तैयार खाना देने का विचित्र निर्णय राज्य सरकार ने लिया और फिर कुछ दिन बाद वह निर्णय रद्द करना पड़ा। जिनके पास राशनकार्ड नहीं थे, या किसी कारणवश जिनका राशनकार्ड निरस्त हो गया था उन्हें और प्रवासी मजूदरों को अनाज नहीं मिला। ऐसे लोगों की संख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ है। जब कई अन्य राज्यों ने सभी को अनाज दिया, तो ऐसा करना महाराष्ट्र के लिए बिल्कुल असंभव नहीं था। ‘लॉकडाउन’ को लागू करवाने में भी गंभीरता नहीं दिखाई गई। परिणामस्वरूप वायरस से पीड़ितों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।
 
श्रमिकों और किसानों की अनदेखी
प्रवासी श्रमिकों के लिए केंद्र सरकार ने रेलगाड़ी की व्यवस्था की, लेकिन राज्य सरकार के नियोजन के अभाव के कारण हजारों श्रमिक पैदल अपने-अपने राज्यों के लिए निकल गए।
 
किसानों से अनाज की खरीदारी करने के लिए केंद्र सरकार हर मदद देने को तैयार है, पर उसके लिए राज्य सरकार मूलभूत सुविधाएं नहीं जुटा सकी। इस कारण कृषि उत्पाद अभी भी किसानों के घरों और खेतों में ही पड़े हुए हैं।
 
सुझाव का अर्थ आलोचना नहीं
विपक्ष के नाते इन सभी विषयों पर मैंने सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। महामारी के इस संकट के समय हमें राजनीति नहीं करनी है। पर राज्य के हित में जो उचित लग रहा है, उस पर बोलने या सुझाव देने का अर्थ सरकार की आलोचना करना नहीं है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने श्रमिक कानून में संशोधन किए। उद्यमी निवेश करें, इसके लिए विशेष आर्थिक मदद की घोषणा की गई। लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने इस विषय में भी कोई निर्णय आज तक नहीं लिया है। अपनी असफलताओं का दोष किसी और पर मढ़ देने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए राज्य सरकार को खुद ही काम करना होगा।
(लेखक महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र विधानसभा में नेता- प्रतिपक्ष हैं)