स्वावलंबन का संकल्प

    दिनांक 21-मई-2020   
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भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घरेलू उत्पादों को अपनाने के प्रधानमंत्री के आवाहन से भविष्य का उज्ज्वल होना तय
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र् मोदी ने हाल के अपने संबोधन के माध्यम से उन्नत व आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए स्वदेशी प्रतिभा, स्वदेशी संसाधनों और देश के कुटीर, लघु व मझोले उद्योगों सहित किसानों व श्रमजीवी वर्ग में जो विश्वास व्यक्त किया है, उससे देश में अपूर्व साहस व उत्साह का संचार हुआ है। देश की विशाल जन-शक्ति, तकनीकी प्रतिभा और उन्नत आधारिक रचनाओं के माध्यम से द्रुत आर्थिक विकास की एक लम्बी व युगान्तरकारी छलांग के विराट संकल्प में एक सामर्थ्यवान व समृद्ध भारत का चित्र उभरने लगा है।
 
स्वाधीनता के पहले भारत साबुन, मंजन जैसे साधारण उत्पादों से लेकर इस्पात तक, सभी प्रमुख वस्तुओं का उत्पादन देश में विकेन्द्रित स्वदेशी उद्यमों से करने में सक्षम था। लेकिन, स्वाधीनता के आरम्भिक चार दशकों में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू व उनके बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी के समाजवादी संरचना के दुराग्रह से देश के उद्यम तंत्र को घरेलू मांग की आंशिक पूर्ति जितने आवश्यक उत्पादन तक की भी स्वतंत्रता न दिये जाने से देश शक्कर, सीमेण्ट, कोयला, इस्पात, स्कूटर और साइकिल के टायर तक, प्रत्येक वस्तु के अभावों से त्रस्त रहा और सभी वस्तुओं की 10-10 वर्षों की प्रतीक्षा सूची व कालाबजारी आम बात थी।
 
इन्हीं समाजवादी प्रतिबन्धों व लाइसेंस-परमिटों के भ्रष्ट तंत्र से जर्जर अर्थव्यवस्था की आन्तरिक सामर्थ्य को बढ़ाने का कोई अवसर दिये बिना, 1991 में आयात में उदारीकरण और विदेशी निवेश प्रोत्साहन से देश में लाखों लघु, मध्यम व बड़े उद्योगों को रुग्णता, बन्द होने या विदेशी कम्पनियों द्वारा अधिग्रहण का शिकार बनने पर विवश कर दिया गया था। इसलिए आज देश के पास विश्व की 17.6 प्रतिशत जनशक्ति, 20 प्रतिशत युवा जनसंख्या, विश्व की सर्वाधिक 18 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि, सर्वाधिक विविधता युक्त 127 कृषि जलवायु क्षेत्र और तीसरी सर्वाधिक विशाल तकनीकी—प्रतिभा का संच होने पर भी विश्व निर्माण में भारत का अंश आज मात्र 3 प्रतिशत है। उसमें भी संगठित क्षेत्र के उत्पादन तंत्र के 3/4 भाग पर तो विगत 29 वर्ष के वैश्वीकरण के दौर में विदेशी कम्पनियों का स्वामित्व स्थापित हो गया है।
 
स्वदेशी या उच्च आर्थिक राष्ट्रनिष्ठा के कारण ही जापान का विश्व जनसंख्या में मात्र 1.6 प्रतिशत अंश होने पर भी विश्व निर्माण के 10 प्रतिशत पर नियंत्रण है। उदाहरण के लिए जापान में केवल 4 प्रतिशत विदेशी कारें ही बिकती हैं। वहीं भारत में 13 प्रतिशत टाटा व महिन्द्रा को छोड़ 87 प्रतिशत विदेशी कारें बिकती हैं। यही स्थिति सभी उत्पादों के सम्बन्ध में आर्थिक राष्ट्रनिष्ठा की है। विगत छह वर्ष में ही सरकार की सार्थक नीतिगत पहल के फलस्वरूप भारत विश्व में 10वें क्रमांक से रूस, ब्राजील, इटली, फ्रांस व इंग्लैण्ड को पीछे छोड़कर पांचवीं सबसे बड़ी व 'क्रय क्षमता साम्य' के आधार पर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।
 
देश के नाम अपने संदेश में आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए जहां प्रधानमंत्री मोदी ने देश की प्रतिभा के माध्यम से श्रेष्ठतम स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन की बात कही है, वहीं आजीविका के साधनों के व्यापक विस्तार हेतु कुटीर उद्योग, घरेलू उद्योग सहित विविध श्रेणी के उद्योगों व खेती को पूर्ण खाद्य श्रृंखला से जोड़ने की बात की है। जनधन-आधार-मोबाइल (जेएएम) की त्रिशक्ति पर आधारित सुधारों के बाद कृषि को पूरी खाद्य श्रृंखला से जोड़ना एक बड़ा कदम होगा। साथ ही उन्होंने संसाधन रहित रेहड़ी—ठेले वालों, पटरी पर सामान बेचने वालों, घरों में काम करने वालों, पशुपालकों, मछुआरों और प्रवासी व अन्य श्रमिकों तक की चिन्ता करते हुए, उन्हें आर्थिक पैकेज में भागीदार बनाने की बात कही है। यही हमें समावेशी विकास की ओर अग्रसर करेगा।
 
 
वर्तमान संकट के इस दौर में विराट संकल्प के साथ देश के सकल घरेलू उत्पाद के 10 प्रतिशत अर्थात 20 लाख करोड़ रु. का अत्यन्त महत्वाकाक्षी पैकेज घोषित किया गया है। इससे स्वदेशी व स्वावलंबन के आधार पर एक अतुल सामर्थ्यवान व आत्मनिर्भर भारत का निर्माण होगा। उन्होंने अर्थ केन्द्रित वैश्वीकरण के स्थान पर भारतीय संस्कृति व जीवन मूल्यों से अनुप्राणित मानव केन्द्रित वैश्वीकरण को प्रतिष्ठापित करने का आवाहन किया है। इससे विश्व मंगल का मार्ग सिद्ध होगा।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति हैं)