मुसलमानों को कौन रोक रहा बदलने से ?

    दिनांक 21-मई-2020   
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लॉकडाउन की वजह से जब मुसलमानों के सबसे पाक मजहबी स्थल खाना-ए-काबा बंद है और सउदी अरब हुकूमत ने ईद से लेकर अगले चार दिनों तक कफर्यू का ऐलान किया हुआ है तो भारतीय मुसलमान इस प्रयास में है कि कैसे मस्जिदों के दरवाजे खुलेें और वे ईद की नमाज के बहाने हजारों की संख्या में वहां उमड़कर अपने इलाके की अन्य आबादी के जीवन के लिए खतरा पैदा कर सकें  m_1  H x W: 0 x
 
जीवन की गतिशीलता बनाए रखने के लिए परिवर्तन आवश्यक है। भारतीय मुस्लिम समुदाय खुद को जिंदा कौम मानता है। इस संदर्भ में कई दलीलें भी होती हैं उसके पास। मगर वास्तव में यह कौम परिवर्तन से कोसों दूर है। बिना बदलाव को आत्मसात किए कोई भी कौम जिंदा कहला ही नहीं सकती। मुसलमानों के आचार-विचार इस आधुनिक युग में भी रूढ़ीवादी और कट्टर है। समय और आवश्यकता के अनुसार देश-दुनिया की तमाम कौमें बदलती रही हैं, पर मुसलमान आज भी रूढ़ीवादी का रूढ़ीवादी ही है। इस समुदाय के शिक्षा, सामाजिक और बौद्धिक स्तर में आज भी कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इसी वजह से कोई भी राजनीतिक दल इन्हें जब चाहे कहीं भी हांक ले जाता है। दूसरी तरफ मजहबी ठेकेदार इस्लाम और कौम को बचाने का भय दिखाकर उनसे कुछ भी करवा लेते हैं।
 
इसका ताजा उदाहरण है सीएए और एनआरसी विरोधी आंदोलन। इसके नाम पर दिल्ली के शाहीनबाग से लेकर देश के तमाम शहरों में मुस्लिमों ने बिना कुछ समझें—जाने अराजकता फैलाई, वे कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए, इन्होंने दंगा—फसाद और देशभर में सार्वजनिक संपत्ति को तहस—नहस किया। बावजूद इसके इन मुसलमानों को पता नहीं चल पाया कि वे आंदोलन क्यों कर रहे थे ? सीएए कानून बनने से इनका क्या बिगड़ने वाला है ? गृहमंत्री अमित शाह ने जब आंदोलनकारियों को इस मसले पर बातचीत का न्योता दिया तो आंदोलनरत मुसलमान तय नहीं कर पाए कि उनमें से कौन केंद्रीय गृहमंत्री से बात करने जाएगा और उनके समक्ष क्या रखेगा ?
 
परिणामस्वरूप सरकार से इस मुददे पर भ्रम दूर किए बिना ही आंदोलन समाप्त हो गया। अब स्थिति है कि कोरोना संक्रमण के चलते लोग अपनी रोजी-रोटी को लेकर बेहाल हैं। इसलिए कोई सीएए और शाहीन बाग के मुददे पर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं।
 
कोरोना संक्रमण ने भारत सहित विश्वभर में कोहराम मचा रखा है। इसके बावजूद इस महारोग ने जीवन को नए सिरे से जीने का हुनर भी सिखाया है। इसने बहुत सी चीजें बदल दी हैं। मगर देश का मुसलमान इसको लेकर भी बदलने को तैयार नहीं। पहले तब्लीगी जमातियों ने दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय ‘मरकज’ में हजारों मुसलमानों को इकट्ठा कर इस रोग के भारत में फैलने के लिए जमीन तैयार की। उसके बाद मरकज से निकलकर तब्लीगी देशभर की मस्जिदों में पहुंचे। फिर जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि की तर्ज पर हर गली-मुहल्ले में कोरोना फैला दिया।
 
तब्लीगी यहीं नहीं रूके। जब उन्हें पकड़कर कोरंटीन किया गया तो उन्होंने डॉक्टर, नर्साें, स्वास्थ्य व पुलिस कर्मियों से मारपीट, अश्लील हरकतें करके और थूक-थूक कर संक्रमण फैलाया। इन मामले में कई तब्लीगियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में मुकदमा दर्ज हैं। तब्लीगी जमात का मुखिया मौलाना साद अभी तक सामने नहीं आया है। उस पर संगीन आरोप है कि देश-दुनिया में कोरोना फैलते देखते हुए भी उसने विदेश और देश के हजारों तब्लीगियों को न मरकज में न केवल इकट्ठा किया, इस्लामिक आयोजन के बाद उन्हें देश की मस्जिदों में भेज दिया।
दूसरे मत—पंथों और कानून की तरह इस्लाम में भी आत्महत्या की मनाही है। मगर कोरोना संक्रमण के फैलने के दौर में हजारों तब्लीगियों को जानबूझ कर सड़कों पर उतारना न केवल खुदकुशी था, बल्कि दूसरे के जीवन के साथ खिलवाड़ भी। इसको लेकर जब तब्लीगियों पर उंगली उठाई गई तो आम मुसलमान भी उलेमा के बहावे में आकर उनके पक्ष में खड़ा हो गया। ओवैसी जैसे लोग इसे इस्लाम पर हमला बताकर उन्हें भड़काने लगे। जबकि इससे किसी को इनकार नहीं कि जमातियों के मस्जिदों में ठहरने से मुसलमानों की जान को ही सर्वाधिक खतरा पहुंचा है। कारण की मस्जिदों में वही जाते हैं कोई और कौम नहीं।
 
इन बातों से मुसलमानों और जमातियों ने कोई सबक लिया है, ऐसा नहीं लगता। अभी भी कई जगहों से नमाज के लिए इकट्ठे होने और पुलिस से झड़प की खबरें आती रहती हैं। लॉकडाउन की वजह से जब मुसलमानों के सबसे पाक मजहबी स्थल खाना-ए-काबा बंद है और सउदी अरब हुकूमत ने ईद से लेकर अगले चार दिनों तक कफर्यू का ऐलान किया हुआ है तो भारतीय मुसलमान इस प्रयास में है कि कैसे मस्जिदों के दरवाजे खुलेें और वे ईद की नमाज के बहाने हजारों की संख्या में वहां उमड़कर अपने इलाके की अन्य आबादी के जीवन के लिए खतरा पैदा कर सकें। कुछ टीवी चैनल ईद की खरीदारी के लिए बाजारों में उमड़ने वाली मुसलमानों की भीड़ को देखकर अगाह कर चुके हैं, इससे कोरोना वायरस देश में द्रुतगति से फैल सकता है। अभी संक्रमित रोगियों की संख्या देश में लाख पार कर चुकी है। ईद की नमाज की इजाजत दी गई तो एक ही झटके में संक्रमितों की संख्या डेढ़ से दो लाख तक पहुंच जाएगी, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
कर्नाटक के दो मुस्लिम कांग्रेसी लीडर सरकारों पर ईद की नमाज की अनुमति दिलाने के लिए दबाव बना रहे हैं। उनकी दलील है कि यह मुसलमानों का सबसे बड़ा पर्व है और इसमें ईद की नमाज का सर्वाधिक महत्व होता है। मगर कोरोना संक्रमण क्या ईद के नमाजियों को बख्श देगा ? अब तक यह सवाल किसी मजहबी रहनुमा और इस्लामी संगठनों ने कांग्रेस से नहीं पूछा है। और तो और ऐसे कांग्रेसियों को अब तक आम मुसलमान भी लताड़ने की समझदारी नहीं दिखा पाए हैं। वैसे तो अनर्गल बातों को लेकर मुस्लिम युवक सोशल मीडिया पर सर्वाधिक सक्रिय रहता है। मगर जब सही बात कहने की बारी आती है तो चुप्पी साध लेेता है। लॉकडाउन समय में आपने कई लोगों को रचनात्मक कार्य करते देखा होगा। उसमें से क्या कोई मुसलमान नजर आया ? जबाब मिलेगा बीस करोड़ आबादी वाले इस समुदाय से एक भी नहीं। मुसलमान समुदाय खुद को अति संवेदनशील, परिवर्तनशील होने का दावा करता है,लेकिन कितना है यह सवाल सामने खड़ा है। इनकी तो पूरी जिंदगी और ख्यालात पुराने ढर्रे पर चलते हैं। यदि कोई बदलाव लाने की सलाह भी देता है तो लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं। उसे तुरंत इस्लाम से खारिज करने का फतवा जारी कर दिया जाता है।
 
मरहूम फिल्म अभिनेता इरफान खान बकरीद में पशुओं की कुर्बानी के खिलाफ थे। इसी तरह का विचार एक बार बिहार के गया के निवासी और इस समय डेनमार्क में रह रहे अंग्रेजी साहित्याकार ताबिश खैर ने भी रखा था। तब वह कॉलेज में पढ़ते थे, पर उनके इस विचार पर कट्टरपंथियों ने इतना बवाल काटा कि ताबिश को शहर छोड़कर भागना पड़ा। उनके खिलाफ कट्टरवादियों ने सजा-ए- मौत तक की सजा सुना दी थी। बंद कमरे में इसको लेकर हुई गुप्त बैठक में उस कॉलेज के एक अंग्रेजी के प्रोफेसर भी थे, जिसके छात्र ताबिश थे। अभी समस्त मुलमान और उलेमा पटकथा लेखक और शायर जावेद अख्तर के मस्जिदों में लाडस्पीकर के इस्तेमाल के खिलाफ दिए गए उनके बयान को लेकर उनके पीछे पड़े हुए हैं।
 
देवबंद से इस्लामी शिक्षा ग्रहण करने वाले, मगर बदलते समय पर व्यापक नजर रखने वाले हैदराबाद के मौलाना अब्दुल राउफ पांचजन्य से बातचीत में कहते हैं कि आम मुसलमानों के इर्द-गिर्द कुछ खास लोगों ने ऐसा माहौल बनाया हुआ है कि कोई उसके आगे निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। यदि कोई ऐसा करने की जुर्रत करता है तो उसे तुरत इस्लाम से खारिज कर दिया जाता है। ऐसे में कोई मौजूदा संदर्भ में इस्लाम को रखकर सोचे तो कैसे ? ताबिश खैर की राय में पशुओं की जनसंख्या तेजी से घट रही है, इसलिए बकरीद पर इनकी कुर्बानी की जगह उलेमा को किसी और विकल्प पर विचार करना चाहिए। मसलन पशु की बाजार की कीमत के हिसाब से उनता ही धन गरीबों और निर्धन, सगे-संबंधियों में बांट दिया जाए। पशुओं की कुर्बानी का भी तो यही उद्देश्य है।
इस्लाम के जानकार मानते हैं कि कुर्बानी का चलन शुरू होने से पहले भी इस्लाम था। तब क्या पशुओं की कुर्बानी होती थी ? यदि आज ऐसे सवाल सार्वजनिक रूप से पूछे जाएं तो मुसलमान देशभर उत्पात मचाते हैं। इन सबके बावजूद उलेमा और मुसलमानों को समझना होगा कि समय बदल गया है। उन्हें भी इस हिसाब से अपनी मजहबी मान्यताओं और रहन-सहन को बदलना होगा। अन्य समाज भी उनमें बदलाव देखना चाहता है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में मुसलमानों और दूसरे समुदाय में टकराव की घटनाएं होती रहती हैं। शोध और अनुसंधान हमें नई राह दिखाते हैं। इस्लामिक रहनुमाओं और इस्लामिक अदारों को इस दिशा में बहुत काम की जरूरत है ताकि वे अपनी कौम को समयनुसार गतिशील रहना दिख सकें।