रोजा खोलने के लिए रोटी लेने गए थे बीएसएफ जवान, इस्लामिक आतंकियों के हमले में हुए बलिदान

    दिनांक 22-मई-2020   
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बीएसएफ के जवान जिया उल हक रोजे से थे और दिन भर भूखे-प्यासे रहने के बाद शाम को रोजा इफ्तार के लिए अपने साथी कांस्टेबल राणा मंडल के साथ बाजार गए थे। वहां से जब वे रोटी और कुछ अन्य खाने-पीने का सामान लेकर लौट रहे थे, तभी मोटरसाइकिल सवार लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े नए आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ के इस्लामिक आतंकियों ने उन्हें अपना निशाना बनाया
 
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बलिदानी जवान राणा मंडल और जिया उल हक
आतंकवादियों का कोई दीन—ईमान नहीं होता। उनका केवल एक ही उद्देश्य होता है अपने स्वार्थ के लिए निर्दोषों का खून बहाना। आतंक फैलाने के लिए वे ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का कलमा पढ़ने वाले अपने मजहबी बिरादरी के भाई की भी हत्या करने से गुरेंज नहीं करते। बीते दिनों कश्मीर में बीएसएफ के जवान की हत्या कर उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया। आतंकियों का शिकार बना एक जवान रोजे से था और इफ्तार के लिए खाने-पीने का सामान लेने अपने साथी कांस्टेबल संग बाजार निकला था।
दरअसल घटना जम्मू—कश्मीर स्थित श्रीनगर के सूरा इलाके की है। आतंकियों की गोली का शिकार बने सीमा सुरक्षा बल के जवान जियाउल हक पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से तीस किलोमीटर दूर रेजिना और उसके साथी राणा मंडल मुर्शिदाबाद के साहेबरामपुर के रहने वाले थे। जियाउल हक के परिवार में माता-पिता के अलावा पत्नी नफीसा खातून, दो बेटियां जिसमें पांच वर्षीय मूकबधिर जेशलिन जया और छह महीने की जेनेफर हैं, जबकि राणा मंडल अपने पीछे पत्नी जैस्मीन खातून और एक बेटी को छोड़ गए।
घटना वाले दिन जिया उल हक रोजे से थे और दिन भर भूखे-प्यासे रहने के बाद शाम को रोजा इफ्तार के लिए अपने साथी कांस्टेबल राणा मंडल के साथ बाजार गए थे। वहां से जब वे रोटी और कुछ अन्य खाने-पीने का सामान लेकर लौट रहे थे, तभी मोटरसाइकिल सवार लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े नए आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ के आतंकियों ने उन्हें अपना निशाना बनाया। सरे-राह बीएसएफ के दोनों जवानों को गोलियों से छलनी कर दिया जिससे वे तत्तकाल बलिदान हो गए।
आतंकियों ने उन पर गोली बरसाते समय एक पल के लिए भी यह नहीं सोचा कि जिन्हें वे मारने जा रहे हैं, उनका संबंध भी उसी कौम से है, जिसके नाम पर वर्षों से खून-खराबा करते आ रहे हैं। दो में से एक जवान रोजे से था। हत्यारे आतंकियों ने इसका भी ख्याल नहीं रखा। क्या यही शिक्षा देता है इस्लाम कि किसी भूखे-प्यासे निर्दोष व्यक्ति को मौत के घाट उतार दिया जाए ?
पहले कश्मीर सहित विश्व के विभिन्न हिस्से और अलग-अलग नाम से सक्रिय मजहबी आतंकी संगठन कम से कम रमजान के पवित्र महीने में हिंसा करने से बचते थे। इसके लिए बजाब्ता ‘सीजफायर’ का ऐलान किया जाता था। आम धारणा है कि रमजान के महीने में रोजे रखने के कारण मुसलमान तमाम बुरे कर्मों से दूरी बना लेता है। मगर अब तस्वीर कुछ अलग देखने को मिलती है। इसी रजमान के महीने में जम्मू कश्मीर में पांच से अधिक बड़े आतंकी हमले हो चुके हैं, जिसमें बारह से अधिक सैनिक बलिदान हुए। इस महीने पाकिस्तानी सेना ने भी सीमा पर सीजफायर के उल्लंघन की झड़ी लगाई है।
 
यही नहीं मुस्लिम कटृटरपंथियों ने इसी महीने लीबिया की राजधानी त्रिपोली के हवाई अड्डे को निशना बनाकर उसे तबाह कर दिया। बगदाद हवाई अड्डे के निकट कत्युश राकेट से अमेरिका के सैन्य अड्डे को भी इसी महीने निशना बनाया गया। ऐसी घटनाओं से क्या यह मान लिया जाए कि खून-खराबा में शामिल मुसलमानों की इस्लाम के प्रति धारणाएं बदल चुकी हैं ? इस बारे में दिल्ली फतेहपुरी मस्जिद के इमाम मुफ्ती मुकर्रम कहते हैं कि इस्लाम और कुरान का दृष्टिकोण अपनी जगह आज भी कायम है। बस कुछ लोग अपने हिसाब से इसकी व्याख्या कर इसे बदनाम कर रहे हैं। हैदराबाद के मौलाना अब्दुर्रउफ कहते हैं कि इस्लाम को बदनाम करने वाले मुसलमानों के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का समय अब आ गया है।