तो क्या चीन में कोरोना से साढ़े छह लाख लोग संक्रमित हुए ?

    दिनांक 23-मई-2020   
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कोविड-19 से चीन में कितने लोग संक्रमित हुए, यह ऐसी पहेली है जिसका सही जवाब तो ड्रैगन को ही पता होगा, लेकिन चीन की मिलिट्री से जो जानकारी निकली है, उसके मुताबिक वहां संक्रमितों की संख्या बताए जा रहे आंकड़ों से लगभग आठ गुना ज्यादा है

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यह आशंका कि कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में चीन दुनिया को गुमराह कर रहा है, सच साबित होती दिख रही है। चीन दुनिया को बता रहा है कि उसके यहां वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या लगभग 82 हजार ही हैं, लेकिन यह सच नहीं। सच यह है कि चीन में संक्रमित लोगों की संख्या 6.4 लाख है और जिस समय ये आंकड़े इकट्ठे किए गए, उस समय कम से कम 230 शहर इसकी चपेट में थे। यह जानकारी चीन की मिलिट्री यूनिवर्सिटी से मिली है। हाल के समय में ऐसा दूसरी बार हुआ है जब चीन से कोई अहम जानकारी लीक हुई हो।
इस संदर्भ में एक और बात महत्वपूर्ण है। अमेरिका लगातार चीन पर दबाव बना रहा है कि वह संक्रमण के बारे में दुनिया को जानकारी दे, यह बताए कि कितने लोगों को संक्रमण हुआ, कैसे फैला, इसके लक्षण का पैटर्न क्या रहा वगैरह-वगैरह। लेकिन 22 मई यानी यह खबर जारी किए जाने के समय तक चीन ने 6.4 लाख लोगों को संक्रमित होने की आधिकारिक जानकारी अमेरिका को नहीं दी थी।
कहां से लीक हुआ डाटा
चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सीधे नियंत्रण में चलने वाली नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी से यह डाटा लीक हुआ है। इसके मुताबिक चीन में कोरोनावायरस के संक्रमण के कुल मामले 6.4 लाख थे। लीक रिपोर्ट के मुताबिक मिलिट्री यूनिवर्सिटी ने कोविड-19 के मामलों पर नजर रखने के लिए एक ट्रैकर बना रखा था जिसमें मामलों को अक्षांश, देशांतर और ‘पुष्टि’ के शीर्षकों के साथ रिकॉर्ड किया जा रहा था। लीक रिपोर्ट में फरवरी के शुरू से लेकर अप्रैल के अंतिम सप्ताह तक के आंकड़े हैं। यूनिवर्सिटी ने जो जानकारी संकलित की है, चूंकि उसका वर्गीकरण अक्षांश और देशांतक के आधार पर किया गया है तो उनसे प्रभावित जगहों का ठीक-ठीक अंदाजा हो जाता है। इस आधार पर आंकड़ों के विश्लेषण से उन अपार्टमेंट, सुपर मार्केट, रेलवे स्टेशन, स्कूल जैसी विशिष्ट जगहों की ठीक-ठीक जानकारी मिल जाती है जो प्रभावित हैं। उदाहरण के लिए 14 मार्च को चीन के पूर्वी शहर झिनजियांग के एक केएफसी आउटलेट में कोरोनावायरस का एक केस मिला तो 17 मार्च को हर्बिन के एक चर्च में दो लोग संक्रमित पाए गए।
आंकड़े कितने विश्वसनीय
वैसे तो चीन से आने वाली किसी भी जानकारी के बारे में शर्तिया कुछ भी कहना मुश्किल है, फिर भी आज के समय में जब वहां से वैसी कोई भी सूचना नहीं आ रही है जो दुनिया की आशंकाओं के अनुकूल हो, तो इस तरह की सूचनाओं के सही होने की संभावना तो दिखती ही है। खास तौर पर तब जब चीन के घोषित आंकड़ों और मिल रही जानकारी में आठ गुना का फर्क हो। कोरोनावायरस से निपटने में सेना और इस यूनिवर्सिटी की खासी भूमिका रही है और जरूरी उपकरणों वगैरह को पहुंचाने से लेकर लोगों को क्वारंटाइन करने और संक्रमित लोगों के उपचार तक में ये सक्रिय रही हैं। इसलिए माना जा सकता है कि संक्रमितों के बारे में उसकी जानकारी सही होगी। संक्रमितों के बारे में यह रिपोर्ट तैयार की है झांग हाइसू ने जो यूनिवर्सिटी के इन्फॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन विभाग के निदेशक हैं। यूनिवर्सिटी ने कोरोनावायरस से संक्रमितों की संख्या के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक तो नहीं की है लेकिन उसने मई में एक प्रेस रिलीज जारी करते हुए झांग हाइसू की ताऱीप जरूर की। प्रेस रिलीज में केवल इतना कहा गया कि झांग हाइसू ने “ वायरस से लड़ने” में अहम योगदान दिया जिससे लोगों के लिए काम पर लौटना संभव हो सका।
22 मई के दोपहर 12 बजे तक चीन में संक्रमण के कुल मामले 82,971 थे जिनमें से 78,255 स्वस्थ हो गए और अब तक 4,634 लोगों की मृत्यु हुई है। 21 मई को चार नए मामले आए। अपने यहां संक्रमण को लेकर चीन जो जानकारी दे रहा है, उसके मुताबिक 16 अप्रैल को 19,457 मामले सामने आए और फिर उसके बाद नए मामलों में तेजी से गिरावट आई और 19 अप्रैल को नए मामलों की संख्या 817 रही और 1 मार्च के बाद से, एक-दो दिनों को छोड़कर नए मामलों का ग्राफ फ्लैट ही रहा। पिछले एक सप्ताह के दौरान चीनव में नए मामलों का ग्राफ दहाई में भी नहीं पहुंचा है। 22 मई की दोपहर तक दुनिया भर में संक्रमण के मामले 50.8 लाख और मरने वालों की संख्या 3.32 लाख हो चुकी है, चीन के आंकड़ों पर दुनिया को शुरू से ही संदेह रहा।
कोरोनावायरस के फैलने के बाद यह दूसरा मौका है जब चीन से कोई वैसी खुफिया जानकारी लीक हुई हो, जिसे सरकार की ओर सार्वजनिक नहीं किया गया हो। इससे पहले चीन की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी से जुड़े थिंक टैंक चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ कंटेमपररी इंटरनेशनल रिलेशंस (सीआईसीआईआर) की भी एक जानकारी लीक हुई थी। सीआईसीआईआर का मुख्य काम विदेश और सुरक्षा नीति के मामले में सरकार को सलाह देना है। चीन की सरकार को आवश्यक तैयारी करने के लिहाज से इस संस्था की ओर भेजी गई आंतरिक रिपोर्ट लीक हो गई थी जिसमें कई मोर्चों पर सरकार को आगाह किया गया था। इसमें कहा गया था कि कोविड-19 के संक्रमण के बाद दुनिया भर में चीन के खिलाफ आक्रामकता बढ़ी है और हर कोने से उसके खिलाफ आवाज उठ रही है, अमेरिका के साथ तनाव बढ़ता जा रहा है और अगर स्थिति खराब हुई तो अमेरिका के साथ संभावित युद्ध के लिए तैयार हो जाना चाहिए वगैरह-वगैरह। इसमें यह भी कहा गया था कि संक्रमण के कारण जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उसमें एशिया से लगते समुद्र में झड़प की स्थिति बन सकती है।
वायरस के अध्ययन में बाधा
अमेरिका की जॉन हौपकिन्स यूनिवर्सिटी कोरोनावायरस से जुड़े आंकड़ों को संकलित करती है। वह चीन के बारे में आंकड़ा डीएक्सवाई से लेती है। डीएक्सवाई चीन का एक मेडिकल प्लेटफॉर्म है। यहां राज्यवार संक्रमण की संख्या के बारे में जानकारी मिलती है लेकिन उससे राज्यों से छोटी इकाइयों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। अमेरिका के नेतृत्व में दुनियाभर में वायरस के स्रोत आदि के बारे में जांच-पड़ताल की मांग तेज होती जा रही है। दुनिया को लगता है कि चीन इस बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपा रहा है जिससे वायरस को समझने, इससे बचने के तरीके को खोजने में दि्क्कत आ रही है। इसके अलावा दुनिया को चीन से सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उसने सही समय पर दुनिया को आगाह नहीं किया जिसके कारण लाखों लोग मारे गए और उनकी जान बचाने की कोशिश नहीं की जा सकी। लेकिन चीन की ओर से ऐसी कोई कोशिश नहीं का जा रही है जिससे कोरोना वायरस के स्रोत, इसके फैलाव को लेकर दुनिया के संदेहों का निराकरण हो सके। स्थितियां जैसा आकार लेती जा रही हैं, उससे यही अंदाजा लगाया जा सकताहै कि आनेवाले समय में दुनिया के तमाम देशों और चीन के बीत मतभेद और बढ़ेगा। दिक्कत की बात यह है कि चीन ने कम्युनिस्ट झोली से अपने लिए जो चूं-चूं का मुरब्बा मार्का व्यवस्था तैयार की है, उसमें पारदर्शिता नाम की चीज के लिए कोई जगह नहीं। यह लड़ाई मुख्यतः सोच में उसी अंतर की है।
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी का महत्व
शुरू से ही इसका नियंत्रण सीधे-सीधे सेना के पास रहा है। इस यूनिवर्सिटी का गठन 1953 में हुआ था। तब इसका नाम पीपुल्स लिबरेशन आर्मी मिलिट्री एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग था। 1970 में इसके मुख्य भाग को हुनान प्रांत के चांगशा में ले जाया गया और इसका नाम चांगशा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजू रख दिया गया। 1978 में इसका नाम एक बार फिर बदलकर नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी रख दिया गया। चीन में इस संस्थान के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह संस्थान सीधे तौर पर चीन के सुप्रीम नेता डेंग जियापिंग की देखरेख में था। चीन के पहले परमाणु परीक्षण और अंतरिक्ष कार्यक्रम में भी इस संस्थान की अहम भूमिका रही है। चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल में इस यूनिवर्सिटी का महत्व और भी बढ़ गया है और इसे अत्याधुनिक रक्षा तकनीक विकसित करने के रणनीतिक केंद्र के रूप में विकसित कर दिया गया है। इसके अलावा यहां सैनिकों को उच्चस्तरीय प्रशिक्षण भी दिया जाता है। आज यूनिवर्सिटी का मुख्य कैंपस चांगशा में है और इसकी गतिविधियों में तमाम अहम विषयों को शामिल करने के कारण इसके अन्य जगहों पर भी कई कैंपस खोले गए हैं जिनमें नानजिंग, वुहान, हेफेई के कैंपस खास हैं।