रामजन्मभूमि में मिल रही मूर्तियां अब क्यों नहीं बोल रहे वामपंथी

    दिनांक 23-मई-2020   
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सच छिपाए नहीं छिपता, कभी न कभी सामने आ ही जाता है. अयोध्या में समतलीकरण के दौरान एक बार फिर श्री राम मंदिर के प्रमाण मिलने से वामपंथियों की जुबान पर ताला लग गया है.

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अयोध्या में श्री राम जन्म भूमि परिसर के समतलीकरण का कार्य चल रहा है. इस दौरान वहां 5 फिट आकार की नक्काशी युक्त शिवलिंग की आकृति, कई मूर्तियां , काफी संख्या में पुरावशेष, देवी - देवताओं की खंडित मूर्तियाँ, पुष्प कलश, आमलक, दोरजाम्ब आदि कलाकृतियां, मेहराब पत्थर, 7 ब्लैक टच स्टोन के स्तम्भ एवं 6 रेड सैंड स्टोन के स्तम्भ प्राप्त हुए हैं.
आर्केलाजिकल सर्वे आफ इंडिया की खुदाई में यह बहुत पहले ही प्रमाणित हो गया था कि भगवान राम का जन्म वहीं पर हुआ था और भगवान श्री राम के मंदिर को तोड़कर उसके ऊपर आक्रान्ताओं ने ढांचा बनाया था. मगर वामपंथी विचारधारा के इतिहासकारों ने शुरुआती दौर में ही गलत जानकारी किताबों में प्रकाशित की. एक षड्यंत्र के तहत देश और विदेश में
भारत की गलत तस्वीर प्रस्तुत की गई. उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद श्री राम मंदिर के विषय में झूठ फैलाने वालों की जुबान पहले ही बंद हो चुकी है.
मंदिर निर्माण के लिए हो रहे समतलीकरण में मिलीं पुरातात्विक मूर्तियों ने एक बार फिर उन रोमिला थापर एवं इरफ़ान हबीब सरीखे वामपंथी इतिहासकारों को झूठा साबित कर दिया है.
वामपंथी इतिहासकार अप्रासंगिक हो चुके हैं
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री चम्पत राय की देखरेख में यह समतलीकरण का कार्य चल रहा है. चम्पत राय कहते हैं “ श्री राम मंदिर को लेकर करीब 490 वर्ष तक झगड़ा चला. मुसलमानों की तरफ से पहले यह कहा गया था कि अगर वर्ष 1528 के पहले वहां पर मंदिर साबित हो जाता है तो वो लोग अपना दावा छोड़ देंगे. वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आया. मुसलमानों को आगे आना चाहिए था मगर उन लोगों ने ऐसा नहीं किया. वर्ष 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें दाखिल हुईं. काफी समय तक वहां पर सुनवाई रूकी रही और जब सुनवाई शुरू हुई तो उसे टलवा दिया गया. हमने पूरी उम्मीद लगा रखी थी कि सितम्बर 2017 के पहले सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आयेगा. वातावरण बन चुका था. सुनवाई की प्रक्रिया जैसे ही तेज हुई. दो अधिवक्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि इस मामले की सुनवाई, लोकसभा चुनाव 2019 के बाद की जाय. उन लोगों को डर था कि अगर सुनवाई शुरू हो गई तो इसका फैसला लोकसभा चुनाव के पहले ही आ जाएगा. इसलिए उन लोगों ने उस सुनवाई को टलवा दिया. अब समतलीकरण में मंदिर होने के प्रमाण निकल रहे हैं तो मैं यही कहना चाहूंगा कि वामपंथी इतिहासकार अब अप्रासंगिक हो चुके हैं. इन लोगों ने मिलकर जो झूठ फैलाया था उसका उत्तर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने दे दिया है."
उस जमाने में अल्मोड़ा से काली कसौटी के पत्थर लाये गए थे
इतिहासकार प्रो. मक्खन लाल बताते हैं कि “ सन 1990 में जब समतलीकरण हुआ था उस समय भी मूर्तियां और अवशेष मिले थे. वह सभी साक्ष्य सर्वोच्च न्यायालय में रखे गए थे. बाबरी ढांचा जब ढहा था. उस समय भी मंदिर के साक्ष्य मिले थे. उन साक्ष्यों को भी सर्वोच्च न्यायालय में रखा गया था. वामपंथी इतिहासकार चीखते – चिल्लाते रहे मगर उन लोगों के पक्ष को सर्वोच्च न्यायालय ने झूठ माना. 2.77 एकड़ जमीन ही नहीं बल्कि 67 एकड़ भूमि का क्षेत्र श्री राम मंदिर का परिसर है. सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदुओं के इस पक्ष को सही ठहराया. भारतवर्ष में या अन्य कहीं पर, जो बड़े मंदिर हैं जैसे कि मीनाक्षी टेंपल या फिर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, इन सभी मंदिरों में एक मुख्य मंदिर होता है और उस मंदिर परिसर में दीवार के साथ लगे हुए छोटे-छोटे अन्य मंदिर होते हैं. इसी तरीके से अयोध्या में श्री राम का भव्य मंदिर था. इस मंदिर परिसर में अन्य देवी – देवताओं की जो मूर्तियां लगी हुईं थीं. वो अब समतलीकरण के दौरान निकल रहीं हैं. इसीलिये लगातार यह मांग की जाती रही थी कि केवल 2.77 एकड़ जमीन नहीं बल्कि पूरा 67 एकड़ भूमि हिन्दुओं को मिलनी चाहिए. वर्तमान समय में हिन्दुओं की तरफ से 67 एकड़ भूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने का कार्य शुरू हो चुका है. खुदाई में जो काली कसौटी के पत्थर निकल रहे हैं. यह पत्थर अयोध्या में नहीं पाए जाते. इन पत्थरों को उस जमाने में अल्मोड़ा से ला कर तराशा गया था.
उस समय किसी की हिम्मत नहीं थी ऐसा कहने की -- के.के मोहम्मद

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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक (नॉर्थ) के.के. मोहम्मद कहते हैं कि “मैंने तो वर्ष 1990 में ही यह बता दिया था कि जहां पर राम लला विराजमान हैं वहीं पर भगवान राम का मंदिर था. उस समय यह कहने की किसी की हिम्मत भी नहीं थी मगर फिर भी मैंने इस सचाई को सबके सामने रखा था. वर्ष 1990 में जब समतलीकरण का कार्य चल रहा था. उस समय भी भूमि के अन्दर राम मंदिर होने के साक्ष्य मिले थे. वर्तमान समय में भी समतलीकरण के दौरान राम मंदिर होने के प्रमाण मिल रहे हैं. जब राम लला वहां पर विराजमान थे तब वहां पर ठीक से खुदाई करना संभव नहीं था. अब उस परिसर में खुदाई के दौरान और भी कई साक्ष्य निकल सकते हैं मगर यहां पर एक बात आवश्यक है कि किसी भी प्रकार की खुदाई वैज्ञानिक ढंग से होनी चाहिए. अवैज्ञानिक तरीके से खुदाई या समतलीकरण करने से भूमि के अन्दर दबी हुई पुरातात्विक मूर्तियां को नुकसान पहुंच सकता है. इन सभी पुरातात्विक अवशेषों को एक संग्रहालय में रखा जाना चाहिए ताकि लोग आकर देखें कि प्राचीन काल में भगवान राम का कितना भव्य मंदिर था.