निरक्षरता ने जनता को मानसिक दृष्टि से गुलाम बना दिया: बाबासाहेब

    दिनांक 25-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 40:-

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समाज की निरक्षरता पर चिंता जताते बाबासाहेब कहते हैं, इसी निरक्षरता ने जनता को मानसिक दृष्टि से गुलाम, आर्थिक दृष्टि से दरिद्र, सांस्कृतिक दृष्टि से लूला-लंगड़ा और सामाजिक दृष्टि से पिछड़ा बना दिया। इसी वजह से समाज विदेशी आक्रामकों के विरुद्ध संघर्ष करने की ताकत खो बैठा है। इसका भावार्थ समझने की आवश्यकता है। शिक्षा और शिक्षाशास्त्र की केवल तात्विक चर्चा न करते हुए उन्होंने औपचारिक शिक्षा को नैतिकता से जोड़ने का ध्येयवाद रखा। इस प्रकार उन्होंने अपने शिक्षाचिंतन को एक व्यापक आदर्शवादी, सैद्धांतिक धरातल पर रखा।
बंबई विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि पाने के बाद सन् 1913 में उच्च शिक्षा हेतु वे अमरीका गए। कोलंबिया विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए और पीएचडी की उपाधियां प्राप्त कीं। अनेक चर्चा सत्रों में उन्होंने शोध निबंध भी प्रस्तुत किए। बाद में इंग्लैंड जाने के बाद उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल आफ इकानॉमिक्स तथा ग्रेज इन नामक विश्वमान्य संस्थाओं में अध्ययन किया। वहां उन्होंने एमएससी, डीएसी, एलएलडी, बार एट लॉ की उपाधियां सम्मान सहित प्राप्त कीं। सन् 1952 में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें डीलिट की उपाधि सम्मान के साथ प्रदान की। हर उपाधि के लिए उन्होंने स्वतंत्र संशोधन ग्रंथ लिखे, जो विश्वविख्यात हुए। इनमें प्रमुख रूप से सामाजिक, आर्थिक, वित्तीय विषयों के ग्रंथों का समावेश है। भारत आने पर देश के सामने मौजूद समस्याओं का अध्ययन करके उन्होंने अनेक ग्रंथ लिखे। उनका अध्ययन और लेखन निर्बाध गति से सदा चलता रहा। 67 साल की उम्र में जीवनयात्रा समाप्त होने से कुछ दिन पूर्व उन्होंने महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘बुद्ध और धम्म’ पूरा किया था। उनका समग्र साहित्य 22 खंडों में 15,000 पृष्ठों में ग्रंथित है।