संकटकाल और फर्जी खबरों का संजाल

    दिनांक 26-मई-2020
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शेखर अय्यर
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की शह पर भारत में सोशल मीडिया पर कई फर्जी अकाउंट चलाए जा रहे हैं। इनका मकसद भारत में अराजकता फैलाकर दुनिया को यह दिखाना है कि मोदी सरकार असफल साबित हो रही है। इसमें भारत में बैठे नक्सली-वामपंथी सहयोग कर रहे है
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कोरोना संक्रमण के खिलाफ चल रही बड़ी लड़ाई के दौरान देश के अंदर और बाहर एक दूसरा दानव भी सिर उठाने लगा है-विभिन्न मीडिया प्लेटफार्म—जो फर्जी और झूठी खबरें गढ़कर दुनिया के सामने भारत के सारे प्रयासों को ‘आडंबर’ और ‘निरर्थक’ बता रहे हैं। उनका उद्देश्य भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के प्रति आम लोगों के बीच संदेह पैदा करके उनके संकल्प को कमजोर करना और अपने साजिशी हथकंडों से दुनिया में भारत की एक विफल और नकारात्मक छवि पेश करना है। यह ऐसे लोगों का समूह है, जिन्हें राष्ट्रहित से कोई सरोकार नहीं। उनका स्वार्थ घटनाओं और मुद्दों को तोड़—मरोड़कर पेश करके जनता में भय, तनाव, आशंकाए और भ्रम की स्थिति फैलाकर अपनी निहित स्वार्थ साधना है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने पत्र सूचना कार्यालय के जरिए ऐसी व्यवस्था की है जिसके तहत झूठी खबरों और घटनाओं से संबंधित तथ्यों की तत्काल जांच होगी और सही तस्वीर प्रसारित की जाएगी। सोशल मीडिया के अविवेकी और बेलगाम सूचनाओं के उत्पात पर लगाम लगाने के लिए सही तथ्य ‘अपलोड’ किए गए हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, माईगॉवडॉटइन तथा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट पर लगातार लोगों की शंकाओं का निवारण किया जा रहा है।
कुछ अन्य बड़े निजी मीडिया हाउस ने भी 'न्यूज चेकर' शुरू किए हैं क्योंकि उन्हें भी एहसास है कि कुछ विदेशी ताकतें भी अपने निहित स्वार्थ के लिए भारत की झूठी और फर्जी सूचनाएं वैश्विक मंच पर उछाल रही हैं, पर लोगों को यह समझना होगा कि अंतत: सभी उनका निशाना बनने वाले हैं। हालांकि, उदारवाद का मुखौटा ओढ़े कुछ वामपंथी समूह भी ‘फेक न्यूज चेकर’ के दावे के साथ मैदान में उतर आए हैं, पर घटनाओं और खबरों के उनके अपने अलग ही विवरण हैं, जिनमें आतंकवाद, जिहादी तत्वों और निम्न स्तर की राजनीति के कसीदे भरे हैं।
 
 
सफेद झूठ
छुपे एजेंडे वाले तत्वों द्वारा फैलाई गर्इं झूठी खबरें और उनका सच:
  • ‘प्रधानमंत्री ने इस महामारी से बचाव के उपायों के बारे में निर्णय लेने से पहले भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की नियुक्त टीम से सलाह नहीं ली’। जबकि सच्चाई यह थी कि मोदी ने चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ कई दौर में व्यापक चर्चा की थी।
  • दक्षिण भारत के एक कांग्रेसी नेता ने भारत में बच्चों की बदहाल स्थिति दिखाने के लिए एक ऐसी तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली जिसमें बच्चों के पैरों में बड़े-बड़े छाले हैं। पर वास्तव में वह तस्वीर पाकिस्तान के सिंध के बच्चों की थी जो 2018 में खींची गई थी।

  • एक अन्य फर्जी ट्वीट में बताया गया कि 'अमित शाह ने विश्व हिंदू परिषद के कैडरों को कहा है कि कश्मीर की जनसांख्यिकी में बदलाव करके उसे हिंदू-बहुल राज्य बनाया जाएगा'। जबकि वास्तव में उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था।

  • ऐसे कई ट्वीट और घटनाएं वायरल हुईं जिनमें भारत के कोरोना संक्रमण के स्टेज 3 तक पहुंचने का दावा किया गया-जबकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने बार-बार स्पष्टीकरण दिया था कि यह खबर सिर्फ कुछ क्षेत्रों के ‘स्थानीय प्रसारण’ का हिस्सा थी जिसके कारण मामलों की संख्या बढ़ी दिख रही थी।

  • कुछ ट्वीट में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के संबंध में कहा गया कि उनके सेवाकाल की आयु को घटाकर 58 किया जा रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं। यह झूठी खबर सरकार के खिलाफ कर्मचारियों को उकसाने के लिए गढ़ी गई।

  • एक वेबसाइट के जरिए प्रसारित एक लेख ने दावा किया कि 'प्रधानमंत्री अनुच्छेद 360 के तहत देश में वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने वाले हैं'। इस सरासर झूठी कहानी में बताया गया कि 'देश की अर्थव्यवस्था धराशायी हो चुकी है'।

  • लॉकडाउन के दौरान निहित स्वार्थी एजेंडे के तहत वीडियो ब्लॉग और सोशल मीडिया पोस्ट पर गलत सूचनाएं परोसी गईं कि ‘प्रवासी मजदूरों को घर ले जाने के लिए विशेष रेलगाड़ि़यां चलाई जाएंगी।‘ ये खबरें वायरल हुईं जिससे आम जनता और ज्यादा भयभीत हो गई।
 
 
झूठे प्रचार की हद
फर्जी खबरों का स्तर देखने के लिए उस झूठी कहानी पर नजर डालनी होगी जो जनता को आशंकित करने के लिए केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के स्वास्थ्य के इर्द—गिर्द बुनी गई और उसे लेकर काफी शोरशराबा मचाया गया। जब स्थिति बहुत बिगड़ने लगी तो पुलिस सतर्क हुई और छानबीन के बाद पिछले दिनों अमदाबाद से चार लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिन पर आरोप है कि वे फर्जी ट्विटर अकाउंट बनाकर अमित शाह के स्वास्थ्य के संबंध में गलत सूचना फैला रहे थे। अमित शाह के नाम से एक फर्जी ट्विटर अकाउंट का एक स्क्रीनशॉट उन्हें गंभीर बीमारी से पीड़ित दिखाकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रहा था। अपने भाजपा-विरोधी बड़बोलेपन के सहारे सुर्खियों में रहने का चस्का पाले कुछ मशहूर नेताओं और पत्रकारों ने इस फर्जी ट्वीट को सही ठहराते हुए खूब प्रचारित किया। इन अफवाहों को सोशल मीडिया पर फैलाने वाले चंद दुष्ट लोग तो अपने ट्वीट में उनकी मृत्यु की कामना तक कर रहे थे। अतंत: अमित शाह को एक बयान जारी करना पड़ा कि उनकी सेहत अच्छी है और उन्हें कोई बीमारी नहीं। उन्होंने ट्वीट किया, 'देश अभी कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ रहा है, देश का गृह मंत्री होने के नाते अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण मैंने इन अफवाहों पर ध्यान नहीं दिया। जब मुझे जानकारी मिली तो मैंने सोचा कि अगर ये लोग अपनी कपोल—कल्पना से आनंदित हो रहे हैं तो होते रहें। इसलिए मैंने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया’ उन्होंने आगे कहा, ‘मेरी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों को पिछले दो दिनों से बहुत चिंता हो रही थी। उनकी चिंता को मैं नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसलिए, मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं पूर्ण रूप से स्वस्थ हूं और मुझे कोई बीमारी नहीं है।’अमित शाह ने अफवाह फैलाने वालों को भी धन्यवाद देते हुए लिखा,'मेरे मन में उन लोगों के प्रति कोई नाराजगी या दुर्भावना नहीं है जिन्होंने ऐसी अफवाहें फैलायीं। आपको भी धन्यवाद।’ अमित शाह ने हिंदू मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘ऐसा माना जाता है कि किसी व्यक्ति की बीमारी की गलत खबरें उसकी सेहत को बेहतर और आयु बढ़ाती हैं। इसलिए, मुझे उम्मीद है कि ऐसे सभी लोग इन फालतू बातों को छोड़ देंगे। मुझे अपना काम करने दें और खुद भी अपना काम करें।’

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एबीपी माझा ने मुम्बई में प्रवासी मजदूरों के लिए रेल चलने की फर्जी सूचना को बिना जांचे आगे फैलाया
लेकिन इसे महज एक ‘बेमतलब’ की हरकत कहकर नजरअंदाज करना सही नहीं होगा। इन हरकतों के पीछे मोदी सरकार को समस्याओं में डूबा दिखाने की साजिश छिपी थी। साथ ही, ये मोदी के शीर्ष मंत्रियों के बीच मतभेद की एक झूठी कहानी भी बुन रहे थे और जनता को बरगलाना चाहते थे कि 'सरकार कोरोनो महामारी को संभालने में असमर्थ है।’ वे इन हथकंडों से भाजपा सरकार की छवि धूमिल करना चाहते थे।

पाकिस्तान का छुपा एजेंडा
गौरतलब है कि ये झूठे ट्वीट और मनगढ़ंत कहानियां ऐसे समय में फैलाई जा रही हैं जब पाकिस्तान ने सोशल मीडिया के जरिये भारत के खिलाफ साइबर युद्ध छेड़ रखा है। पाकिस्तान फर्जी अरब, ईसाई और हिंदू पहचान के जरिये मोदी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार कर रहा है। सुरक्षा एजेंसियों और सोशल मीडिया के आम उपयोगकर्ताओं ने स्वतंत्र तौर पर जांच-पड़ताल के बाद पाया कि ट्विटर पर ‘इस्लामोफोबिया इन इंडिया’ जैसे हाल के ‘हैशटैग’ मूल रूप से पाकिस्तान के ‘बॉट’ (आॅटोमेटेड सोशल मीडिया एकाउंट), ट्रोल और पाकिस्तानियों द्वारा चलाए गए। ऐसी दुर्भावना भरी बेलगाम सामग्री के साथ सोशल मीडिया पर धावा बोलने के पीछे उनका उद्देश्य खाड़ी देशों में मोदी के खिलाफ माहौल बनाना और मध्य पूर्व के इलाके में भारत और उसके सहयोगियों के बीच दुराव पैदा करना है।
खाड़ी देशों में भारत के खिलाफ घृणा और अफवाह फैलाने के लिए पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई विभिन्न फर्जी सोशल मीडिया एकाउंट का इस्तेमाल कर रही है। केंद्र्रीय गृह मंत्रालय को सौंपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएसआई खाड़ी के देशों के फर्जी या ‘हैक’ किए गए ‘सोशल मीडिया हैंडल’ के जरिये भारत-विरोधी फर्जी संदेशों को फैलाने में जुटी है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी भारत और खाड़ी के देशों के बीच मतभेद पैदा करने की साजिश कर रही है, क्योंकि इनमें से कई देश तनाव दूर करने, क्षेत्र में शांति बहाल करने और खास तौर पर कोविड-19 के इस संकट काल में मोदी के प्रयासों के प्रशंसक हैं।

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राहुल गांधी का ट्वीट जिसमें भारत में ‘कोरोना के काबू से बाहर’ होने की भ्रामक तस्वीर पेश की गई
 
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को संदेह है कि हाल में 'ट्रेंड' करने वाले दो ‘हैशटैग’—‘शेमआॅनमोदी’ और ‘क्यॉसइनइंडिया’ के पीछे आईएसआई का हाथ था। पाकिस्तान से चलाए जाने वाले एक ट्विटर अकाउंट का नाम बदलकर उसे ‘ओमान की प्रिंसेज’ का बताया गया और उसके जरिए भारत-विरोधी सामग्री ट्वीट की गई। यह भी पाया गया कि पाकिस्तान और खाड़ी के देशों के ऐसे 'ट्रोल हैंडल' की लंबी फेहरिस्त है जिन्हें भारत-विरोधी भावनाओं को प्रसारित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों ने 2019 में भी ऐसा ही चलन देखा था जब संसद द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने से ठीक पहले पूरे राज्य में इंटरनेट पर पाबंदी लगाई गई थी। उस समय सोशल मीडिया समेत विभिन्न माध्यमों से पाकिस्तान ने भरपूर प्रयास किया कि अनुच्छेद 370 को हटाने के मामले में भारत की छवि को धूमिल किया जाए। हालांकि, वह इस कोशिश में औंधे मुंह गिरा था।
सोची—समझी रणनीति
भारतीय अधिकारियों ने गौर किया है कि कोरोना महामारी फैलने के बाद पाकिस्तान ने भारत विरोधी दुष्प्रचार को एक सोची-समझी रणनीति के तहत प्रसारित करने के लिए खाड़ी देशों की प्रमुख हस्तियों के नाम का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। दिलचस्प तथ्य यह है कि इस दौरान बड़ी संख्या में पाकिस्तानी एकाउंट के नाम बदलकर अरब देशों के शाही परिवारों के नाम पर रखे गए। भारत में सांप्रदायिक तनाव के वीडियो को इस तरह फैलाया गया जिससे संदेश यह जाए कि 'भारत में पूरा मुसलमान समुदाय हमले का शिकार हो रहा है'। ध्यान देने वाली बात है कि पिछले दिनों दिल्ली दंगों के दौरान मुसलमानों में भय और घृणा का भाव भरकर उन्हें 'भारत के खिलाफ जिहाद' के लिए उकसाने की मंशा से आईएसआई के 'साइबर सेल' ने ऐसी ही रणनीति अपनाई थी।
भारतीय अधिकारियों को पता चला है कि ऐसे फर्जी ट्विटर एकाउंट को चार वर्गों में बांटा गया है: इनमें से कुछ 'एग्रीगेटर' हैं जबकि अन्य 'फीडर', 'स्प्रेडर' और 'इन्फ्लूएंसर'। 'फीडर' के तौर पर वगीर्कृत ट्विटर अकाउंट 'एग्रीगेटर' से वीडियो या फोटो लेते हैं, जिसके लिए वे भड़काउ संदेश तैयार करते हैं और फिर उन्हें 'स्प्रेडर' को भेज देते हैं। भारतीय अधिकारियों ने जानकारी दी है कि इन 'फीडर्स' में से ज्यादातर ट्विटर अकाउंट को इसी साल जनवरी से अप्रैल के बीच बनाया गया और यह भारत को निशाना बनाने की सुनियोजित साजिश का हिस्सा है।
बड़ी संख्या में 'स्प्रेडर' के तौर पर वर्गीकृत अकाउंट का स्रोत पाकिस्तान पाया गया है। आमतौर पर दुष्प्रचार और झूठ फैलाने वाले इन वीडियो को भारत में विभिन्न समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ उकसाकर देश को 'कश्मीर', 'खालिस्तान', 'द्रविड़स्तान' जैसे 'आजाद देशों' में तोड़ने की बदनीयती से फैलाया जाता है। इन वीडियो की 'एंकरिंग' जानबूझकर श्वेत महिलाओं से कराई जाती है। भारतीय अधिकारियों ने बड़ी संख्या में ऐसे ट्विटर अकाउंट की पहचान की है जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ रोष भड़काने के लिए ग्राफिक, वीडियो और फोटो को साझा करने में किया गया। हालांकि इस बार ज्यादातर 'स्प्रेडर अकाउंट' कुवैत, ओमान, बहरीन, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पाए गए हैं। अच्छी बात यह है कि खाड़ी के देशों को मामले की गंभीरता का अहसास हो गया है और उन्होंने भारत सरकार को आश्वस्त किया है कि परस्पर रिश्तों को खराब करने की ऐसी कोशिशों को वे पूरी तरह से खारिज करते हैं।
क्या है समाधान!
दुष्प्रचार पर अंकुश लगाने के केंद्र सरकार के प्रयासों में निजी क्षेत्र भी मदद कर रहा है। उदाहरण के लिए कोरोना से संबंधित दुष्प्रचार को फैलने से रोकने के लिए व्हाट्सएप ने संदेश को आगे भेजने की सीमा और सुरक्षा सेटिंग को सख्त कर दिया है। ऐसे अभियानों पर अंकुश लगाने के लिए कई तरीके व्यापक तौर पर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इसके लिए कुछ और पुख्ता कदम उठाने होंगे। असली अकाउंट की पुष्टि करना, विश्वसनीय सूचना स्रोतों के पोर्टल को और विशिष्ट पहचान देना और फर्जी सूचनाओं पर लगाम कसने के बेहतर तरीके ईजाद करने के लिए अनुसंधान कोष बढ़ाना जैसे उपाय कारगर हो सकते हैं। बड़े सोशल मीडिया ब्रांड को भी दुष्प्रचार रोकने की एक सख्त अंदरूनी प्रणाली विकसित करनी चाहिए। अनुसंधानकतार्ओं की पहुंच सोशल मीडिया कंपनियों की जानकारी और आंकड़ों तक हो जिससे वे दुष्प्रचार के असर का सही आकलन कर सकें और उस पर अंकुश लगाने के उचित उपाय खोज सकें।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने लॉकडाउन संबंधी आदेश में आपदा प्रबंधन अधिनियम—2005 के खंड 54 का उल्लेख किया है जिसमें कहा गया है कि 'अगर कोई व्यक्ति आपदा, उसकी गंभीरता या आपदा के परिणाम से जुड़ी झूठी सूचना या चेतावनी संबंधी खबरें प्रचारित करता है जिससे लोगों में दशहत पैदा हो, तो संबंधित दोषी व्यक्ति के लिए सजा का प्रावधान किया गया है। मामले में दोष सिद्ध होने पर उस व्यक्ति को एक साल के कारावास या जुमार्ने से दंडित किया जा सकता है।'
गलत सूचना या भ्रामक सूचना वह है जो तथ्यों पर आधारित न हो और जिसे जनमत को प्रभावित करने या सच छिपाने के लिए किया जाता है। इसके खतरे दूरगामी हैं और गंभीर प्रभाव डालते हैं। हमें इसे हर कीमत पर रोकना होगा।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)