नेपाल को चाहिए कि चीन के हाथों का मोहरा न बने

    दिनांक 26-मई-2020
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अनिल झा
नेपाल के साथ हमारा सांस्कृतिक संबंध और रोटी बेटी का रिश्ता रहा है, और वैसे भी नेपाल बहुत लंबी अवधि से हिंदू राष्ट्र रहा है। नेपाल को यह समझना चाहिए और यह ध्यान रखना चाहिए कि वह चीन की कठपुतली न बने.
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भारत के लोगों की नेपाल के प्रति हमेशा सहानुभूति है, भारत में लाखों की संख्या में नेपाल के लोग रोजी रोटी के लिए यहां ऐसे ही आते हैं जैसे कि भारत के अन्य हिस्सों के लोग महानगरों में कामकाज की तलाश में आते हैं।
 
ताजा घटनाक्रम को देखें तो नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का रवैया भारत के प्रति भारतीयों के लिए बड़ा पीड़ादायक रहा है। भारत नेपाल को हमेशा अपने छोटे भाई की तरह मानता आया है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा को सुगम बनाने हेतु भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों 8 मई 2020 उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिला के धारचूला से लिपुलेख तक भारत और चीन को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग का उद्घाटन किया ,इस मार्ग के निर्माण पर काठमांडू ने अपनी आपत्ति जताई ,इसके साथ ही नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ज्ञा बलि ने भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा को तलब कर लिया।
 
साथ ही भारत को कहा कि नेपाल के 7 प्रांत 77 जिले 753 स्थानीय निकाय वाले नेपाल का नया नक्शा प्रकाशित करेंगे और उसमें लिपि या धोरा काला पानी और लिपुलेख नेपाली क्षेत्र हैं उसे प्रकाशित करेंगे।
 
  1. संसद की मंजूरी लेकर के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ने नया नक्शा प्रकाशित किया जिसमें भारत के 395 वर्ग किलोमीटर इन क्षेत्रों को नेपाल ने अपनी सरहदों में दिखाया ।
  2. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा नेपाल द्वारा जारी किया गया नक्शा तत्व हीन ही नहीं अपितु मनगढ़ंत भी है
  3. जबकि यह ऐतिहासिक तथ्य है और सत्य है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारतीय हिंदू ही नहीं अपितु नेपाल के हिंदू भी यात्रा पर जाते रहे हैं।
  4. भारत से कैलाश मानसरोवर यात्रा में पहले 8 से 10 दिन लगा करते थे इस मार्ग के बनने के पश्चात यह दूरी दो दिन की रह जाएगी।
 
पहले पिथौरागढ़ से तवाघाट 108 किलोमीटर और उसके पश्चात तवाघाट से घटिया बगड़ लगभग 20 किलोमीटर एकल लेन और दुर्गम मार्ग था ,और इससे भी ज्यादा कठिन दुर्गम मार्ग घटिया व गढ़ से लिपुलेख तक 80 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था इस मार्ग निर्माण के पश्चात तीर्थ यात्रियों को कैलाश मानसरोवर यात्रा का 85% मार्ग भारत में ही पड़ेगा समय की बचत होगी यात्रा अत्यधिक सुगम हो जाएगी सो अलग।
 
भारत के लिए काला पानी का महत्व उतना ही है जितना कि डोकलाम और डोकलाम को लेकर के भारत का नजरिया साफ है। 1960 से भारतीय चौकियां यहां पर बनी हुई है यह सामरिक महत्व का क्षेत्र है काला पानी से 3 देशों की सीमाएं आपस में लगती है चीन के तिब्बत नेपाल और भारत।
 
पूर्व सेना अधिकारी और रक्षा विशेषज्ञ श्री जी डी बख्शी बहुत चिंतित नजर आते हैं उनके अनुसार नेपाल और हमारा रिश्ता सैकड़ों वर्षों पुराना रहा है वह हमारा सबसे करीबी मित्र हमेशा रहा है। उसे सोचना चाहिए। उन्होंने कहा नेपाल के प्रधानमंत्री को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह किसी के हाथों की कठपुतली न बनें। वह चीन के खिलौने के रूप में काम कर रहे हैं 
 
वैसे भी नेपाल में 2008 में ही लोकतंत्र आया है वहां नया नवेला लोकतंत्र है प्रशासनिक ढांचा कोई बहुत मजबूत नहीं है और चीन इसे अपने आसानी से जाल में फंसा रहा है नेपाल को इस विषय की जानकारी नहीं है ? ' एक तरफ चीन की साम्राज्यवादी नीति है, लालच देकर पहले केपी शर्मा ओली की सरकार को बचाएगी और दूसरा नेपाल को आर्थिक कर्ज का लालच देकर के उसे अपने कर्ज के जाल में उलझा कर रख देगी ,और उसके बाद अपनी साम्राज्यवादी नीति के अंतर्गत अपने सामरिक हितों को साधने का अपना लक्ष्य पूरा करेगी । चीन का एक ही लक्ष्य है पहले इनको कर्जा देकर उनकी सरकार बचाना और उसके एवज में अपने सारे सामरिक हितों के लक्ष्य को पूरा करना। मुझे डर लग रहा है नेपाल कहीं दूसरा तिब्बत न बन जाए।
चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के अंतर्गत तिब्बत के लहासा से काठमांडू तक रेल मार्ग बिछाना चाहती है और नेपाल सरकार ने उस पर अपनी सैद्धांतिक मंजूरी भी दे दी है अब इतने लंबे रेल मार्ग के निर्माण में स्वाभाविक है नेपाल सरकार के पास न तकनीक है न धन है यह सारा धन चीन उपलब्ध करवाएगा और इस मार्ग से चीन अपने सारे उत्पादक सामान को नेपाल में ख पाएगा।
 
चीन पाकिस्तान की तरह जैसे सीपैक चीन से ग्वादर पोर्ट तक रास्ता बना रहा है और पाकिस्तान कर्ज़ के जाल में चीन के साम्राज्यवादी नीति में फंस गया है उसी प्रकार से दूसरा शिकार इस नेपाल का होने जा रहा है।
 
वह कहते हैं कि भारत को सावधान रहने की जरूरत है चीन ने पहले पाकिस्तान को अपना शिकार बनाया अपनी साम्राज्यवादी नीति में उसने पूरे पाकिस्तान में सीपैक के रास्ते से ग्वादर पोर्ट तक अपना बेस कैंप बना लिया है इसके पश्चात श्रीलंका के हंबनटोटा मैं उसने अपने सामरिक हितों को साध लिया है और आज लंका उसके आगे बेबस नजर आ रहा है। यही हालत मालद्वीप की भी है। नेपाल को यह सब समझना चाहिए। आखिर भारत के पश्चिम उत्तर और दक्षिण तीन तरफ से चीन की एक घेराबंदी हमें चिंतित करती है।
वैसे 2015 में भारत और चीन के बीच लिपुलेख मार्ग को दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार मार्ग में शामिल कर लिया था। अब प्रश्न उठता है नेपाल की बढ़ती आपत्तियों को किस संदर्भ में देखा जाए और यह भौगोलिक राजनीति क्यों बदलती हुई नजर आ रही है इस पर हमें गहराई से विचार करना पड़ेगा।
 
थोड़ा हमें पीछे की ओर जाना होगा इतिहास के पन्नों को खंगालना होगा और एक और विभाजन की ओर जहां हम नहीं देखते हैं वहां पर देखने की जरूरत है लगभग 205 वर्ष पहले सुगौली संधि ।
 
जब हम विभाजन की बात करते हैं तो भारत के पंजाब और बंगाल के विभाजन का नजारा हमारी नजरों के सामने आता है और हम उस विभीषिका को झेलते हैं यह विभाजन क्यों हुआ।
 
लेकिन 205 वर्ष पूर्व सुगौली संधि के माध्यम से भारत का एक विभाजन और हुआ था जो वक्त के थपेड़ों के साथ इतिहास के पन्नों मैं दब गया इस विभाजन की न ही चर्चा होती है ना हमारी पीढ़ियों को पढ़ाया जाता है।
भारत का मिथिला राज्य जिसकी राजधानी जनकपुर थी और सुगौली संधि के माध्यम से मिथिला का लगभग 52% भूभाग नेपाल के हिस्से में चला गया और आज भी उत्तर बिहार और नेपाल में और भोजपुरी भाषा भाषी गोरखपुर और उसके उत्तर में भोजपुरी भाषा भाषी नेपाल और भारत के लोगों में रोटी बेटी का रिश्ता है ,नेपाल की दूसरी राजभाषा मैथिली है।
 
4 मार्च 1816 ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटिश इंडिया मैं और नेपाल के राजा के द्वारा समझौता हुआ जिसे सुगौली संधि के नाम से जाना जाता है यह बिहार के चंपारण में सुगौली स्थान पर हुआ इस संधि के अनुसार मिथिला का लगभग 52% भूभाग नेपाल को दे दिया गया।
 
नेपाली राजा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच शांति समझौते के अंतर्गत नेपाल के राजा को गढ़वाल कुमाऊं के भूभाग की एवज मैं मिथिला के मैदानी क्षेत्रों को अंग्रेजों ने दे दिया।
 
नेपाल की ओर से राजगुरु गजराज मिश्र और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से पेरिस ब्रेड शा ने सुगौली संधि पर हस्ताक्षर किए थे
 
इस संधि के अनुसार काठमांडू में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि की नियुक्ति होगी।
 
नेपाल के गोरखा राजशाही अपनी सेना में किसी भी अमेरिकी या यूरोपीय कर्मचारियों की भर्ती नहीं करेंगे और साथ ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में गोरखा लड़ाकों की भर्ती का रास्ता खुल गया। आजादी के बाद भारत में भी यह क्रम जारी रहा गोरखा रेजिमेंट भारत का एक प्रमुख हिस्सा है ।
 
इस संधि से पहले नेपाली सेना में कई फ्रांसीसी कमांडरों की नियुक्ति हुई थी ,नेपाली सैनिकों को प्रशिक्षण देने हेतु और इस प्रकार गोरखा सेना नेपाल के राजा के प्रति कमजोर होती गई।
 
सुगौली संधि के अंतर्गत 1816 में ही गोरखपुर से उत्तर का जो मैदानी या तराई नेपाली क्षेत्र है ,वह और बिहार के उत्तर में मिथिला का कुछ हिस्सा नेपाल की राजशाही को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दे दिया गया था।
 
इसके पश्चात 1860 में तराई भूमि का हिस्सा नेपाल को 1857 के भारतीय विद्रोह को दबाने में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता करने की एवज में पुनः बड़ा भूभाग लौटा दिया गया और उसी समय मिथिला का मूल स्वरूप बिगड़ गया और 52% हिस्सा नेपाल के हिस्से में चला गया।
 
200 वर्ष पूर्व के कालखंड को आप देखें तो नेपाल के राजा की जो विस्तार वादी नीति थी वह उत्तर की तरफ नहीं जा सकता था क्योंकि वहां हिमालय था सिर्फ वह अपने दक्षिण हिस्से की ओर बढ़ सकता था तो गढ़वाल और कुमाऊं के राजाओं से जीता हुआ प्रदेश और 25 वर्ष अपने पास रखा और उस समय अखंड भारत की कोई वैसी तस्वीर नहीं थी जैसे कि आज है ।
क्योंकि नेपाल से लेकर के दक्षिण भारत तक कई हिंदू राजाओं रजवाड़ों का अपने अपने आधिपत्य क्षेत्र हुआ करते थे।
जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को नेपाली विस्तार वादी नीति की भनक लगी तब नेपाल के गोरखा सेनाओं के साथ 2 वर्ष का लंबा संघर्ष हुआ और उसके पश्चात सुगौली संधि के माध्यम से भारत के मिथिला प्रांत का बंटवारा हो गया और उसी समय से पुनः (25 वर्ष के कालखंड को अगर छोड़ दिया जाए) गढ़वाल और कुमाऊं के क्षेत्र भारत का हिस्सा है।
 
इसके साथ ही सुगौली संधि के अनुसार महाकाली नदी जिसे काला पानी नदी भी कहा जाता है को भारत और नेपाल के बीच की सीमा रेखा मान लिया गया। कई झरनों के आपस में मिलने के पश्चात महाकाली नदी का निर्माण होता है और नेपाल यह कहता है जो झरने भारत की तरफ हैं वही सीमा रेखा मान ली जाए जबकि भारत का कहना है जहां से झरने आकर के मिलते हैं और नदी का स्वरूप बनता है वही सीमा रेखा है।
 
भारत ने 1830 के टेस्ट रिकॉर्ड भी नेपाल को दिखाएं हैं।
 
इसके साथ ही 1996 में महाकाली नदी समझौता पानी बंटवारे हेतु नेपाल और भारत के बीच हो चुका है तब नेपाल में कोई आपत्ति नहीं जताई थी ।
 
हमें 2015 के नेपाल में मधेशी आंदोलन की ओर भी जाना पड़ेगा नेपाल के तराई क्षेत्रों में मैथिली और भोजपुरी लोगों का यह कहना है कि नेपाल के संविधान में तराई के क्षेत्रों को समुचित अधिकार नहीं दिए गए हैं । तब यह कहा गया कि इस आंदोलन को हवा भारत के तरफ से मिल रही है । जबकि ऐसा कतई नहीं था। भारत हमेशा नेपाल की मदद करते आया है। भारत से नेपाल को पेट्रोल व अन्य जरूरी सामान भेजा जाता है।
नेपाल राष्ट्रपति के पूर्व सचिव राजेंद्र देहल के अनुसार भारत के साथ कई बार हमने टेबल टॉक करने का प्रयास किया है और इस मुद्दे को सुलझाने के लिए प्रयास पिछले कई वर्षों से जारी है।
राजेंद्र देहल के अनुसार भारत को यह कभी नहीं मानना चाहिए की नेपाल चीन के उकसाने अनुसार कोई अपना बयान दे रहा है नेपाली लोगों का स्वाभाविक संबंध और लगाव भारत के प्रति है और नेपाल में 90% हिंदू आबादी है जो भारत के साथ सांस्कृतिक एकता को बनाए रखना चाहती है ।
दहल के अनुसार नेपाल और भारत के मध्य 1890 किलोमीटर बॉर्डर लगता है उसे दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व को मिल बैठकर सामंजस्य पूर्ण तरीके से निपटाना होगा।
 
जब राजेंद्र देहल से पूछा गया की 1996 में काला पानी जल बंटवारे को लेकर के आपसी सहमति बनी तब तो इस भूमि विवाद पर कोई आपत्ति नेपाली सरकार ने नहीं जताई । इस पर वह कहते हैं उस समय मैं ही वहां रिपोर्टिंग कर रहा था और हमने तब भी अपनी बात रखी थी उस समय आई के गुजराल भारत के प्रधानमंत्री थे लेकिन बात आई गई हो गई।
 
आगे बढ़ते हुए राजेंद्र देहल कहते हैं 1999 में जब गिरजा प्रसाद कोइराला प्रधानमंत्री थे उन्होंने तो यहां तक कह दिया था जब तक हमारा सीमा विवाद का हल नहीं निकलेगा तब तक मैं भारत की यात्रा ही नहीं करूंगा।
 
चीन के प्रभाव और दबाव के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा चीन अपनी बेल्ट एंड रोड योजना के तहत हमारे यहां पर रेलवे लाइन और रोड निर्माण करना चाहता है लेकिन अभी हमने इसकी कोई सहमति नहीं दी है क्योंकि नेपाली जनता भारत की एवज में चीन को स्वीकार शायद ही कर पाएगी।
 
भारतीय रक्षा विशेषज्ञ श्री अश्विन सिवाच के अनुसार जब यह मार्ग पिछले 10 वर्षों से बन रहा था तब तो नेपाल की कोई आपत्ति नहीं थी ,लेकिन जब भारतीय रक्षा मंत्री ने इस मार्ग का उद्घाटन किया तभी से आपत्ति होनी शुरू हुई।
 
इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन के अपने सामरिक हित हैं नेपाल उसकी कठपुतली बनता जा रहा है। नेपाल को समझना चाहिए कि भारत उसका शत्रु नहीं उसका मित्र है। 
( लेखक भाजपा नेता हैं एवं पूर्व विधायक रहे हैं )