मुसलमानों का एक वर्ग वक्त और हालात देखते हुए पुराने रीति-रिवाजों में चाहता है बदलाव

    दिनांक 26-मई-2020   
Total Views |
मस्जिदों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा हाल में दिए गए एक निर्णय के बाद इस मुददे पर गहमागमी बढ़ गई है। इस मामले में रूढ़ीवादी उलेमा और मुसलमानों का एक वर्ग जहां अपने पुराने स्टैंड पर आज भी कायम है, वहीं दूसरा वर्ग वक्त और हालात को देखते हुए पुराने रीति-रिवाजों में बदलाव चाहता है।
m_1  H x W: 0 x
मस्जिदों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा हाल में दिए गए एक निर्णय के बाद इस मुददे पर गहमागमी बढ़ गई है। इस मामले में रूढ़ीवादी उलेमा और मुसलमानों का एक वर्ग जहां अपने पुराने स्टैंड पर आज भी कायम है, वहीं दूसरा वर्ग वक्त और हालात को देखते हुए पुराने रीति-रिवाजों में बदलाव चाहता है। यही नहीं विरोध के भय से उपर उठकर ऐसे मामलों में अब खुलकर अपनी राय भी रखने लगा है।
 
बता दें कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए लाकडाउन की स्थिति में देश ही नहीं विदेश के भी अधिकांश हिस्से में मजहबी गतिविधियों पर पाबंदी लगी हुई है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के कुछ मुसलमान रमजान के महीने में मस्जिदों से लाउडस्पीकर से अजान देना चाहते थे। मगर वहां के जिलाधिकारी ने इसकी इजाजत नहीं दी। इससे वहां के बहुजन समाज पार्टी के नेता अफजल अंसारी इतने नाराज हुए कि इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। पिछले दिनों इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर ने मस्जिदों से लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध का फैसला सुना दिया। इस बारे में कोर्ट का कहना था कि अजान इस्लाम का हिस्सा है, पर लाउडस्पीकर नहीं। इससे उत्पन्न ध्वनि से लोगों की नींद खराब होती है। ध्वनि मुक्त नींद व्यक्ति के मूल अधिकारों का हिस्सा है। कोई दूसरा इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। इससे पहले बॉलीवुड सिंगर सोनू निगम अजान में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर आपत्ति उठा चुके हैं। इस मामले में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में ध्वनि प्रदूषण एक्ट 2000 का हवाला देते हुए रात दस बजे से सुबह छह बजे तक मस्जिदों से लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करार दिया था।
 
इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्णय आने से ठीक पहले चर्चित पटकथा लेखक और शायर जावेद अख्तर भी अपने दो ट्वीट में मस्जिदों में अजान के लिए लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर विरोध जता चुके हैं। इसके बाद से कट्टर मुसलमानों की ओर से उन्हें खूब खरी-खोटी सुनने को मिली। जावेद अख्तर अपने एक ट्वीट में लिखते हैं कि भारत में पचास साल पहले मस्जिदों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को गुनाह समझा जाता था। इसके बाद इसका इतना इस्तेमाल बढ़ा कि कोई सीमा नहीं रही, लेकिन अब यह खत्म होना चाहिए। अजान ठीक है। मगर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से दूसरे लोगों को परेशानी होती है। अपने एक अन्य ट्वीट में जावेद अख्तर कहते हैं कि मंदिर हो या मस्जिद। कभी किसी फेस्टिवल पर लाउडस्पीकर हो तो चलेगा, पर रोज-रोज यह ठीक नहीं।
अजान में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक को लेकर आए इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और जावेद अख्तर के बयान को लेकर एक बार फिर इसके पैरोकारों की भवें तन गई हैं। रूढ़ीवादी मुल्ला ही नहीं इस्लाम का हिमायती एक कथित बौद्धिक वर्ग इस्लाम में हस्तक्षेप का आरोप लगाकर इसकी मुखालफत कर रहा है। कुछ ऐसे ही लोगों ने लाकडाउन में दुबई में फंसे गायक सोनू निगम की जिंदगी के लिए खतरा पैदा कर दिया था। सोशल मीडिया के माध्यम से उनके अजान में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल का विरोध करने वाले बयानों को ट्रोल कर दुबई में उनके खिलाफ पूरा ताना-बाना बुन दिया था। बाद में किसी तरह स्थिति काबू में आई।
 
हालांकि ऐसा नहीं है कि तमाम उलेमा और सभी मुसलमान अजान में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के हिमायती हैं। ऐसे लोगों की संख्या कम है, पर समय-समय पर वे सामने आते रहे हैं। मगर इस वक्त काफी मुखर दिख रहे हैं। मुंबई के मोहम्मद अली उर्फ बाबू खां काफी अर्से से मस्जिदों में लाडडस्पीकर के इस्तेमाल के विरोध में आंदोलनरत हैं। अब तक सात मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतरवा भी चुके हैं। उनके मुताबिक, लाउडस्पीकर से अजान देने से उसकी मूल आत्मा मर जाती है। अजान देने का तरीका वही है जिसे हजरत बेलाल ने शुरू किया था। अखिल भारतीय मुस्लिम महिला निजी कानून बोर्ड की सदर शाइस्ता अंबर का कहना है कि सबसे पहले मदीना में नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद बनाई गई। तब जरूरत महसूस की गई कि लोगों के नमाज का समय याद दिलाने और एक जगह इकट्ठा करने का कोई उपाय हो। पैगंबर मोहम्मद ने जब इस बारे में सहाबा इकराम यानी मजहबी मित्रों से परामर्श किया तो इस बारे में चार प्रस्ताव सामने आए। उसके बाद ही किसी उंचे स्थान से अजान देने का चलन शुरू हुआ। बाद में मस्जिदों में मीनारेें बनने लगीं, जिसके अंदर से अजान दी जाने लगी। बाद में घनी आबादी होने पर अजान के लिए लाउडस्पीकर का चलन शुरू हो गया। हालांकि इस पर तमाम उलेमा एकमत हैं कि अजान के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल इस्लाम का हिस्सा नहीं है।
 
मस्जिदों में लाडस्पीकर के इस्तेमाल की मुखालाफत करने वालों का कहना है कि समय के अनुसार मुसलमानों को अपने चाल-चलन में भी बदलाव लाना चाहिए। जब जरूरत थी लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया गया। अब जरूरत नहीं है तो इसे बंद कर देना चाहिए। इस्लाम में मुसलमानों को पांच वक्त नमाज पढ़ने का हुक्म है। सभी नमाजियों को नमाज पढ़ने के समय के बारे में पता होता है। मोबाइल या किसी और जरिए से समय देखकर मस्जिद पहुंचा जा सकता है। तुर्की जैसे इस्लामिक देशों में मस्जिदों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बिल्कुल मना है। इसी तरह नीदरलैंड की सात से आठ प्रतिशत मस्जिदों में ही लाउडस्पीकर पर अजान दी जाती है जबकि जर्मनी, स्वीटजरलैंड, फ्रांस, यूके, आस्ट्रेलिया, नार्वे, बेल्जियम में अजान की समय सीमा तय है। यानी पांच में किस समय मस्जिदों से लाउडस्पीकर से अजान पुकारी जा सकती है। लाओस और नाइजीरिया में यह प्रतिबंधित है। जर्मनी में अजान को लेकर एक बार तीखा विरोध प्रदर्शन हो चुका है।
दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के इमाम डॉक्टर मुफती मुकर्रम अहमद कहते हैं कि इस्लाम में पड़ोसियों का आला रूतबा है। लाउडस्पीकर से अजान देने पर किसी को परेशानी होती है तो इससे बचना चाहिए या आवाज कम कर देनी चाहिए। लाउडस्पीकर से अजान देने के पक्ष में मुस्लिम मौलाना खालिद रशीद फरंगी भी नहीं हैं। इस समले में शिया उलेमा मौलाना कल्बे जव्वाद का कहना है कि लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के मामले में प्रशासन की भूमिका अहम है। उसे देखना चाहिए कि कहां इसकी अनुमति दी जाए, कहां नहीं। उनके कहने का अर्थ है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में तो यह स्वीकार हो सकता है, पर दूसरे इलाके में यह नापसंद किया जा सकता है। लोगों की परेशानियों को देखते ही केरल के मलाप्पुरम के मुसलमानों ने अजान में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को स्थगित कर दिया है। वजक्कड़ इलाके की सबसे बड़ी मस्जिद वालिया जुमा मस्जिद के प्रबंधकों की पहल पर शहर की तमाम 17 मस्जिदों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। वालिया जुमा मस्जिद में केवल एक टाइम लाडस्पीकर से अजान पुकारी जाती है। वजक्कड़ मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष अब्दुल अजीज का कहना है कि लाउडस्पीकर से अजान देने के कारण व्यापारियों और शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों की एकाग्रता भंग होती है। इसलिए दूसरों की परेशानी को देखते हुए लाउडस्पीकर से अजान देने पर कमेटी ने रोक लगाने का निर्णय लिया है।