अलख की आड़ में अपराध

    दिनांक 26-मई-2020
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चंद्रप्रकाश
मीडिया का एक वर्ग इस तरह के खेल बहुत सफाई से खेलता रहा है। अक्सर लोग इन खबरों के पीछे के व्यापक षड्यंत्र को समझ नहीं पाते। यह कोई सामान्य फेक न्यूज नहीं, बल्कि ‘आपराधिक फेक न्यूज’ है।
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बीते दिनों इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट छापी, जिसमें दावा किया गया कि तब्लीगी जमात मामले में मौलाना साद के खिलाफ सबूत के तौर पर जो आॅडियो क्लिप जमा किया गया, वह फर्जी है। दिल्ली पुलिस ने तत्काल इसका खंडन करते हुए कहा कि रिपोर्टर ने इस बारे में उसके किसी भी अधिकारी से पुष्टि की कोशिश नहीं की। बात आई-गई हो गई। लेकिन यह मानकर चलिए कि कुछ दिन बाद ऐसी ही कुछ और झूठी रिपोर्ट पत्र-पत्रिकाओं एवं चैनल पर आएगी। इन सभी का उद्देश्य एक ही होगा-तब्लीगी जमात और मौलाना साद के खिलाफ पुलिस की जांच को संदिग्ध बना देना। हो सकता है कि इनका उपयोग न्यायालय में होने वाली सुनवाई में भी किया जाए। यह पहली बार नहीं हो रहा है। मीडिया का एक वर्ग इस तरह के खेल बहुत सफाई से खेलता रहा है। अक्सर लोग इन खबरों के पीछे के व्यापक षड्यंत्र को समझ नहीं पाते। यह कोई सामान्य फेक न्यूज नहीं, बल्कि ‘आपराधिक फेक न्यूज’ है।
 
पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोग जानते हैं कि ‘आधिकारिक सूत्रों’ या ‘खबरी’ से मिले समाचारों के गलत साबित होने का जोखिम हमेशा रहता है। यह पत्रकारिता के पेशे का एक हिस्सा है। किसी समाचार का आधिकारिक खंडन उसे देने वाले संवाददाता के लिए बहुत बड़ा झटका होता है, क्योंकि इससे उसकी और उसके संस्थान की विश्वसनीयता पर बुरा असर पड़ता है। लेकिन बीते कुछ साल में ऐसे ढेरों कथित संवाददाता और मीडिया संस्थान पनप चुके हैं, जिन्हें खबरों के खंडन से फर्क नहीं पड़ता। इस प्रपंच में केवल नए मीडिया संस्थान ही नहीं, बल्कि इंडियन एक्सप्रेस, इंडिया टुडे, टाइम्स आॅफ इंडिया, दैनिक भास्कर, द हिंदू, एनडीटीवी जैसे पुराने और जाने-माने नाम भी शामिल हैं। ऐसे मुख्यधारा मीडिया संस्थानों में सबसे बड़ी फेक न्यूज का उत्पादन महज संयोग नहीं है।
यह सोचना गलत है कि फेक न्यूज मात्र सोशल मीडिया का परिणाम है। लेकिन यह सच है कि सोशल मीडिया ने उसे तेजी से फैलाता है। बीते कुछ सालों में फैलाई गई सबसे बड़ी फेक न्यूज मुख्यधारा मीडिया से ही जन्मी। चाहे राफेल मामला हो या जज लोया मामला या इन दिनों चाइनीज वायरस को लेकर फैलाई जा रही झूठी खबरें, ये सारी खबरें बाकायदा बनाकर संगठित तरीके से फैलाई गईं। उदाहरण के लिए जब कोई मीडिया संस्थान दावा करता है कि ‘भारत में चाइनीज वायरस तीसरे चरण में पहुंच चुका है और सरकार इस बात को छिपा रही है,’ तो यह ज्यादा जरूरी है कि उसके पास अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त तथ्य हों। समाचार सही है तो यह आम जनता के लिए उपयोगी होगा, लेकिन गलत हुआ तो इस के विध्वंसकारी परिणाम हो सकते हैं। भ्रम और घबराहट की स्थिति पैदा हो सकती है। आज बड़ी संख्या में मजदूरों के पलायन की जो परिस्थिति पैदा हुई है, उसके पीछे एक बड़ा कारण ऐसी झूठी खबरें भी हैं।
 
इसी तरह, एनडीटीवी ने जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के हवाले से झूठ फैलाया कि भारत में तीन महीने में 25 करोड़ लोग कोरोना विषाणु से संक्रमित हो जाएंगे। यह अतिउत्साह या किसी पत्रकार की कम समझ से पैदा झूठी खबर नहीं थी। ध्यान से देखने पर इसके पीछे पूरी तैयारी और योजना दिखाई देती है। दरअसल, अमेरिका में जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी से जुड़े कुछ लोगों से यह मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार करवाई गई, जो विश्वविद्यालय से अधिकृत नहीं थी। फिर भी इसके कथित नतीजों को 'बहुत बड़े खुलासे' की तरह प्रकाशित किया गया। इस झूठ के लिए जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी को इसलिए चुना गया, क्योंकि चाइनीज वायरस से जुड़े सबसे प्रामाणिक अध्ययन और शोध इसी संस्थान से आ रहे हैं। ऐसे में लोग आसानी से जाल में फंस जाते हैं। कोई यह जांचने की कोशिश नहीं करता कि इसमें कोई धांधली तो नहीं। महामारी का यह काल दुनियाभर की ढेरों मेडिकल उपकरण, दवा और टेस्टिंग किट बनाने वाली कंपनियों के लिए एक अवसर है। तीन माह में 25 करोड़ मरीज होने का झूठ फैलेगा तो इससे लोगों में घबराहट भी फैलेगी और सरकार पर कथित अध्ययन के हिसाब से तैयारी करने का दबाव बनेगा। चाहे वेंटिलेटर हो या दूसरे मेडिकल उपकरण, अभी सबकुछ बेचने वाला एकमात्र देश चीन है। इसलिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि एनडीटीवी की फर्जी खबर के पीछे उद्देश्य क्या था? निश्चित रूप से यह एक आपराधिक झूठ था, जिसे षड्यंत्र के तहत गढ़ा गया था।
ऐसा लगता है जैसे विश्वसनीयता की अब चिंता किसी को नहीं है। ऐसे कई मीडिया संस्थान, जिनके पास साहसी और निष्पक्ष पत्रकारिता की विरासत है, वह भी कई बार झूठी खबरें चलाने से खुद को नहीं रोक पाते। यह इस बात का संकेत है कि जरूर फेक न्यूज की इस आंधी के पीछे कोई अर्थशास्त्र काम कर रहा है। मतलब, झूठी खबरें छापने और फैलाने के लिए पैसे भी मिलते हैं। चाइनीज वायरस को लेकर एनडीटीवी की फर्जी खबर भी इसी अर्थशास्त्र की तरफ इशारा करती है। हाल के दिनों में इस तरह की फर्जी खबर का सबसे बड़ा मामला राफेल विमान सौदे से जुड़ा था। राफेल सौदे को लेकर कांग्रेस जब मौजूदा सरकार पर आरोप लगा रही थी, तब निश्चित रूप से कई लोगों की रुचि यह जानने में थी कि वाकई कोई गड़बड़ी तो नहीं हुई है, क्योंकि भारत में रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार का लंबा इतिहास रहा है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचते ही मामला साफ हो गया। न्यायालय में ही इससे जुड़ी कई फर्जी खबरों की सच्चाई भी सामने आई। यह समझना बहुत मुश्किल नहीं था कि कुछ मीडिया संस्थान राफेल सौदे पर इस लिए भ्रम पैदा करने की जुगत में थे ताकि सर्वोच्च न्यायालय सौदे को रद्द कर दे और लड़ाकू विमान बनाने वाली अन्य अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों को मौका मिल जाए। एक समाचार चैनल ने तो यह समझाना शुरू कर दिया था कि राफेल ही क्यों? अमेरिकी कंपनी तो उससे सस्ते में लड़ाकू विमान दे रही है, जबकि उस कंपनी के विमान भारत के शत्रु राष्ट्र के पास भी हैं। तो क्या चैनल बिना आर्थिक स्वार्थ के यह लामबंदी कर रहा था? यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब सुबह राहुल गांधी पत्रकार वार्ता करके आधारहीन आरोप लगाते थे और शाम को आजतक व इंडिया टुडे चैनल राष्ट्रीय सुरक्षा के इस विषय पर बहस कराके उसे अनावश्यक तूल देने में जुट जाते थे।
 
फेक न्यूज और पुरस्कार
मीडिया में एक व्यवस्था विकसित हुई है। जैसे ही कोई पत्रकार फेक न्यूज के लिए बदनाम होता है, फौरन उसे कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार दिलवाकर उसकी विश्वसनीयता बहाल करने की कोशिश की जाती है। कुछ उदाहरण देखिए-
  • कश्मीर के जिन फोटोग्राफरों ने भ्रामक तस्वीरें खींचकर दुनियाभर में भारत को बदनाम करने की कोशिश की, उन्हें पुलित्जर पुरस्कार मिल गया।

  • द क्विंट पोर्टल की जिस पत्रकार के फर्जी स्टिंग आॅपरेशन के कारण सेना के एक जवान ने आत्महत्या कर ली, उसे राष्ट्रपति के हाथों रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिलाया गया। ध्यान देने की बात है कि राष्ट्रपति सेना का सर्वोच्च कमांडर होता है।

  • 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले झूठी खबरों की बाढ़ ला देने वाले एनडीटीवी चैनल के एक पत्रकार को मैग्सेसे पुरस्कार दिलाया गया।

  • भाजपा के सदस्यता अभियान को लेकर झूठी रिपोर्ट छापने वाले इंडिया टुडे के पत्रकार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिलाया गया।

  • झूठी खबरों के लिए बदनाम आजतक और एनडीटीवी साल दर साल सर्वश्रेष्ठ हिंदी और अंग्रेजी चैनल का पुरस्कार विज्ञापनदाताओं की तरफ से पाते हैं।
बीबीसी एक विदेशी मीडिया संस्थान है जो ब्रिटेन के करदाताओं के पैसे से चलता है। आपराधिक षड्यंत्रकारी झूठी खबरें गढ़ने में उसका कोई तोड़ नहीं है। कुछ दिन पहले इसने यह झूठ फैलाया था कि भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) संकट में है। एलआईसी कोई सामान्य कंपनी नहीं है, जिससे जुड़ी इतनी बड़ी खबर इस तरह दी जाए। एलआईसी में जमा हर पैसे पर केंद्र सरकार संप्रभु गारंटी देती है। ऐसे में एलआईसी को लेकर फैलाया गया कोई भी झूठ सामान्य नहीं माना जाना चाहिए। यह एक तरह से भारत की संप्रभुता पर भी हमला है। इन सबसे क्या यह समझना कठिन है कि एलआईसी को नुकसान पहुंचाने के पीछे किन कंपनियों का व्यापारिक हित जुड़ा हो सकता है? क्या पत्रकारिता के नाम पर ऐसी संगठित आपराधिक गतिविधि की अनुमति दी जा सकती है? जहां तक पत्रकारीय संस्थाओं की बात है, इन प्रवृत्तियों पर रोक लगाने कह जिम्मेदारी उनकी थी। लेकिन अब तक का अनुभव यही कहता है कि वे इन षड्यंत्रों के मूकदर्शक नहीं, बल्कि अच्छे खिलाड़ी हैं। एडिटर्स गिल्ड नाम की संस्था तो ऐसे दागी संपादकों से भरी पड़ी है। इसका प्रमुख ही भारत में ऐसे संगठित फेक न्यूज का सबसे बड़ा चेहरा है। उसने कुछ साल पहले सेना पर मनमोहन सिंह सरकार के तख्तापलट के प्रयास का झूठ फैलाया था। फिर किससे उम्मीद की जाए? किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया का स्वतंत्र होना जरूरी है। लेकिन यह स्वतंत्रता उच्छृंखल नहीं होनी चाहिए। ऊपर के उदाहरण बताते हैं कि मीडिया की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हो रहा है। अगर मीडिया इसका हल नहीं निकाल पा रहा है तो लोकतंत्र के बाकी घटकों को दखल देना ही पड़ेगा। जनता का भी उत्तरदायित्व है कि वह ऐसे स्वार्थी, कपटी मीडिया संस्थानों और पत्रकारों की पहचान रखे और उनकी गतिविधियों को समझे।