कोरोना संकट में भारत-निर्माण का पैकेज

    दिनांक 26-मई-2020
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विकास पांडे 
मोदी सरकार ने कोरोना महामारी सेे उत्पन्न संकट को साहसिक फैसले से एक स्वर्णिम अवसर में बदल दिया है जिसके दूरगामी फायदे होंगे
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अर्थव्यवस्था में एक और एक दो शायद ही होता हैं। मोदी सरकार द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज के बारे में यह कथन पूरी तरह लागू होता है। कोविद 19 ने दुनिया भर की मजबूत अर्थव्यवस्थाओं को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। पहली बार ऋणात्मक जीडीपी ग्रोथ के अनुमान व्यक्त किए जा रहे हैं। भारत में प्रवासी मजदूरों का पलायन एक अभूतपूर्व घटना है। सरकार को कई मोर्चे पर एक साथ लड़ना पड़ रहा है। ऐसे में सरकार पर राहत पैकेज घोषित करने का भरपूर दबाव था। राजस्व और वित्तीय घाटे की स्थिति को देखते हुए यह साफ था कि सरकार के पास विकल्प सीमित हैं।
लाखों की संख्या में पैदल लौटते मजदूरों के दृश्य कौतूहल और दर्द की तस्वीर पेश कर रहे हैं। यह पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की शहरीकरण आधारित अर्थव्यवस्था माॅडल पर करारा तमाचा भी है। इसके उलट मोदी सरकार ने बजाए नगद राहत देने के राष्ट्र पुननिर्माण पर जोर दिया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को वास्तविक अर्थ में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। कई साल की दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों के कारण रोजगार के मौके सिर्फ कुछ महानगरों और बड़े शहरों तक सिमट कर रह गए हैं।गांवों को सिर्फ मनरेगा जैसी योजनाओं का झुनझुना थमाया गया- नतीजा असंतुलित विकास और महानगरीय पलायन का दर्द। मोदी सरकार का पैकेज इस मामले में राहत पैकेज नहीं है,यह भारत निर्माण का पैकेज हैं। इसके साथ कई और फैसले किए गए हैं जिससे भारत का कायाकल्प करने का विजन साफ दिखता है।
पैकेज की खास बात कृषि सुधार
पैकेज की सबसे खास बात है कृषि-सुधार पर जोर। यहां याद रखने वाला तथ्य है कि कृषि 60 प्रतिशत जनसंख्या का बोझ संभालती है लेकिन जीडीपी में योगदान सिर्फ 15 प्रतिशत ही है।इसलिए कई मायने में यह 1991 के मनमोहन-राव आर्थिक-सुधारों से भी बड़ा है। तत्कालीन सुधार से खेती बिलकुल अछूती रह गई थी। भारतीय किसान की सबसे बड़ी समस्या रही है उसके उत्पाद का सही मूल्य न मिलना। वह कहां बेचेगा, किसे बेचेगा और किस कीमत पर बेचेगा-यह एपीएमसी एक्ट में निर्धारित है। एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी के सख्त प्रावधानों ने भारत के किसानों को मुनाफाखोर आढ़तियों के हवाले कर दिया। इससे एक तरफ तो कंज्यूमर फूड इंफ्लेशन यानी खाने-पीने की चीजे मंहगी मिलती रही और साथ-साथ किसानों की हालत बद से बदतर होती गई। इस व्यवस्था में सिर्फ दलालों का वर्चस्व रहा।

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हैरानी की बात है कि 1991 और बाद के सुधारों में इस पहलू को क्यों नजरअंदाज किया गया। देश में मंडी व्यवस्था बिचैलियों का स्वर्ग बन चुकी है, यह जानते हुए भी सरकारों ने निहित स्वार्थों के मजबूत प्रभाव के कारण कदम नहीं उठाया गया। 2016 में महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़नवीस सरकार ने कुछ फलों और सब्जियों को विनियमित करने की कोशिश की थी,लेकिन वे सफल नहीं हुए। मोदी ने एक झटके में इसे अप्रासंगिक बनाकर किसानों की खुशहाली का रास्ता खोल दिया है।
खेती से भारत का कायाकल्प करने का खाका
  •  एक लाख करोड़ रुपये से पोस्ट-हार्वेस्ट आधारभूत ढांचे का निर्माण

  •  ईपीएमसी एक्ट में संशोधन कर किसान के लिए खेती का बाजार खोलना

  •  कृषि-उत्पादों के लिए राष्ट्रीय बाजार का निर्माण

  •  कृषि में निजी-निवेश को प्रोत्साहन
इस एक्ट की सबसे बड़ी खामी यह थी कि किसान सिर्फ उन्हीं को उत्पाद बेच सकता था जिनके पास एपीएमसी का लाइसेंस था। मोदी सरकार ने किसानों को दशकों की बेड़ियों की जकड़न से मुक्त कर दिया। इससे करोड़ों किसानों की आमदनी बढ़ने का रास्ता साफ हो गया। इससे आने वाले समय में खेती में त्वरित विकास देखने को मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्र अर्थव्यवस्था में मांग का बड़ा केन्द्र बनेगा और जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी बढ़ेगी। किसानों के मजदूर बनकर महानगरों में पलायन का सिलसिला थमेगा।
भारत-निर्माण पैकेज की दूसरी खासियत मध्यम और लघु-उद्योगों पर जोर है।सरकार ने सूक्ष्म,लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों को परिभाषित कर दिया गया। अक्सर देखा गया है कि लघु-उद्योग इंस्पेक्टर राज के डर से बडे नहीं होना चाहते। सरकार ने साफ कर दिया कि उद्योगों का आकार बढ़ने पर भी विनियमन में बदलाव नहीं होगा। अगर गौर से देखें तो सूक्ष्म और लघु उद्योग काफी हद तक खेती से ही जुड़े हैं। इससे किसानों क लिए बाजार निर्माण में भी मदद मिलेगी।
कई भाजपा शासित राज्यों ने श्रम-कानूनों में क्रांतिकारी सुधार की पहल की है। हालांकि मजदूर संगठन इन सुधारों का विरोध कर रहे है।लेकिन यह विरोध किसी ठोस तर्क पर आधारित नहीं है।अधिकतर कुटीर और लघु-उद्योगों का चरित्र मौसमी या चक्रीय है। ऐसे में वर्तमान श्रम-कानून अप्रासंगिक हैं और आद्योगिक विकास में नकारात्मक भूमिका ही निभाते हैं। इसके अतिरिक्त 3 लाख करोड़ की रियायती दर पर क्रेडिट लाइन मुहैया कराकर उद्यमियों को उद्योग लगाने के स्वर्णिम अवसर प्रदान किया है।
भारत-निर्माण पैकेज की खासियत यह कि इसमें समन्वित विकास पर जोर है। यानी कृषि-क्षेत्र में सुधार किया गया है, तो इसके साथ कुटीर और लघु-उद्योगों के लिए कदम उठाए गए है।यह दोनों ही सेक्टर आपस में जुड़े हैं।
अब उद्योगो को प्रोत्साहित करने के लिए उत्पादन के तीनों साधन-भूमि,श्रम और पूंजी तीनों पर ही ध्यान दिया गया है। अब उद्यमियों के पास सस्ता श्रम, तकनीक, भूमि, सस्ती पूंजी और बाजार सब है। 10 मेगा कलस्टर जोन बनाने की घोषणा की गई है जिससे बड़े पैमाने पर आद्योगिक ईकाइयां स्थापित होगी और गांव के नजदीक छोठे शहरों में भी रोजगार सुजन होगा। इससे मजदूरों का पलायन रुकेगा। गैर-बैंकिंग कंपनियों को सरलता समस्या से निपटने के लिए 30,000 करोड़ की विशेष विंडो दिया गया है।

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मनरेगा का बजट एक लाख करोड़ कर दिया गया है। इससे भूमिहीन मजदूरों के हाथ में पैसा जाए, इसकी व्यवस्था है। काॅरपोरेट टैक्स सुधार पहले ही किए जा चुके हैं। अब यह एशिया में सर्वाधिक प्रतिस्पर्धी है। इस परिदृश्य में हमने राज्य के प्रोत्साहनों की चर्चा नहीं की है। कई राज्य स्टांप ड्यूटी में छूट, सस्ती जमीन, बिजली टैरिफ पर छूट, और ब्याज पर भी सब्सिडी दे रहे हैं।
भारत सरकार देश के आठ शहरों में 2 करोड़ 20 लाख वर्गफीट औद्योगिक जमीन का पूल तैयार किया है। इससे बड़े उद्योगों को जमीन अधिग्रहण के लिए नहीं जूझना पड़ेगा।पिछले पांच साल में 1000 से ज्यादा पुराने कानूनों को समाप्त किया गया है।
भारत-निर्माण पैकेज के एक-एक खंड को देखने से शायद ही कुछ समझ आए। लेकिन आप गौर करिए कि मोदी सरकार ने करोड़ों जनधन खाते खुलवाकार और आधार से इसे जोड़कर न सिर्फ वित्तीय समावेशन किया है बल्कि यूपीएराज के फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाया है। अब सरकार का पैसा सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुंच रहा है।
मोदी एक वेंचर कैपिटलिस्ट की तरह सोचते हैं। वे एक या दो योजनाओं पर निर्भर नहीं करते, बल्कि कई योजनाएं प्रारंभ करते हैं। इनमें से जो योजना बेहतर करती हैं वे उसका आकार बड़ा कर देते हैं। जैसे उज्जवला योजना, जनधन, डिजिटलाइजेशन, किसान सम्मान निधि योजना, कानून काफी सफल रहे हैं।भारत निर्माण पैकेज में भी इस रणनीति की साफ झलक है।
कांग्रेस किसानों को हमेशा से कर्ज माफी जैसे लाॅलीपॉप देती रही है। जिससे सिर्फ बड़े नेताओं और निहित स्वार्थी तत्वों को ही फायदा हुआ है। मोदी सरकार इसके उलट किसानों और मजदूरों का आत्म-निर्भर बनाने की सोच रखती है। भारत-निर्माण पैकेज में भी तात्कालिकता की प्रवृत्ति से बवने की कोशिश की गई है और दूरगामी कदम उठाए गए है। लोकल पर वोकल स्वदेशीकरण की आत्मा है।शहर और गांव के मध्य उत्पन्न असंतुलन को भी दूर करने की कोशिश इस पैकेज में की गई है।