आखिर क्यों है स्वदेशी और स्वावलंबन पर आधारित विकास मॉडल की जरूरत

    दिनांक 26-मई-2020
Total Views |
गिरीश चंद्र त्रिपाठी
गांवों से शहरों की ओर जिन लोगों का पलायन हो रहा है, वह रोजगार की तलाश में हो रहा है। इससे गांव की समस्याएं भी बढ़ रही हैं और शहरों की भी समस्याएं बढ़ रही हैं। इन दोनों की समस्याओं के समाधान का एकमात्र तरीका है है कि हम स्वदेशी और स्वावलंबन पर आधारित विकास के मॉडल को अपनाएं जो हमारा स्वीकृत माॅडल है। जिसकी परिभाषा और जिसका स्वरूप तिलक जी, गांधी जी, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने समाज के सामने रखा।
p_1  H x W: 0 x
पृथ्वी पर मनुष्य का प्रादुर्भाव होने के साथ ही उसकी आवश्यकताओं का क्रम भी आगे बढ़ा और इन आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रयासों के साथ ही मनुष्य और समाज का जुड़ाव आर्थिक क्रियाओं के साथ हुआ। यहीं से आर्थिक क्रियाओं के एक क्रमबद्ध स्वरूप की स्थापना और शुरूआत होती है। उपभोग, उत्पादन, विनियम, वितरण इन आर्थिक क्रियाओं का धीरे-धीरे क्रमिक विकास शुरू हुआ और इनके माध्यम से मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति प्रारम्भ की। मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के इस क्रम में आर्थिक विकास की शुरूआत भी होती है और यहीं से हमारे सामने इस विकास के दो प्रारूप खड़े होते हैं।
पहला प्रारूप वह है, जिसमें मनुष्य अपने और अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने को आर्थिक क्रियाओं के साथ सम्बद्ध करता है। अर्थात एक उपभोक्ता के रूप में एक उत्पादक के रूप में, एक फर्म के रूप में, एक उत्पादन के साधन के रूप में, वह अपनी भूमिका को समझता और स्वीकार करता है। विकास के इस प्रारूप में उत्पादन का उद्देश्य मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति है, अर्थात यह उपभोग आधारित विकास का माडॅल है, जिसमें मनुष्य वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन अपने और अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है। धीरे-धीरे परिवार का विचार हमारी समझ में आता है परन्तु हमारा गांव भी हमारा परिवार है। हमारा जनपद भी हमारा परिवार है। हमारा प्रान्त और राष्ट्र भी हमारा परिवार है और इसी के साथ-साथ यह सम्पूर्ण वसुधा एक परिवार है। इसीलिए अपनी, अपने परिवार, अपने गांव, अपने प्रांत, राष्ट्र और वसुधा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हम उत्पादन के प्रारूप को स्वीकार करते हैं और उसका निर्वाहन प्रारम्भ करते हैं।
 
p_1  H x W: 0 x
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों स्वदेशी पर जोर देते हुए लोगों को इसे अपनाने का आग्रह किया था

विकास के इस प्रारूप में अलग-अलग लोग समाज के अलग-अलग संघटक और इनके साथ प्रकृति के संघटक भी मिल करके एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करते हैं। यहां उनकी परस्पर निर्भरता का विचार रहता है परन्तु परस्पर निर्भरता के इस विचार के बावजूद वे स्वाबलंबी हैं। विकास के इस प्रारूप में न केवल हमारी आश्यकताओं की पूर्ति होती है बल्कि इस प्रारूप में समाज और प्रकृति में एक संतुलन भी बना रहता है। यह संतुलन इसलिए रहता है, क्योंकि इसमें साधन और साध्य की शुचिता का विचार भी शामिल है। साधनों का चयन करते समय हम साधनों की शुचिता का भी ध्यान रखते हैं, अर्थात हम हर उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम हर साधन का प्रयोग नहीं कर सकते। वही स्वीकार्य है जो न्यायोचित और धर्मसंगत है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के साथ ही हम एक प्राकृतिक, सुसंगत, सरल, स्वाभाविक और स्थायी विकास का माॅडल खड़ा करते हैं क्योंकि कोई चीज स्थायी नहीं हो सकती।
स्वदेशी माॅडल में हम जिन आवश्यकताओं का चयन करते हैं वे भी जस्टिफाइड हैं और इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिन साधनों का चयन करते हैं वे भी जस्टिफाइड हैं। प्रकृति सुसंगत हैं। इसलिए हमारा उत्पादन व उपभोग का माॅडल और इनके साथ-साथ बाद में प्रकांतर से विनिमय और वितरण के जो आयाम जुड़ते हैं उनकी भी शुचिता और पवित्रता सुनिश्चित रहती है। इसलिए यह हमारा विकास का प्रारूप है। यह स्वदेशी माॅडल है। यह स्वदेशी माॅडल होने के साथ ही स्वाबलंबी और सरल माॅडल है। यह स्वाभाविक माॅडल होने के साथ ही स्थायी माॅडल है। इसमें सर्वत्र संतुलन रहता है। केवल मनुष्यों और संघटकों के बीच ही संतुलन नहीं रहता बल्कि मनुष्य और समाज के साथ ही प्रकृति के दूसरे संघटकों के साथ भी संतुलन रहता है।
विकास के इस माॅडल के समानान्तर एक दूसरा माॅडल भी खड़ा होता है। विकास के इस प्रारूप में हम उत्पादन इसलिए नहीं करते कि हमें उन उत्पादित वस्तुओं का उपभोग व चयन स्वयं करना है या मेरेे परिवार को करना है। हम उन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बाजार की मांग की संतुष्टि के लिए करते हैं। इसलिए इस प्रकार के प्रारूप में उपभोग और उत्पादन के साथ-साथ विनिमय और वितरण इन सबमें जितने भी संघटक हैं, उनमें प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है। उत्पादन के संसाधनों के बीच प्रतिस्पर्धा हैै। उपभोक्ताओं के बीच भी प्रतिस्पर्धा है। अलग-अलग संघटकों के बीच भी प्रतिस्पर्धा है। यहां मनुष्य और प्रकृति के बीच भी एक प्रतिस्पर्धा खड़ी होती है और विकास के इस माॅडल में आर्गनाइज्ड मोड आफ प्रोडक्शन केन्द्रों का विकास शुरू होता है। जहां उपभोग होना है वहां उत्पाद हो, यह आवश्यक नहीं। हम उत्पादन के बड़े-बडे़ केन्द्र खड़े करते हैं। मार्केट डिमांड को इंजेक्ट करने की व्यवस्था होती है। अनेक तरीकों से बाजार में मांग इंजेक्ट की जाती है। यह प्रक्रिया शुरू होने पर हमारी आवश्यकताओं की शुचिता के साथ-साथ साधनों व साध्य की शुचिता का विचार समाप्त हो जाता है।
जब साधनों और साध्य की शुचिता का विचार समाप्त हो जाता है तब इन अलग-अलग संघटकों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण इनकी परस्पर निर्भरता उनके स्वाबलंबी जीवन को समाप्त करती है। परस्पर निर्भरता पहले वाले स्वरूप में भी थी परन्तु इस परस्पर निर्भरता के साथ भी लोग स्वावलंबी थे। वे परोपजीवी नहीं थे। इसके साथ-साथ उनमें उद्यमशीलता के विचार का भी जन्म होता था। अगर हमारी आवश्यकताएं हैं तो हमें अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने लिए अपने उद्यम पर भी भरोसा करना है। अर्थात यह समाज केवल अपनी आवश्यकताओं पर विचार नहीं करता था, केवल उत्पादनों पर विचार नहीं करता था, केवल तकनीक पर ही विचार नहीं करता था बल्कि इस बात पर भी विचार करता था कि हमारी आवश्यकताएं हैं तो हमें अपनी इन आवश्यकताओं की पूर्ति इन उद्यमों और अपने पुरुषार्थ के आधार पर स्वयं करनी है।
 
p_1  H x W: 0 x
स्वदेशी एवं स्थानीय चीजों की मांग बढ़ेगी तो यकीनन ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाला पलायन रुकेगा
 
वहीं दूसरा माॅडल माॅर्केट सोर्सेज पर आधारित है। विकास का यह माॅडल सरल और स्वाभाविक न होने के कारण जटिल है। स्थायी न होने के कारण अलग-अलग समूहों के बीच और स्वयं मनुष्य और प्रकृति के बीच खड़ा हुआ है। वह एक भारी चुनौती है। इस असंतुलन ने विकास के स्थायित्व की चुनौती भी हमारे सामने खड़ी कर दी है। जैसा कि हमने कहा कि आज लाखों लोग उन उत्पादन केन्द्रों के सामने आने से बेरोजगार हुए। अब यह समस्या केवल उन लोगों, औद्योगिक केन्द्रों या उत्पादन ईकाइयों के सामने नहीं है। यह समस्या पूरी अर्थव्यवस्था के सामने है। इस चुनौती का सामना करने के लिए हम स्वदेशी-स्वावलंबी विकास के माॅडल पर काम कर सकते हैं।
स्वतंत्रता मिलने के समय देश की आर्थिक विकास की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी परन्तु उन विकासकर्ताओं ने इस बात पर बहुत विचार किया था कि हमको अपने देश को स्वावलंबी बनाने के साथ ही इसके स्वदेशी चरित्र को बनाए रखना है। अलग-अलग योजनाओं में यह विचार कुछ दिनों तक चलता रहा परन्तु फिर दूसरे देशों के माॅडल की काॅपी करते-करते विकास का माॅडल तैयार किया गया। संसाधनों का उपयोग अपने लिए कम और दूसरों की संतुष्टि के लिए ज्यादा किया गया। आज बाजार हमारे उपभोग का साधन नहीं है। हमारी आवश्यकताओं की संतुष्टि का केवल एक साधन मात्र नहीं है, बल्कि बाजार उपभोग कर रहा है।
ऐसी स्थिति में हमें यह भी विचार करने की आवश्यकता है कि हम फिर अपने उस विकास के प्रारूप को न केवल अपने लोगों, अपने गांव और अपने जनपद के लिए बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था और सम्पूर्ण भूभाग के लिए माॅडल के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं। आज पूरे विश्व के सामने ससटेनेबल डेवलपमेंट एक भारी चुनौती है। विकास का एक क्रम प्राप्त करना एक चुनौती है। विकास और ग्रोथ हासिल करना निश्चित रूप से एक चुनौती है। इसलिए जब हमारे यहां आर्थिक विकास के प्रश्न पर विचार होता है तो आर्थिक विकास केवल ग्रोथ के इंडीकेटर्स का एक प्रारूप मात्र नहीं है बल्कि उसके और जीवन के साथ अन्य आयाम भी जुड़ते हैं। हमारी सोच जुड़ती है, हमारा स्वाभाव जुड़ता है और हमारा विचार जुड़ता है। इसलिए हमारे यहां गांधी जी ने स्वदेशी पर बेहद अधिक जोर दिया। इसका उद्देश्य था कि हम छोटे और कुटीर उद्योग को ग्रामीण और स्थानीय स्तर पर इस प्रकार प्रारम्भ करें जिससे स्थानीय संसाधनों का उपयोग के साथ-साथ लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। अर्थात साधन और साध्य की शुचिता के विचार के साथ-साथ समाज खड़ा हो। ऐसा समाज सरल होगा, स्वाभाविक होगा, स्थायित्व भरा और संतुलित होगा और लोगों बीच समन्वय स्थापित करेगा। यह मनुष्य और प्रकृति के बीच समन्वय का एक विकल्प खड़ा करेगा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी इस स्वदेशी माॅडल की चर्चा की। पंडित मदनमोहन मालवीय, तिलक जी और आजादी के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले सभी लोगों का विचार था कि देश की आजादी के बाद यह देश अपने विकास के एक ऐसे माॅडल का चयन करेगा, ऐसा स्वरूप सामने खड़ा करेगा जिसमें हम स्वदेशी उद्यमिता के विकास के साथ-साथ एक आत्मनिर्भर, स्वावलंबी और स्वाभाविक विकास का माॅडल प्रस्तुत करेंगे। इसमें प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भूमिका होगी। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका निभाने के साथ-साथ एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करता हुआ स्वाबलंबी और आत्मनिर्भर जीवन जियेगा। दूसरे के ऊपर निर्भर जीवन जीने से ज्यादा कष्टदायी और कोई विचार नहीं हो सकता। आत्मनिर्भर जीवन से ज्यादा सुखदाई दूसरा कोई विकल्प हो नहीं सकता। संक्षेप में दुख और सुख के बीच एक विभाजन रेखा हमारे चिंतकों ने खींची थी।
अगर हम स्वावलंबी जीवन जी रहे हैं तो हमारा जीवन हमारे सुख के उद्देश्य को आगे बढ़ाने में सफल होगा। हमें मानव जीवन मिला है। मानव जीवन प्रारम्भ से ही आनंद और सुख-शांति की तलाश में रहता है। इसलिए अगर हमारा जीवन आत्मनिर्भर और स्वावलंबी है तो ऐसी स्थिति में हमारा यह जीवन हमारे सुख व प्रसन्नता का आधार बनेगा। हमारी शांति का उद्देश्य पूरा करने में सफल होगा। अगर हमारा जीवन परावलंबी है, दूसरे पर निर्भर है, हम उपभोग के लिए दूसरे पर निर्भर हैं, उत्पादन के लिए दूसरे पर निर्भर हैं, रोजगार के लिए दूसरे पर निर्भर हैं तो ऐसी स्थिति में अपनी आवश्यकता के चयन में भी दूसरे पर निर्भर होंगे। जैसा विज्ञापन कंपनी समझायेगी वैसा ही आवश्यकता की पूर्ति के लिए वस्तुओं का चयन करेंगे। फिर हम विज्ञापनों के माध्यम से यह चयन करते हैं कि हमारी आवश्यकता की पूर्ति के लिए कौन सी वस्तु उपयुक्त है और यह वस्तु कहां से आनी चाहिए। इस वस्तु का उत्पादन हमारे देश में हुआ है तो ठीक अथवा किसी अन्य देश में हुआ है तो ज्यादा उपयोगी है, यह विचार भी हमारे सामने खड़ा है। जैसा कि मैंने कहा कि विकास के दो माॅडल हैं। एक माॅडल वह जो उपभोग है जिसमें हम साधन और साध्य की शुचिता के विचार के साथ-साथ मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। उसकी प्रसन्नता, आनन्द, सुख और शांति की ओर बढ़ने के प्रयास में यह माॅडल सहायक होता है।
 
p_1  H x W: 0 x
सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों के मजबूत होने से ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति सुधरेगी
 
दूसरी ओर जो बाजार आधारित माॅडल है, उसमें हम बाजार की मांग की संतुष्टि के लिए उत्पादन करते हैं। यह स्वावलंबी नहीं है, सरल नहीं है, स्वाभाविक नहीं है। इसलिए उसमें स्थायित्व नहीं है, संतुलन नहीं है। इसमें अर्थव्यवस्था में रोजगार का संकट इसलिए है क्योंकि अलग-अलग लोग अपने को अलग अलग कामों के लिए तैयार करते हैं। अब विभिन्न कामों के लिए किस तरह के लोगों की आवश्यकता है, यह बात वह तय करते हैं। इसलिए व्यापार व उद्योग को जिस तरह के लोगों की आवश्यकता है, वे लोग हमारे पास उस अनुपात में नहीं हैं जिस अनुपात में आवश्यकता है। किस तरह के लोगोें को हम तैयार कर रहे हैं। इस तरह के लोगों के लिए बाजार में रोजगार नहीं हैं अर्थात एक असंतुलन है। मैन पावर है पर उसके लिए रोजगार नहीं है। रोजगार के अवसर हैं पर उसके लिए उपयुक्त लोग नहीं हैं। इसलिए स्वावलंबी विकास का माॅडल अपनाया जाए।
स्वावलंबी विकास के माॅडल में प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे का पूरक होते हुए भी आत्मनिर्भर रहता है, स्वाबलंबी रहता है। उसमें उद्यमशीलता का भाव जन्म लेता है। आज हमारे युवकों में इस बात को बढ़ाने की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि उनमें उद्यमशीलता का विकास हो। अलग-अलग क्षमता से युक्त अलग-अलग स्थानों पर उपलब्ध संसाधनों के आधार पर वहां के लोगों को योग्यता और क्षमता के आधार पर काम मिले। हर पढ़ा लिखा आदमी वापस गांव नहीं जाना चाहता। इसलिए जनसंख्या का जो केन्द्रीयकरण हो रहा है। विकास का जो दूसरा प्रारूप चुना गया, वह गांव की ओर नहीं गया। आर्गनाइज्ड बोर्ड आॅफ प्रोडक्शन शहरों में खड़ा हुआ क्योंकि शहरों में सुविधाएं पहले से थीं। उन सुविधाओं का लाभ उठा करके वे आर्गनाइज्ड बोर्ड आॅफ प्रोडक्शन खड़े हुए। गांवों से शहरों की ओर जिन लोगों का पलायन हो रहा है वह रोजगार की तलाश में हो रहा है। इससे गांव की समस्याएं भी बढ़ रही हैं और शहरों की भी समस्याएं बढ़ रही हैं। इन दोनों की समस्याओं के समाधान का एकमात्र तरीका है यह है कि हम स्वदेशी और स्वावलंबन पर आधारित विकास के मॉडल को अपनाएं जो हमारा स्वीकृत माॅडल है। जिसकी परिभाषा और जिसका स्वरूप तिलक जी ने, गांधी जी ने, महामना पंडित मदन मालवीय जी ने समाज के सामने रखा है। वह यदि हमारे विकास का माॅडल बने तो ऐसा माॅडल न केवल उत्पादन की निश्चितता सुनिश्चित करेगा बल्कि हमारे उपभोग की शुचिता भी सुनिश्चित करेगा। वह न केवल साध्य की शुचिता सुनिश्चत करेगा बल्कि साध्य की शुचिता पर भी हमारा ध्यान केन्द्रित करेगा। यह अर्थव्यवस्था में संतुलित विकास और एक स्थायी विकास का माॅडल होगा और वह लोगों के सुख, आनंद, शांति का आधार बनेगा।
मालवीय जी स्वदेशी की भावना को देशभक्ति की भावना का महत्वपूर्ण अंग समझकर उसका संचार आवश्यक समझते थे। उनकी धारणा थी कि गहरा, गाढ़ा, उत्कृष्ट अन्य सब भावों को दबा देने वाला अपने देश का प्रेम ही स्वदेशी का अर्थ है। स्वदेशी आंदोलन की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया था कि इसका मूल उद्देश्य देश की आर्थिक दशा को सुधारना है। उनका कहना था कि देश की दशा तभी सुधर सकती है जब देश में देशी चीजों का व्यापार बढ़े और जो हमारे नित्य की आवश्यक चीजें हैं वे यहीं पर बनने लगें। उनका कहना था कि मैं हमेशा स्वदेशी चीजों का उपयोग करता रहा हूं और देश सेवा को ईश्वर उपासना मानता हूं।
आज आवश्यकता है कि स्वदेशी व स्वावलंबन पर आधारित इस विकास माॅडल को समझने की और इसे समाज में लोगों को समझाने की और इसे स्वीकार करने की। आवश्यकता समझाने की ज्यादा है। ऐसा नहीं है कि लोग इसे जानते नहीं और ऐसा भी नहीं है कि लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे। आज सरकार इस दिशा में प्रयास कर रही है। अलग-अलग जनपदों का चयन करके अलग-अलग उत्पादों के लिए चिन्हित किया गया है। हमें ऐसा विश्वास से लगता है कि धीरे-धीरे अगर हमारे समाज को संतुलित और स्थायी विकास चाहिए तो स्वदेशी व स्वावलंबी विकास के माॅडल की ओर ही जाना होगा। वही एकमात्र विकल्प है।
(लेखक उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं)