देशविरोधी तिकड़ी और ‘फेक न्यूज’ की खिचड़ी

    दिनांक 27-मई-2020   
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भारत में सेकुलर विमर्श के मोटे तौर पर तीन स्तंभ माने जा सकते हैं- वामपंथी, उदारवादी और इस्लामवादी। ये तीनों मिलकर हर मंच से सिर्फ और सिर्फ भारत-विरोधी, मोदी सरकार विरोधी एजेंडा चलाते हैं। इनका कुल प्रयास दुनिया में भारत की छवि धूमिल करना और किसी तरह सत्ता हथियाना ही रहा है
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आम आदमी पार्टी की तरफ से फैलाई गई फेक न्यूज की वजह से दिल्ली में कोरोना संक्रमण का खतरा पैदा करते हुए आ
नंद विहार बस अड्डे के बाहर प्रवासी मजदूरों की डेढ़ लाख से ज्यादा की भीड़ इकट्ठी हो गई थी (फाइल चित्र)
 
अभी हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का एक ट्वीट आया है। विशुद्ध संयोग। ट्वीट कहता है- ‘जिन फर्जी पत्रकारों को रूस, रूस, रूस, और महाभियोग घोटाले के लिए औचित्यहीन पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, वे अपने कलंकित पुरस्कार कब लौटाने जा रहे हैं, ताकि उन्हें असली पत्रकारों को दिया जा सके, जिन्होंने इन कहानियों का सच सामने रखा। मैं आपको नाम दूंगा, बहुत सारे हैं!’
देखा आपने? ट्रम्प ‘फेक न्यूज’ से दो कदम आगे निकल गए। ‘फेक पत्रकारों’ पर।
क्या कभी आपने सुना है कि चीन या पाकिस्तान या तुर्की या सऊदी अरब को फर्जी खबरों और फर्जी पत्रकारों से कोई परेशानी हुई हो! जाने दीजिए। मान लीजिए कि मजाक था। आखिर बिल्लियों को पता होता है कि 'म्याऊं' किस पर करना है। वास्तव में इसका निशाना आपका लोकतंत्र, आपकी उदारता भर है। हो सकता है, इनका निशाना आपकी सुरक्षा, आपकी सम्पन्नता, आपकी संप्रभुता और आपके संसाधन भी हों।
यह प्रचार युद्ध है, और 'फेक न्यूज' उसमें प्रयुक्त होने वाला झूठ का अस्त्र है। झूठ बोलना ही नहीं, झूठ का अधिक से अधिक प्रचार करने का हथियार। अमेरिका में स्थिति वहां पहुंच चुकी है कि साधारण तौर पर सूचना माध्यमों से साधारण नागरिकों का दूर बने रहना ही अमेरिका के हित में रह गया है। अगर लोग अखबारों, न्यूज चैनलों को ज्यादा गंभीरता से लेंगे, तो अमेरिका के लिए खुद को संभाल कर रख सकना कठिन हो जाएगा।
स्थिति भारत में भी भिन्न नहीं है। हाल ही में हिज्बुल मुजाहिदीन का कमांडर रियाज नाइकू कश्मीर में मारा गया। तुरंत बाद भारत के मीडिया के एक बड़े हिस्से में उस आतंकवादी की पसंदीदा चीजों या पसंदीदा बातों के बारे में, उसकी नापसंद के बारे में, उसकी 'प्रतिभा', उसकी 'योग्यता' के बारे में, उसकी 'गरीबी' के बारे में तमाम 'खबरें' प्रकाशित और प्रसारित होती हैं। माने, इन खबरों को पढ़ने या सुनने वाले नागरिकों को धीरे-धीरे शिक्षित किया जाता है कि 'देखिए, फलां आतंकवादी कितना महान है'। बहुत समय नहीं हुआ, जब उन आतंकवादियों को, जिन्हें अदालत के आदेश पर फांसी दी गई थी, मीडिया के एक हिस्से ने तुरंत 'शहीद' कहना शुरू कर दिया था। उसके समर्थक वर्ग ने यही बात 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के नाम पर कहनी शुरू की। और इससे मीडिया को उनका महिमामंडन करने का लाइसेंस मिल गया। यह क्या है? कोई मनोविकृति या विक्षिप्तता? किसी भी कीमत पर मोदी को नीचा दिखाने का पागलपन? किसी इको-सिस्टम या पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होने की मजबूरी? एक साथ अनेक लक्षणों का समावेशी कोई रोग? कोई विदेशी साजिश? पैसों का कोई बहुत बड़ा खेल? कोई देसी साजिश? किसी व्यापक षड्यंत्र का अंश?
हो सकता है, हम गलत समझ रहे हों, और ये 'फेक न्यूज' फैलाने वाले सिर्फ छोटे-मोटे स्वार्थ की खातिर, 'लुटियनी दिल्ली' में अपनी हैसियत बनाए रखने की खातिर, पैसों और मैग्सेसे-पुल्तिजर सरीखे पुरस्कारों की खातिर, सोरोस की नजरों में आ जाने के लालच की खातिर या किसी विदेशी विश्वविद्यालय में भाषण आदि के लिए निमंत्रित किए जाने की इच्छाओं भर से प्रेरित हो। यह भी हो सकता है कि वे यह सब अपने जीवन के सबसे बड़े 'लक्ष्य' को प्राप्त करने की कोशिश में करते हों, जिसे इस्लाम के संदर्भ में, वामपंथी इतिहासकारों ने बहुत सरलता से 'मिलेनियम आॅब्जेक्टिव्स' कहकर बड़ी सहजता के साथ अस्वीकार करके अपना पल्ला झाड़ लिया है।
भारत के संदर्भ में, यह वामपंथियों, उदारवादियों और इस्लामवादियों का एक भारत—विरोधी, हिन्दू—विरोधी गठजोड़ है। फिलहाल उनका सामूहिक आक्रोश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ है। उनको दिक्कत सिर्फ यह नहीं है कि मोदी लगातार दूसरी बार चुनाव क्यों जीत गए हैं। असली दिक्कत यह है कि मोदी आखिर वह सब क्यों कर रहे हैं, जिसके लिए जनता ने उन्हें वोट दिया था। ठीक बात है। मोदी ने एक प्रकार का पुनर्जागरण छेड़ दिया है, जिसमें भारत के वर्तमान की राष्ट्रीयतापरक महत्वाकांक्षाएं निहित हैं, और जो भारत के अतीत से सांस्कृतिक प्रेरणा ग्रहण करता है। लिहाजा सबसे बड़ा मंत्र है, चाहे जो अफवाह फैलानी पड़े, सबसे पहले सरकार का काम रुकवाओ, अव्यवस्था पैदा करो। जैसे, यह लेख लिखते हुए ही, किसी डॉ. संजीव रल्हन को उद्धृत करते हुए एक वीडियो प्रकाशक 'ब्रूटइंडिया' ने प्रचार छेड़ा है कि 'भारत कोरोना वायरस से इस कारण नहीं निपट पा रहा है, क्योंकि भारत के पीपीई किट में गुणवत्ता नियंत्रण संदिग्ध है'। वास्तविकता क्या है? भारत में पीपीई किट के प्रोटोटाइप नमूनों का ‘परीक्षण और कैलिब्रेशन’ प्रयोगशालाओं के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड से मान्यता प्राप्त आठ प्रयोगशालाओं में किया जाता है। भारत में 2.01 करोड़ पीपीई किट की आवश्यकता पड़ने का अनुमान लगाया गया है। और भारत सरकार 2.22 करोड़ किट के लिए आॅर्डर दे चुकी है। इसमें से 1.42 करोड़ किट घरेलू बाजार से खरीदे जा रहे हैं। बाकी 80 लाख पीपीई किट आयात किए जा रहे हैं। लेकिन यह सुरसुरी छोड़ने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि किसी तरह अफरातफरी फैले।
अब आपको इन वामपंथियों, उदारवादियों और इस्लामवादियों के इरादों का अनुमान लग गया होगा। एक और नमूना देखिए। बड़े वाले 'पत्रकार' शेखर गुप्ता को समस्या यह है कि भारत विदेशों में फंसे भारतीयों को वापस लाने के लिए अभियान क्यों चला रहा है। अच्छा है। इन वामपंथियों, उदारवादियों और इस्लामवादियों की तिकड़ी पर गौर करें। आपको सबसे पहले बताया जाएगा कि 'भई, ऐसी कोई तिकड़ी है ही नहीं, क्योंकि हमारी विचारधाराएं अलग-अलग हैं।' यह सबसे पहला झूठ है। आप इसे 'बोल्शेविक झूठ' भी कह सकते हैं, अल—तकैया भी कह सकते हैं और सीधे—सीधे लफंगापन भी कह सकते हैं, लेकिन यह निश्चित है कि यह सबसे पहला तर्क रहेगा। सतही तौर पर उनकी बात सही है। जैसे, भारतीय वामपंथी समाजवाद लाना चाहते हैं और अधिकांशत: नास्तिक होने का स्वांग करते हैं। उदारवादी अधिकांशत: अभिजात्य वर्ग के होते हैं, जो किसी बंधन को नहीं मानते; महिला सशक्तीकरण, एलजीबीटीक्यू के अधिकारों वगैरह की बात करते हैं। ये लोग अपनी सोच को व्यापक जताने के लिए अपनी पांथिक पहचान की अवहेलना करते हैं और पूंजीवादियों को पसंद आते हैं। अब बचे इस्लामवादी। इनकी पहचान ही इनकी 'पहचान' होती है। इनके लिए मजहबी गतिविधियों का अर्थ होता है, ज्यादा से ज्यादा रूढ़िवादी होते जाना। और उनका रूढ़िवाद उन्हें 'सिंगल सोर्स' की श्रेणी में ले जाकर खड़ा कर देता है।
लेकिन ये तीनों तरह के जीव अपनी इस परिभाषा का सबसे बड़ा बिन्दु छिपा जाते हैं। वह यह है कि तीनों की ताकत का एकमात्र स्रोत मोदी के प्रति, भारत के प्रति और हिन्दुओं के प्रति उनकी गहरी नफरत है। वामपंथियों को मोदी से इसलिए नफरत है, क्योंकि उन्हें लगता है कि मोदी ने सत्ता उन्हीं से छीनी है, और जब 'क्रांति की किताब' में किसी मोदी का जिक्र है नहीं, तो फिर यह मोदी कौन है?
उदारवादियों की समस्या और गहरी है। जैसे मार्क्सवाद सिर्फ एक स्मृति शेष वाले कॉलम का हिस्सा है, वैसे ही उदारवाद है। लेकिन सांस्कृतिक मार्क्सवाद ने उदारवाद को हर उस चीज के विरोध में खड़ा कर दिया है, जिसका संबंध संस्कृति से है। चाहे वह लैंगिक विषय हों या पांथिक और भाषाई।
एक उदाहरण देखिए। जर्मनी ने कहा कि कोरोना वायरस के स्रोत की जांच होनी चाहिए। चीन ने तुरंत जबाव में कहा कि यह 'राष्ट्रवादी' सोच है। जो भी चीज कम्युनिस्टों के समर्थक वर्ग के भी खिलाफ हो, वह 'राष्ट्रवादी' सोच होती है। और फिर संस्कृति का अनुवाद राष्ट्रवाद में, राष्ट्रवाद का अनुवाद नाजीवाद में, नाजीवाद का अनुवाद हिटलर में, हिटलर का अनुवाद विश्व युद्ध में कर देना तो इनके लिए बाएं हाथ का खेल होता है। लिहाजा पश्चिम के संस्कृति विरोधी पूंजीवादी वर्ग के साथ उनके गहरे और दोतरफा प्रेम संबंध हैं। हालांकि इस पूंजीवादी वर्ग के लिए वे सिर्फ 'यूजफुल इडियट्स' होते हैं। इसी प्रकार हर वह राजनेता, जिसे संसद और जनता में बहुमत प्राप्त हो, उनकी परिभाषा के अनुसार 'तानाशाह' होता है। हालांकि बेचारे लेनिन, स्टालिन और माओ त्से तुंग ने तो विपक्ष के नेता रहते हुए देश चलाया था और जैसे थ्येनआनमन चौक नरसंहार या तो कभी हुआ ही नहीं था, या दूसरे ग्रह से आए लोगों ने किया था।
अब बचे इस्लामवादी। सीधी सी बात है। भारत में इस्लाम की कहानी का मूल आधार है- 'कारवां जुड़ता गया, हिन्दुस्तां बसता गया'। इसके लिए प्राथमिक शर्त है कि भारत हमेशा एक हिंदू विभाजित परिवार की तरह व्यवहार करे। हिंदू अविभाजित परिवार इस्लामवाद की कहानी के रास्ते में अड़चन बन कर खड़ा हो जाता है। ऊपर से उफ् ये संस्कृति, उफ् उसका ऐतिहासिक, आर्थिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, सामाजिक आधार। चूंकि इस पुनर्जाग्रत भारत के प्रतीक मोदी हैं, लिहाजा सबसे ज्यादा घृणा मोदी के प्रति है।
अब इनका काम करने का तरीका देखिए। मोदी जो भी करें, उसे 'गरीब विरोधी' (आजकल 'मजदूर विरोधी' कहने का चलन चल रहा है) करार दे दें। जो बाकी बचे, उसे 'असहिष्णुता' के खाते में जमा करा दें, और फिर जो बाकी बचे, उसे 'अल्पसंख्यक विरोधी' करार दे दिया जाए। 'पाक अल—तकैया' की तर्ज पर किसी भी बिन्दु के लिए कोई तुक, तर्क या आधार होने की कोई शर्त नहीं है। जैसे 'सीएए अल्पसंख्यक विरोधी है' और 'विदेशों से भारतीयों को लेकर आना मजदूर विरोधी' है।
'फेक न्यूज' के स्रोतों का ही अगर प्रति-विश्लेषण करें, तो 'फेक न्यूज' के लक्ष्य भी स्पष्ट हो जाते हैं। कोई भी चीज, जो अराजकता पैदा करे, सार्वजनिक मामलों में गड़बड़ी पैदा करे, सरकार की पकड़ कम करने वाली हो, वह पहली पसंद होती है। दूसरी प्राथमिकता उन अफवाहों की है, जो भारत की जनता की राजनीतिक जागरूकता को प्रभावित कर सकें, उसे मतदान से दूर रखने के लिए, कम से कम मतदान करने के लिए प्रेरित करें या देश के सामाजिक ताने-बाने में एक अपूरणीय दरार पैदा कर सकें। तीसरी प्राथमिकता उन फर्जी खबरों की होती है, जो अर्थव्यवस्था में तबाही पैदा कर सकती हों।
तीनों में एक और बड़ी समानता यह है कि उनके पास किसी समस्या का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं होता है। तीनों की घड़ी इतिहास में आठवीं सदी में, अठारहवीं, उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में कहीं न कहीं अटकी हुई है और तीनों आधुनिक या वर्तमान दुनिया में स्वयं को किसी 'पीड़ित' की तरह महसूस करते हैं। इस विमर्श में हम एक बिन्दु चूक रहे हैं। अगर आप वेदांता समूह के तांबा संयंत्र के खिलाफ चलाए गए विप्लव को याद करें, अगर आप प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने के आरोपी अर्बन नक्सलियों के षड्यंत्र को याद करें, अगर आप हाल ही के महाराष्ट्र के पालघर जिले में साधुओं की निर्मम हत्या के मामले को याद करें, तो इस तिकड़ी का चौथा पक्ष-चर्च—भी सामने आ जाता है। चर्च के साथ भी वही परिभाषागत बाध्यता है, जो उसे इन तीनों का भागीदार बनने के लिए बाध्य करती है। चर्च के साथ कुछ अतिरिक्त लाभ भी जुड़े हैं, जैसे विदेशों से मिलने वाली लौकिक मदद। चर्च इन तीनों पायों और विदेशों के बीच सेतु का भी काम कर लेता है।
आप विदेशी प्रकाशनों यथा द वाशिंगटन पोस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स, गल्फ न्यूज, द गार्जियन, बीबीसी और अन्य को देखें। आप पाएंगे कि उनमें भारत के बारे में केवल नकारात्मक कहानियां प्रस्तुत की जाती हैं। इसके कई पहलू हैं, लेकिन प्राथमिक पहलू यह है कि भारत में मोदी विरोधियों ने विदेशी प्रकाशनों को अपना अड्डा बना डाला है।
न्यूयार्क टाइम्स वैसे उदारवादी है, लेकिन भारत के लिए वह बहुत सख्त ढंग से बहुत अनुदार है। जब पाकिस्तान ने बालाकोट में हमले किए, तो वॉशिंगटन पोस्ट के लिए भारतीय दावे को स्वीकार करने के लिए इतने सारे सबूतों और तथ्य-जांचों की आवश्यकता हुई, जैसे वह कोई फोरेंसिक प्रकाशन हो। लेकिन अपनी 'स्टार स्तंभकार' राना अयूब के मामले में उसे कभी किसी सबूत की आवश्यकता नहीं होती।
पश्चिमी उदारवादी मीडिया के साथ समस्या दोहरी है। वह अपने मूल देश में अपने आपको उदारवादी पेश करने की कोशिश करता है, और फिर भारत के बारे में मनगढ़ंत कहानियों को अपने उदारवाद के सबूत, गवाह और निष्कर्ष की तरह पेश करता है। इस कोशिश में वह इतना घोर मोदी विरोधी हो जाता है कि भारत में वह शुद्ध कहानीबाजों का अड्डा रह जाता है। विश्वसनीयता का यह विलोपन और जोर से चीख कर प्रलाप करने का फिर एक कारण बनता है। इसे हिन्दी में दुष्चक्र और अंग्रेजी में ‘वीशियस साइकल’ कहते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)