महाराष्ट्र में कोरोना संकट: कांग्रेस को सत्ता तो चाहिए पर बिना जवाबदेही की

    दिनांक 27-मई-2020   
Total Views |
राहुल गांधी से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है. उन्होंने महाराष्ट्र में कोरोना के प्रसार और मौतों से खुद को अलग कर लिया. कह दिया, हम सरकार में हैं, लेकिन चला नहीं रहे. इसकी जवाबदेही हमारी नहीं 
collage rahul _1 &nb
कांग्रेस मायने नेहरू गांधी परिवार. ऐसा परिवार जिसे सत्ता की आदत है. जिसका विश्वास है कि उनका जन्म ही राज करने के लिए हुआ है. ऐसा परिवार जिसे सत्ता चाहिए, लेकिन जवाबदेही नहीं. जो मीठा होता है, जो अच्छा होता है, उस पर इस परिवार का स्वाभाविक अधिकार है. हां, जहां गड़बड़ है, कुछ गलत है. उसका जिम्मा लेने के लिए कठपुतलियों की फौज है. मसलन फसल अच्छी हुई, तो परिवार का प्रताप. खराब हुई, तो मोहरे जिम्मेदार. इन्हीं सोच व संस्कारों में पले  राहुल गांधी से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है. उन्होंने महाराष्ट्र में कोरोना के प्रसार और मौतों से खुद को अलग कर लिया. कह दिया, हम सरकार में हैं, लेकिन चला नहीं रहे. इसकी जवाबदेही हमारी नहीं. जिस कांग्रेस की शर्तों पर महाराष्ट्र महाविकास अघाड़ी की उधव ठाकरे सरकार सांस ले रही है, वह कहती है कि कोरोना को लेकर जो कुप्रबंधन मचा है, उसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं. ये तो दस जनपथ रिमोट से संचालित एक सूबे की बात है. इस रिमोट से तो दस साल तक देश में केंद्र की सरकार चली है. जहां सारे नियंत्रण गांधी नेहरू परिवार के थे, लेकिन जवाबदेही नहीं.
कोरोना काल में कांग्रेस रोज नए शिगूफे उछालती है. कभी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी केंद्र को चिट्ठी लिखती हैं, कभी राहुल गांधी अर्थशास्त्रियों से सार्वजनिक बातचीत करते हैं. केंद्र सरकार को बताने के लिए इनके पास तमाम नुस्खे हैं. सोनिया गांधी और राहुल गांधी का कुल मिलाकर प्रस्तुतिकरण ऐसा है कि इनका बस चले, इनकी बातें मान ली जाएं, तो कोरोना रातों-रात काबू में आ जाएगा. लेकिन ये नुस्खे, ये चिट्ठियां बस केंद्र के लिए हैं. यही तो पूछा गया था राहुल गांधी से. महाराष्ट्र में क्या हो रहा है. देश में कोरोना के कुल मामलों में 38 फीसद हिस्सेदारी महाराष्ट्र की है. सबसे ज्यादा मौत महाराष्ट्र में हुई हैं, मृत्यु दर भी सबसे ज्यादा है. कोरोना का ऐसा विकराल रूप देश में कहीं और नहीं है. महाराष्ट्र में महाराष्ट्र महाविकास अघाड़ी की सरकार है. शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस इसके मुख्य घटक हैं. इस गठबंधन को बनते जिन लोगों ने देखा है, उन्हें याद है कि उधव को किस तरह दस जनपथ पर मत्थे टेकने पड़े. हर शर्त माननी पड़ी. सोनिया गांधी के कहने पर उधव ने हिंदुत्व को छोड़ दिया. मराठी मानुस को छोड़ दिया. और तो और सावरकर को छोड़ दिया. और राहुल गांधी कहते हैं कि महाराष्ट्र में जो हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं है. हम सरकार में तो हैं, लेकिन सरकार चला नहीं रहे हैं. बकौल राहुल, हम महाराष्‍ट्र में सरकार को सपोर्ट कर रहे हैं मगर वहां 'की डिसिजन मेकर' नहीं हैं. हम पंजाब, छत्‍तीसगढ़, राजस्‍थान, पुड्डूचेरी में 'की डिसिजन मेकर' हैं. सरकार चलाने और सरकार का सपोर्ट करने में फर्क होता है. राहुल गांधी की बात का मतलब साफ है. उनके मंत्री महाराष्ट्र में मलाई काटते रहेंगे और वह घुटनों के बल चलती इस सरकार की विफलताओं से भी पल्ला झाड़ लेंगे. सत्ता चाहिए, जवाबदेही नहीं.
इस परिवार की प्रवृत्ति को समझना है, तो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के बैनर तले 2004 से 2014 तक दो कार्यकाल चली मनमोहन सिंह सरकार की स्थिति को समझना होगा. इस सरकार के सिर पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) नाम की सुपर सरकार बैठी थी. जाहिर है, एनएसी की अध्यक्ष सोनिया गांधी थी. यह ऐसी संविधानेत्तर इकाई थी, जिसके पास असीमित अधिकार थे और जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं. एनएसी सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को हिदायत देती थी. अधिकारियों को दो, मोतीलाल नेहरू पैलेस स्थित कार्यालय तलब करती थी. प्रधानमंत्री को बाईपास करके सीधे मंत्रियों को हिदायत जारी करती थी. 29 अक्टूबर 2005 को एनएसी बैठक की कार्यवाही पर गौर करें- इस बात पर सहमति बनी है कि एनएसी की विभिन्न सिफारिशों पर अमल करना सरकारी एजेंसियों और प्रतिष्ठानों की सीधी जिम्मेदारी होगी. 14 सितंबर 2011 को सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली एनएसी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बाईपास करते हुए ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को चिट्ठी लिखी. इसमें मनरेगा को लेकर विभिन्न हिदायतें दी गई थीं. साथ ही निर्देश था, तुरंत लागू करें. ये प्रधानमंत्री को बताना तक जरूरी नहीं समझा गया. जयराम रमेश मानो इस हिदायत से अनुग्रहित हो गए. सीधे मैडम के पास से आई सिफारिश के अक्षरशः पालन की जानकारी देते हुए 28 सितंबर 2011 को ही उन्होंने जवाबी पत्र लिख मारा. एनएसी के सदस्य दीपक जोशी, अरुणा राय आदि को उन्होंने विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया.
तत्कालीन प्रधानमंत्री की स्थिति और सोनिया गांधी की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाइए कि शिपिंग सेकेट्री ए.के. महापात्रा ने बीस जून 2007 को एक प्रजेंटेशन देकर बंदरगाह क्षेत्र की समस्याओं को सुलझाने के लिए एनएसी से मार्गदर्शन मांगा. मंत्रालय इस बात से परेशान था कि धीमी निर्णय प्रक्रिया के कारण नए बंदरगाहों के विकास का काम प्रभावित हो रहा है. जाहिर है, इस प्रजेंटेशन का मतलब था कि प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर आप हैं, हमारी समस्या का समाधान करें.
संविधानेत्तर सत्ता और देश के संविधान का इससे बड़ा मजाक क्या होगा कि एनएसी के पास प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी हॉटलाइन थी. पीएमओ के प्रमुख सचिव को एनएसी चिट्ठी लिखकर अपनी हिदायतों पर अमल के बारे में जानकारी लेती थी. पीएमओ में तत्कालीन प्रमुख सचिव पुलक चटर्जी को रीता शर्मा ने 7 मई 2012 को पत्र लिखकर पूछा कि 2010 में गठन के बाद से एनएसी ने 19 सिफारिशें की हैं. उन पर अमल की स्थिति से अवगत कराया जाए. रीता शर्मा ने इस बात पर नाराजगी जताई थी कि संयुक्त सचिव एल.के. अतीक ने सिर्फ पांच सिफारिशों पर अमल की ही जानकारी दी थी.
बिना जवाबदेही की सत्ता के क्या सुख लूटे गए, देश को शायद ही इसकी जानकारी हो. एनएसी के कार्यकारी समूहों की मीटिंग का खर्चा उठाने की हिदायत मंत्रालयों को जारी की जाती थी. ग्रामीण विकास सचिव को बाकायदा चिट्ठी लिखकर हिदायत दी गई थी कि कार्यकारी समूह के गैर सरकारी भागीदारों की सूची एनएसी उपलब्ध कराएगी. मंत्रालय टीए-डीए समेत इनके तमाम खर्च उठाएगा. यूपीए कार्यकाल में जहां भी घोटाला हुआ, वहां एनएसी के माध्यम से सोनिया गांधी का दखल था. मसलन 30 अगस्त 2007 को पूर्व कोयला सचिव एच. सी. गुप्ता को भारत के कोयला क्षेत्र पर प्रजेंटेशन देने के लिए बुलाया गया. गुप्ता ने एनएसी को बताया कि किसको कोयला खदाने दी जा रही हैं, किन शर्तों पर दी जा रही हैं. इसमें कहां-कितना पैसा मिलेगा. इसी तरह ऊर्जा के क्षेत्र में नई नीति जारी होने से पहले एनएसी के सामने पेश की गई. एनएसी अधिकारियों को सीधे तलब करती थी. उनसे विभिन्न योजनाओं की जानकारी लेती थी.
कुल मिलाकर जो सत्ता के त्याग का नाटक 2004 में हुआ था, उसकी हकीकत एनएसी जैसी संस्था थी. जिस संस्था के दम पर 10 साल तक सोनिया गांधी ने परदे के पीछे बैठकर देश पर राज किया. बिना किसी जवाबदेही के किया. तमाम घोटालों पर आरोपों का सामना मनमोहन सिंह करते रहे और उधर एनएसी ने सारी मलाई उड़ा ली. ठीक वैसी ही सोच व नीति राहुल गांधी की है. महाराष्ट्र की सत्ता का सुख कांग्रेस को प्राप्त है. लेकिन वहां की सरकार की खामियों और विफलताओं के लिए कांग्रेस जिम्मेदार नहीं है.