खेती और कुटीर उद्योग की पटरी पर दौड़ेगा देश

    दिनांक 27-मई-2020
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नरेश सिरोही
देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी है कि पहले गांवों को आत्मनिर्भर बनाया जाए। कोरोना संकट ने किसानों और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी खामियों को उजागर किया है। इन्हें दूर करने के साथ ही शहरों से बड़ी संख्या में पलायन कर अपने गांव लौटने वाले श्रमिकों को रोजगार मिले, इसके लिए भी ठोस योजना बनाने की जरूरत है
 
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लॉकडाउन के बावजूद हमारे मेहनती किसानों ने फसल उत्पादन में कमी नहीं आने दी
 
कोविड-19 के कारण देश दो माह से लॉकडाउन है। लेकिन इस संकट में भी किसानों ने खाद्य सुरक्षा को खतरे में नहीं पड़ने दिया, बल्कि तमाम बाधाओं के बावजूद खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाया है। अभी किसानों को कई व्यावहारिक और प्राकृतिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि हमें इस संकट को अवसर में बदलना है। किसानों की कठिनाइयां दूर करके हम प्रधानमंत्री के इस संकल्प को साकार कर सकते हैं। देश को आत्मनिर्भर बनाने और उसे प्रगति के मार्ग पर तेजी से आगे ले जाने के लिए उनकी समस्याओं का समाधान जरूरी है। इस महामारी का प्रकोप ऐसे समय में हुआ है, जब रबी फसलों फसलों की कटाई शुरू हो चुकी थी। हालांकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने जरूरी कदम उठाते हुए कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री करने वाली सभी एजेंसियों, राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित इकाइयों, किसान एवं कृषि श्रमिकों को काम करने के साथ कटाई-बुवाई व कृषि-बागवानी में प्रयुक्त होने वाली मशीनों को राज्य के बाहर लाने और ले जाने की छूट दी। इसके अलावा, बीज, कीटनाशकों, उर्वरकों तथा फल, सब्जी, दूध, अंडे, मछली तथा शीघ्र नष्ट होने वाले अन्य कृषि उत्पादों की राज्य तथा राज्य के बाहर आवाजाही में आने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए अखिल भारतीय परिवहन कॉल सेंटर की शुरुआत की है।
देश की करीब 60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। इस साल शुरुआत में ही फसलों पर टिड्डियों का हमला हुआ। 25 साल में यह टिड्डियों का सबसे बड़ा हमला था। यही नहीं, रबी की बुवाई से लेकर कटाई तक ओला वृष्टि, भारी बारिश और तेज हवाओं के कारण पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में गेहूं ,मसूर, ज्वार, सरसों, मटर आदि फसलों को काफी नुकसान पहुंचा। इसके बावजूद गेहूं का उत्पादन पिछले साल के 10.36 करोड़ टन के मुकाबले इस साल 11.37 करोड़ टन यानी 9.7 प्रतिशत अधिक हुआ है। इसी तरह, बंगाली चने का उत्पादन भी पिछले वर्ष के 0.99 करोड़ टन के मुकाबले 1.07 करोड़ टन यानी 8 प्रतिशत अधिक हुआ। तिलहन भी पिछले वर्ष के 0.92 करोड़ टन के मुकाबले इस वर्ष 0.95 करोड़ टन यानी 2.7 प्रतिशत अधिक हुआ है। मौसम के साथ कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के कारण मंडी और स्थानीय बाजारों के व्यवस्थित रूप से नहीं खुलने और चीनी मिलों द्वारा गन्ना किसानों को समय से भुगतान न होने के कारण किसानों के सामने नकदी का संकट बढ़ गया है। इसके बावजूद वह खरीफ की खेती की तैयारी में जी-जान से जुट गया है। साहूकारों से कर्ज लेकर वह बीज, कीटनाशक और खाद जुटाने में व्यस्त है।
कोरोना संकट के कारण बड़े पैमाने पर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के तराई वाले कुछ क्षेत्रों तथा महाराष्ट्र, गुजरात से श्रमिक पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे कृषि प्रधान राज्यों में अपने घरों को लौट गए हैं। श्रमिकों की घर वापसी की वजह से इन राज्यों के किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। धान की रोपाई के लिए भी श्रमिक नहीं होने के कारण किसानों की चिंता बनी हुई है। सब्जी तोड़ने में भी किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। गन्ने की कटाई और छिलाई के लिए भी श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन अच्छी बात यह रही कि लॉकडाउन से पहले गन्ने की अधिकतर आपूर्ति मिलों को चुकी थी और लगभग 20 प्रतिशत खेतों में ही गन्ना बचा हुआ था जिसे आपसी सहयोग (डंगवारा पद्धति) से किसान निपटा रहे हैं। छोटे और सीमांत किसान तो अक्सर गन्ने की बुवाई भी डंगवारा पद्धति से ही करते हैं। कोरोना संकट की अनिश्चितता को देखते हुए गन्ना किसानों के लिए अक्तूबर से चलने वाला पेराई सत्र मुश्किल भरा हो सकता है। डर के माहौल के बीच घर लौट चुके श्रमिक अक्तूबर तक वापस आएंगे, अभी यह कहना मुश्किल है। इसलिए गन्ना किसानों को गन्ने की छिलाई-कटाई की वैकल्पिक व्यवस्था पर ध्यान देना होगा। जून से हिमाचल में सेब की तुड़ाई और पैकेजिंग और देशभर में आम, लीची, संतरा आदि बागवानी क्षेत्र को श्रमिकों की समस्या से जूझना पड़ेगा।
लॉकडाउन में सबसे ज्यादा नुकसान फल-सब्जियों, फूल, दूध, पोल्ट्री, मत्स्य आदि की आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन के तहस-नहस होने के कारण हुई है। इस संकट के दौरान फूलों की खेती करने वाले किसानों को शत प्रतिशत तथा फल-सब्जी उत्पादकों को 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान हुआ है। पशुपालन कृषि क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है। किसानों को कुल आय का लगभग 13 प्रतिशत पशुपालन से प्राप्त होता है। इस लॉकडाउन में रेस्तरां, होटल, ढाबे, मिठाई की दुकानें और बाजार बंद होने तथा परिवहन भी ठप होने के कारण सबसे ज्यादा नुकसान पशुपालकों को उठाना पड़ रहा है। देश में रोजाना लगभग 50 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है। इसमें से 20 करोड़ लीटर दूध घरों में खपत होता है, बाकी 30 करोड़ लीटर दूध सहकारी संस्थाओं और निजी डेयरी कंपनियों के माध्यम से बाजारों में आता है। सहकारी संस्थाओं ने अपनी क्षमता के मुकाबले 8 प्रतिशत अधिक दूध लेकर डेयरी किसानों को राहत जरूर दी, लेकिन इन के दायरे में देश के 25 प्रतिशत से कम दुग्ध उत्पादक ही आते हैं। कई जगह इन सहकारी संस्थाओं ने दूध की कीमतें प्रति लीटर 5 रुपये तक घटा दीं तो कहीं निजी डेयरी कंपनियों ने प्रति लीटर 10 रुपये लीटर कम दर पर दूध की खरीद की। सस्ता दूध खरीदकर इन कंपनियों ने उसका पाउडर बना कर रख लिया है। गर्मी के मौसम में जब दूध का उत्पादन कम हो जाता है, तब वह इस पाउडर से दूर बनाकर मुनाफा कमाएंगी। दुग्ध उत्पादकों की दूसरी समस्या यह है कि उद्योग बंद होने के कारण खलचूरी एवं पशु आहार महंगे हो गए हैं, जिससे दूध उत्पादन की लागत काफी बढ़ गई है। कुल मिलाकर दुग्ध उत्पादकों को नुकसान तो हो रहा है, लेकिन डेयरी उद्योग व्यवस्थित होने के कारण दूध फेंकने जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। इसी तरह, पोल्ट्री क्षेत्र लगभग 1.25 लाख करोड़ रुपये का है। पोल्ट्री और मत्स्य पालन उद्योग को भी डेयरी की तरह व्यवस्थित कर आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की आवश्यकता है।
भारत गांवों में बसता है और गांव को आत्मनिर्भर बनाए बिना ‘आत्मनिर्भर भारत’ की कल्पना नहीं की जा सकती है। कोविड-19 के चलते देश के सामने उजागर हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कृषि व्यवस्था में कुछ सुधार करना होगा। गांव को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सबसे पहले बाजार पर गांव की निर्भरता कम करने के लिए रोड मैप तैयार करना होगा। गांव की खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए समन्वित कृषि प्रणाली के अनुसार कृषि व्यवस्था को दुरुस्त करना पड़ेगा ताकि ग्रामीण आबादी के लिए भोजन एवं पशुओं आदि के लिए पर्याप्त चारा की व्यवस्था की जा सके। इसके अलावा, पशुपालन को भी बढ़ावा देना होगा, जिससे किसानों और भूमिहीनों को आमदनी हो। इसके लिए इस फसल चक्र में पशुओं के चारे के लिए भी पर्याप्त मात्रा में व्यवस्था बनानी पड़ेगी। इससे खाद्य पदार्थों के लिए बाजारों पर निर्भरता कम होगी और गांव आत्मनिर्भर बनेंगे।
गांव की लगभग 60 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है, जबकि 40 प्रतिशत आबादी भूमिहीन है और आजीविका के लिए लघु उद्योगों पर आश्रित होने के साथ खेती के काम में भी सहयोग करती है। खेती की दृष्टि से भारत भिन्न कृषि जलवायु वाला क्षेत्र है। इसलिए पूरे देश की कृषि जलवायु क्षेत्रों के अनुसार समन्वित कृषि प्रणाली के अलग-अलग प्रारूप हो सकते हैं। संकट काल में शहर से गांव लौटने वाले लोगों के लिए भी रोजगार की अतिरिक्त व्यवस्था बनानी पड़ेगी। गांव में रहने वाले हर व्यक्ति को काम मिले, इसके लिए कृषि के साथ खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं अपने उत्पादों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए सुव्यवस्थित मार्केटिंग नेटवर्क तैयार करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री भी ‘फार्म टू फोर्क’ की चर्चा कर चुके हैं। हमें बदली हुई परिस्थितियों से सबक लेते हुए आगे बढ़ना है। जैसा कि प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भी कहा है कि हमें गांव, जिला, राज्य और देश को आत्मनिर्भर बनाने की ओर बढ़ना है। इसलिए आत्मनिर्भरता की योजना बनाते समय तीन बातों को ध्यान में रखना होगा-उस क्षेत्र की आबादी का घनत्व, उस क्षेत्र में होने वाला कृषि उत्पादन और जल संरक्षण की संरचना। भोजन और पानी मूलभूत आवश्यकता है, इसलिए खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करते हुए कम से कम एक साल के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री का संग्रह रहना चाहिए तथा वर्षा के समय जल संरक्षण एवं संचय करना होगा।
 

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कोरोना संकट के दौरान शहरोें से अपने गांव की ओर लौटते श्रमिक परिवार  
 
आज महामारी के बावजूद भारत में खाद्यान्न की कमी नहीं है तो सिर्फ किसानों के कारण। यह समय अपनी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का विश्लेषण कर उसमें मौजूद खामियों को दूर करने का है। सरकार और प्रशासन को जिलावार खाद्य सुरक्षा और सुदृढ़ करने के लिए किसानों के खेतों से ही खरीदारी की व्यवस्था करने, पर्याप्त संख्या में गोदाम, कोल्ड स्टोर बनाने तथा जिले में खाद्य प्रसंस्करण और पैकेजिंग की इकाइयां स्थापित करने पर ध्यान देना होगा। इससे किसानों को उनके उत्पादों के सही दाम मिल सकेंगे एवं रोजगार के अतिरिक्त अवसर पैदा होंगे। साथ ही, हर साल ढुलाई में हजारों टन अनाज की बबार्दी पर भी रोक लगेगी। इस संकट के समय आपूर्ति श्रृंखला में बहुत सी खामियां उजागर हुई हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें ऐसे तमाम कानूनों को खत्म करना होगा जो कृषि क्षेत्र व किसानों की आमदनी बढ़ाने में बाधक हैं। लॉकडाउन से सबक लेते हुए मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने मंडी अधिनियम में कुछ संशोधनों की घोषणा की है। अब किसान बिना मंडी गए किसी भी व्यक्ति या निकाय को अपनी फसल बेच सकेंगे। चाहें तो पहले की भांति मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी फसल दे सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी राज्यों से कृषि में बुनियादी सुधारों को लागू करने की बात कह चुके हैं।
हम जानते हैं कि कोविड-19 से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं हैं, लेकिन लॉकडाउन की व्यवस्था को लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता है। इसलिए केंद्र सरकार धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन पर लगाए गए प्रतिबंधों को उठा रही है। संतोष की बात है कि सरकार ने समाज के सभी वर्गों के प्रति संवेदनशील रहते हुए सभी कदम उठाए हैं। किसानों के हितों को भी निरंतर ध्यान में रखा गया है। आने वाला समय किसी भी क्षेत्र के लिए आसान नहीं है। कोविड-19 ने हमारे आर्थिक जीवन को तहस-नहस कर दिया है। इसमें दो राय नहीं है कि एकमात्र कृषि ही ऐसा क्षेत्र है जो आपात स्थितियों में भी आर्थिक गति दे सकता है। अब वक्त आ गया है कि लॉकडाउन के दौरान गांव लौटे लोगों को कृषि और कुटीर उद्योगों से जोड़कर उसके समग्र विकास पर ध्यान दिया जाए। समय-समय पर किसानों की समस्याओं से सरकार को अवगत कराना हम सब की जिम्मेदारी है ताकि उनके हित में उचित निर्णय किए जा सकें। आत्मनिर्भर भारत को लेकर प्रधानमंत्री की ताजा घोषणा कोरोना के विरुद्ध युद्ध में तभी निर्णायक कदम साबित होगा, जब नीचे से लेकर ऊपर तक सभी अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाएं।
 (लेखक भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)