अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का शुभारंभ, झूठे इतिहासकारों की साजिशें सत्यता के सामने चूर—चूर हो गईं

    दिनांक 27-मई-2020
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प्रो. राकेश उपाध्याय
अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण का शुभारंभ आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी भारत के निर्माण का प्रारंभ है। यह मंदिर केवल कुछ खंभों, भवन का निर्माण नहीं है,अपितु इसके इंच—इंच निर्माण से और इसकी नींव से जुड़े प्रत्येक अनुष्ठान से भारत राष्ट्र के मूर्तिमंत उस स्वरूप का जन्म हो रहा है जिसके लिए स्वतंत्रता के समर में कोटि—कोटि भारतवासियों ने कोटि—कोटि आहुतियां दी थीं।
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1526-28 में जिहादी इस्लाम की राजनीति के निर्देश से किए गए एक भयानक पाप के प्रक्षालन के प्रारंभ की अविस्मरणीय दिनमिति 26 मई, 2020 भारत की पीढ़ियों को पाप पर पुण्य की और असत्य पर सत्य की विजय का शंखनाद सुनाती रहेगी। भारत के इतिहास में यह दिनांक कालजयी होकर सदा ही याद की जाएगी। आज जब संपूर्ण पृथ्वी की चाल ठिठक चुकी है, मृत्यु का आतंक विश्व पर छाया है, तब परमात्मा के प्रति चिर नूतन और अति-पुरातन आशा-विश्वास-आस्था का भाव लेकर भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा ने अयोध्या की भूमि से सकल विश्व को निर्भय हो जाने, मानवता और उसकी संस्कृति के साथ स्वास्थ्य पर मंडराते खतरों के प्रति सदा सावधान रहने और सम्मान-स्वाभिमान के साथ जीने का संजीवन मंत्र सुनाया है।
494 साल बीत गए जब बाबर ने चढ़ाई की थी। 494 साल की कठिन परीक्षा और रक्तक्रांति के कितने ही पन्नों को पलटने के बाद अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान पर रामलला के भव्य भवन के निर्माण का शुभारंभ हो सका है। आने वाली पीढ़ियां इस महासंग्राम के दुर्दम्य, दुर्धर्ष और दुर्निवार महाभीषण संघर्ष के पृष्ठों को स्मरण में रखे और भारत के सुनहरे अतीत की भांति ही इसके स्वर्णिम भविष्य के लिए अपना जीवन दांव पर लगाकर आगे बढ़ें, सपने गढ़ें और आत्मनिर्भर स्वतंत्रता के स्वप्न को साकार करें। आज का समय इसी पराक्रम की पराकाष्ठा का आह्वान हमें दे रहा है।
अयोध्या में राम लला के मंदिर निर्माण की शुभ घड़ी अत्यंत कठिन समय में आई है। तो यह संकेत इस बात का है कि कठिनाई के दिन शीघ्र चले जाएंगे। जैसे विदेशी हमलावरों की आंधियां बीते हजार सालों में टिड्डी दल की तरह भारत भूमि पर आती गईं, तक्षशिला से नवद्वीप और असम-इंडोनेशिया तक जिहादी तलवार की धार पर यह देश और इसका समाज चढ़ता चला गया, लुटता चला गया, तो भी हौंसले हर हमले के साथ बुलंदियों पर चढ़ते चले गए, वार जितना विकट होता था, भृकुटियां और तेवर उतने ही अधिक तनते चले जाते थे। सदियों के शत—शत आघातों को सहकर यह वसुधा-वसुंधरा आज भी लहलहाती है तो हमलावरों को समझ ही लेना चाहिए कि वह बात क्या है कि अस्तित्व इनका मिटता नहीं, धार इनकी कुन्द होती नहीं। आज बीमारी के रूप में हमला सामने है, उसका भी मुकाबला यह देश उसी प्राणपण से कर रहा है, जैसे कि विगत 1000 साल के हमलों का करता चला आया है।

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श्रीराम मंदिर के निर्मित हो रहे मंदिर और परिसर की एक वास्तु कल्पना
 
झूठे इतिहासकारों की सारी चुनौती इतिहास के गर्भ से निकली सत्यता के सामने चूर—चूर होकर बिखर गई। सुप्रीम कोर्ट के सामने पुरातत्वविदों ने जो रिपोर्ट दी है, उसमें स्पष्ट वर्णित है कि 'श्रीराम जन्मभूमि की खुदाई स्थल में ईसा पूर्व 1200 से 1600 साल पूर्व तक के निर्माण के साक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देते हैं। खुदाई में मिली चीजों की कार्बन डेटिंग बता रही है कि श्रीराम जन्मभूमि के भूगर्भ के भीतर की अनेक परतों में 3600-4000 साल से अधिक पुराने पुरावशेष मौजूद हैं।' पुरातत्वविदों में अनेक जो रामजन्मभूमि की खुदाई से जुड़े रहे, उनका कहना है कि अयोध्या का यह भूभाग भारत के सभ्यतामूलक पुरातात्विक चिन्हों को ईसापूर्व 5000 साल के पूर्व तक आसानी से ले जाता प्रतीत होता है। साफ है कि अगर और गहरी खुदाई की गई होती तो शायद पुरातत्व के चिन्ह मानव सभ्यता के 10 हजार साल के पन्नों को भी पलट देते जिसके बारे में आज के इतिहास के सम्मुख शायद ही कोई पुरातात्विक साक्ष्य और प्रमाण उपलब्ध हों।
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प्राचीन मंदिर की बुनियाद जो समान दूरी पर निर्मित 64 खंभों की नींव है जिस पर भव्य राम मंदिर खड़ा था।
 
किन्तु सेकुलर राजनीति और उसके रहमोकरम पर पलने वाले पत्रकार, इतिहासकार, कथित विद्वान और पढ़े-लिखे भ्रमित इंसान कुछ भी सीखने या समझने को तैयार नहीं। वही राजनीति जो पहले तलवारों से भारतीय समाज को काट रही थी, अब वह पीठ पीछे से छिपकर वार करती है। यही है वह छद्म सेकुलरवाद। अयोध्या के विषय में जिसके सारे दांव-प्रतिदांव तो धरे के धरे रह गए, जिसे सेकुलर राजनीति ने स्वतंत्रता के विगत 70 वर्षों में हिन्दुओं के स्वाभिमान को गिराने और गिराए रखने के लिए, हिन्दुओं की हर नई पीढ़ी को डराने और डराते रहने के लिए, हिन्दुओं के सम्मान को मिटाने और मिटाते जाने के लिए इस्तेमाल किया और कराया।
इस्लामिक सियासत की शतरंजी बिसात पर अंतिम चाल में भगवान श्रीराम के विरुद्ध उन्हीं के वंशधारी इक्ष्वाकु कुल में जन्मे भगवान बुद्ध को खड़ा करने का भी प्रयत्न हुआ और कितने ही खुले प्रमाणों के सम्मुख होने के बाद भी हुआं—हुआं शोर के साथ यह प्रयत्न बंद नहीं हो रहा है, किन्तु अब इस झूठे शोर की कलई खुल चुकी है, न देश कुछ सुनना चाहता है और न ही समाज कुछ सुनने को तैयार है।
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पुरातत्व की खुदाई में विशेषज्ञों ने जहां तक संभव था,उतनी नीचे खुदाई कर सामग्री एकत्रित की।
 
देश को समझ आ चुका है कि सेमेटिक सियासत के दो बड़े चेहरे जिसमें एक ओर मतांतरणवादी ईसाइयत खड़ी है और दूसरी ओर जिहादी इस्लाम। ये दोनों भारत और उसके जीवनमूल्यों के प्रति आस्था रखने वाले संपूर्ण तत्वदर्शन और जीवनदर्शन को ही डबलरोटी की भांति निगल जाने को इस कदर आतुर दिखते रहे हैं कि सूर्यवंश का जो दीपक स्वयं विधाता ने ही अयोध्या में ज्योतित किया, उसके अस्तित्व को भी ये सदा ही इधर—उधर के झूठ लिखने वाले इतिहासकारों से चुनौती देते रहे हैं। बुद्ध को उन्हीं के पुरखे राम के सम्मुख खड़ा करने की चालबाजी उसी तरह चल रहे हैं, जैसे कि वैष्णवों के खिलाफ शैवों को खड़ा करते रहे हैं और जैसे फर्जी आर्य आक्रमण की थ्योरी रचकर दक्षिण और द्रविड़ से उत्तर का रिश्ता तोड़ते रहे हैं। लेकिन झूठ तो झूठ ही होता है। सत्य के सूर्य का उदय होते ही सारे झूठे चमगादड़ फिर से अपनी काली खोहों में घुसकर छिप जाने को बाध्य होते ही हैं।
 
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बाबरी ढांचे की पृष्ठभूमि जिसके दोनों ओर और सामने 84 खंभों की बुनियाद जस की तस पाई गई
 
सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख पुरातत्व की जो रिपोर्ट प्रस्तुत हुई, उसे कोई निरक्षर गांव का मिस्त्री भी देख लेगा तो वह उसी तरह बोल उठेगा जैसे कि जन्मस्थान के भूगर्भ में छिपे मंदिर के पुरावशेष बोल उठे थे। जिस स्थान पर ढांचे का केंद्रीय गुंबद था, उस गुंबद के दाएं बाएं दो गुंबद और थे, उनके दाएं-बाएं और बिल्कुल सामने एक समान दूरी पर 84 खंभों की 5 पंक्तियां जिसमें प्रत्येक पंक्ति में 16 खंभे खड़े थे, उन 84 खंभों की नींव जस की तस नीचे गड़ी और पड़ी मिली। इन 84 खंभों पर अगर पुनः मंदिर की कल्पना की जाए तो ढांचे से तीन गुना बड़े ढांचे की आकृति उभरकर सामने आती है। और तो और ढांचे की पीछे की दीवाल मंदिर के पीछे की दीवाल की बुनियाद पर ही उसी तरह निर्मित कर दी गई जैसे कि अगर आप काशी में ज्ञानवापी मस्जिद को पीछे की ओर से देखें तो ठीक उसी प्रकार से खड़ी कर दी गई। मंदिर के गर्भगृह के सामने दाईं ओर पंचायतन मंदिर के अवशेष और भगवान भोलेनाथ शिवमंदिर के अवशेष भी समतल फर्श के नीचे जस के तस दबा दिए गए। कसौटी के कितने ही खूबसूरत खंभे बाबरी ढांचे के भीतरी निर्माण में या तो लगा दिए गए या फिर परिसर में यत्र तत्र जमीन में ही दबाकर दफ्न कर दिए गए। इस रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट हुआ है कि राम मंदिर पहली बार 10वीं-11वीं सदी में ही तोड़ा गया था, जिस समय सोमनाथ मंदिर पर भी विदेशी हमलावर चढ़े थे। गुजरात के समंदर से गंगा की लहरों तक जब पूरा भारत भयानक लूट-पाट के दल-दल में धंसता चला गया था, हालांकि तब गड़वाल वंश के शासकों ने इसे फिर से निर्मित किया था। इसे 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने फिर से तोड़ा था और तभी से भारतवासियों का जिहादी इस्लाम के विरुद्ध खुला संग्राम अयोध्या को लेकर आर-पार शैली में प्रारंभ हो गया था। वह सारा इतिहास पुरातत्व के पन्नों से बाहर निकलकर अब सबके सामने उपस्थित है ताकि क्रूरतापूर्ण और धूर्ततापूर्ण जिहादी सियासत की झलक हर किसी को देखने को मिल सके। 
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पुरातत्व की रिपोर्ट का वह अंश जिसमें बताया गया है कि ईसा पूर्व 1200-1600 साल पहले तक के निर्माण के अवशेष जन्मस्थान से प्राप्त हुए हैं।
 
इसलिए अयोध्या में प्रभु के मंदिर निर्माण का शुभारंभ आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी भारत के निर्माण का भी प्रारंभ है। यह भारत के स्वाभिमान के जागरण का प्रारंभ है जिसमें राष्ट्र का मंदिर इस भूमि के कण-कण में राम के परमात्मभाव और अध्यात्मभाव से ही सदैव प्रेरणा लेता रहा है। यह मंदिर केवल कुछ खंभों,भवन का निर्माण नहीं है, इसके इंच—इंच निर्माण से और इसकी नींव से जुड़े प्रत्येक अनुष्ठान से भारत राष्ट्र के मूर्तिमंत उस स्वरूप का जन्म हो रहा है जिसके लिए स्वतंत्रता के समर में कोटि—कोटि भारतवासियों ने कोटि—कोटि आहुतियां दी थीं। यह निष्कपट और निष्कलुष भाव से मानवमात्र के कल्याण की कामना से किया जा रहा सनातन आह्वान है, जिसे सुनकर यह सनातनी हिन्दू समाज भी भयमुक्त हो रहा है और भारत की संपूर्ण संस्कृति व सभ्यता भी। राजनीति का चेहरा परिवर्तित हो रहा है और उसकी भावना व भूमिका भी। परिवर्तन की यह संक्रांति तब तक चलती रहेगी जबतक कि अयोध्या के मंदिर का शिखर संसार में सोमनाथ के शिखरों की तरह फिर से नहीं फहर जाता, ग्राम—ग्राम में जबतक राम के सपनों का भारत और उसका प्रारूप रामराज्य वापस लौट नहीं आता, तब तक के लिए यह संक्रांति निर्माण होता ही रहेगा,चलता ही रहेगा।
(लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक हैं)