जम्मू में जमीन जिहाद कट्टरपंथी इस्‍लामिक ताकतों की गहरी साजिश

    दिनांक 27-मई-2020
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अंकुर शर्मा
जम्मू में जनसांख्यिकी परिवर्तन राज्य प्रायोजित है। यह कट्टरपंथी इस्‍लामिक ताकतों की गहरी साजिश है, जिसे कश्‍मीर की मुख्‍यधारा के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने हमेशा छिपाया ताकि जम्‍मू-कश्‍मीर का पूरी तरह इस्‍लामीकरण किया जा सके
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हाल के दिनों में जम्मू में जमीन जिहाद या जनसांख्यिकी परिवर्तन का मुद्दा राष्‍ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बना। दरअसल,जम्मू में जनसांख्यिकी परिवर्तन राज्य प्रायोजित है। यह कट्टरपंथी इस्‍लामिक ताकतों का एक संगठित प्रयास है, जिसे कश्‍मीर की मुख्‍यधारा के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने हमेशा छिपाया ताकि जम्‍मू-कश्‍मीर का पूरी तरह इस्‍लामीकरण किया जा सके। इसलिए जम्‍मू का जनसांख्यिकी आक्रमण गजवा—ए—हिंद के तहत ‘नरसंहार की एक प्रक्रिया’ है। वह कश्मीर से हिन्दुओं को भगा कर अपना मंतव्य पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं। इसलिए अब जम्मू पर ऐसी ताकतें काम कर रही हैं।
हम सभी जानते हैं कि एक सुनियोजित तरीके से कश्‍मीरी हिंदुओं का कत्‍लेआम किया गया। उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर किया गया। अनगिनत अत्याचार ढहाए गए। जो मिला उसे मारा—काटा गया। बहन—बेटियों की इज्जत तार—तार की गईं। ऐसी परिस्थिति में मजबूर होकर हिन्दुओं को कश्मीर से भागना पड़ा। घाटी से हिन्दुओं के पलायन के बाद कश्मीर को इस्लाम के झंडे तले लाने का पूरा प्रयास शुरू हो गया। इसमें कुछ समय लगा लेकिन वह बहुत हद तक अपने प्रयास में सफल भी हुए। इस्लामिक ताकतों ने कश्मीर को हरे झंडे तले लाने के बाद जम्मू को अपना निशाना बनाया। वैसे यूं कहें तो जम्मू को भी बहुत सालों से इस्लामी झंडे तले लाने के विभिन्न स्तर पर प्रयास जारी हैं। लेकिन जम्मू में गैर मुस्लिम समुदाय की संख्‍या बहुत अधिक होने के कारण जिहादियों ने इसका इस्‍लामीकरण करने के लिए जनसांख्यिकी परिवर्तन का तरीका अपनाया। क्योंकि जो उन्होंने कश्मीर में किया वह जम्मू में सोच नहीं सकते, इसलिए दूसरे रास्ते पर काम कर रहे हैं। वह जम्मू को हरे झंडे तले लाने के लिए जनसांख्यिकी परिवर्तन का तरीका अपना रहे हैं। राज्य सरकार और उसकी मशीनरी के सहयोग के बिना यह काम संभव ही नहीं है। इसलिए समय—समय पर जम्‍मू-कश्‍मीर में रही सरकारों की कार्यशैली पर ध्‍यान देना होगा।
हिंदुओं की जमीन हड़पने का षड्यंत्र
वक्फ बोर्ड/औकफ विभाग ने लक्षित तरीके से जम्मू में हिंदू किसानों को अवैध बेदखली के नोटिस भेजे, जबकि किसान 70 वर्षों से इन जमीनों पर खेती करते आ रहे हैं, लेकिन वक्‍फ बोर्ड का दावा है कि यह कब्रिस्‍तान की जमीन है। औकाफ अधिनियम के तहत विवाद की स्थिति में वही निर्णय देने वाले होते हैं। इसलिए नतीजा क्‍या होता होगा, बताने की जरूरत नहीं। रोशनी अधिनियम के तहत योजनाबद्ध तरीके से जनसांख्यिकी परिवर्तन के मद्देनजर मुख्‍य रूप से जम्‍मू और उधमपुर, सांबा, कठुआ आदि में मुसलमानों को जमीनें दी गईं, जबकि हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों और बौद्धों के मामले लंबित रखे गए या खारिज कर दिए गए। हालांकि 2018 में रोशनी कानून को रद्द कर दिया गया। लेकिन इसी कानून की आड़ में रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों को संगठित और योजनाबद्ध तरीके से जम्मू, सांबा, कठुआ और इसके आसपास बसाया गया। घाटी के मुसलमान और कथित एनजीओ इन्‍हें बसाने के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं और इन्‍हें हर तरह का समर्थन दे रहे हैं।
घाटी से रोहिंग्‍याओं को मिल रहा समर्थन
कश्‍मीर घाटी के लोगों ने रोहिंग्‍याओं के समर्थन में जम्‍मू-कश्‍मीर उच्‍च न्‍यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की है। इसमें रोहिंग्याओं को जम्मू में बसने की अनुमति देने की मांग की गई है। बाहरी मुसलमान हवाला, सऊदी अरब और ‘अल्‍लाह वाले’ जैसे समूहों की मदद से जम्‍मू में 15-17 लाख की जमीन 25 लाख रुपये में खरीद रहे हैं। यह और कुछ नहीं जम्‍मू में जनसांख्यिकी परिवर्तन के लिए हिंदुओं की जमीन पर कब्‍जा करने का दूसरा तरीका है। इसके तहत बाहरी मुसलमानों को जम्‍मू में बसने का लालच दिया जा रहा है। इसके लिए आर्थिक मदद के अलावा गुप्‍त रूप से उनका पंजीकरण शरणार्थी के तौर पर किया जा रहा है और कश्‍मीरी पंडितों को मिलने वाली सुविधाएं दी जा रही हैं।
नियम के विरुद्ध पटवारियों का स्‍थानांतरण
चुनिंदा पटवारियों को उनके मूल जिले के बाहर स्थानांतरित करके राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी की जाती है, जबकि जम्‍मू में तैनात पटवारी अपने सेवा काल में जिले से बाहर स्‍थानांतरित नहीं हो सकता है। इसके बावजूद सेवा नियमों को धता बताते हुए जम्मू और इसके आसपास के दूसरे जिलों से मजहब विशेष के पटवारी लाए जा रहे हैं। इनका एकमात्र उद्देश्‍य हिंदू इलाकों में मुसलमानों के लिए जमीन का प्रबंध करना है। इस संबंध में तीन याचिकाएं जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय में लंबित हैं। हालांकि अनुच्‍छेद 370 निरस्‍त होने के साथ कई कानून भी निरस्‍त हो गए, लेकिन जनसांख्यिकी हमला अभी भी जारी है।
यूं मिलती रही राज्‍य सरकार की शह
 
  • तत्कालीन मुख्‍यमंत्री महबूबा मुफ्ती के 14 फरवरी, 2018 के आदेश के बाद जम्‍मू में मुसलमानों को कानूनी तौर पर भूमि पर कब्जा करने की अनुमति मिली।

  •  पूरे जम्मू में सरकार के समर्थन से वन भूमि पर कब्जे हुए और मुस्लिम बस्ती बसाई गई। कई प्रविष्टियां रद्द कर दी गई और यह प्रक्रिया चलती रही।

  •  नदी के ताल, इसके किनारे और आसपास पूरे जम्‍मू में राज्‍य सरकार के शह पर जमीनें कब्‍जाई गईं। आलम यह है कि तवी के 98 प्रतिशत हिस्‍से पर मुसलमानों ने अवैध कब्‍जा कर लिया।

  •  जम्मू के हिंदू बहुल इलाके में जमीन खरीदने के लिए मुसलमानों को एक तरह से 35 प्रतिशत की छूट मिलती है। यह वहाबी पैसा होता है जो सऊदी से आता है।

  •  अगर कहीं से कोई मुसलमान जम्‍मू आता है तो गरीब मुसलमानों को "धार्मिक उत्‍पीड़न का शिकार" के रूप में दिखाया जाता है। उन्‍हें कश्‍मीरी हिंदुओं की तरह सभी सुविधाएं मिलती हैं।

  • जम्‍मू में सुनियोजित और संगठित तरीके से रोहिंग्याओं और बांग्‍लादेशियों को बसाया गया। म्यांमार के ये अलगाववादी जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों के स्‍वाभाविक सहयोगी हैं।
( लेखक जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं इक्कजुट जम्मू के चेयरमैन हैं)