ए झूठ, तेरे कितने रूप

    दिनांक 27-मई-2020
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जवाहरलाल कौल
झूठ फैलाकर देश के माहौल को बिगाड़ने वाले हों या सही की गलत व्याख्या कर पुरस्कार पाने वाले, ये सभी देश के शत्रु हैं। फर्जी खबरों के जरिए स्वार्थ साधने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए
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मुरादाबाद में फर्जी खबर उड़ने के बाद पुलिसकर्मियों और चिकित्साकर्कियों को निशाना बनाया स्थानीय लोगों ने (फाइल चित्र)
कुछ दशकों से चिकित्सा जगत के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में एक शब्द प्रचलित हो गया है ‘वायरल’, जो वास्तव में ‘वायरस’ से ही विकसित हुआ है। हम आज उसी के विकराल रूप के साथ जीवन-मृत्यु की जंग लड़ रहे हैं। कुछ दिनों से एक और वायरस तेजी से फैलने लगा है। पहले वायरस का संबंध संक्रमण से है, तो दूसरे का संचार से। एक मानव शरीर को अंदर ही अंदर खोखला करते हुए देखते-देखते फैलता है। सामान्य रोग से महामारी और फिर वैश्विक महामारी में बदल जाता है। दूसरा सामान्य संचार माध्यम के रास्ते को छोड़कर चोरी-छिपे समाज में पहले से सक्रिय आपराधिक वर्गों के सहयोग से तथाकथित सामाजिक माध्यमों के रास्ते रातोंरात लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। दोनों की इस असाधारण गतिशीलता के कारण एक सामान्य शब्द का उपयोग किया जाता है- वायरल यानी वायरस को तेजी से फैलाने वाला। दुर्भाग्य से कोरोना की भांति इसमें भी रूप बदलने और परिवार फैलाने की अद्भुत क्षमता है।
फर्जी खबर, जो दरअसल अफवाह के परिवार का ही एक प्रकारांतर है। थोड़ा ध्यान दिया जाए तो पता चलेगा कि यह भी उसी महामारी का भाग है जिसकी ओर यह शब्द इंगित करता है। जाली या नकली समाचार क्या होता है। जो बात सच नहीं है, वह समाचार कैसे हो सकता है। वह तो अधिक से अधिक अफवाह कहलाएगी, लेकिन अगर उसे प्रचारित करने के पीछे कोई आपराधिक मंशा हो तो वह अफवाह एक सुनियोजित कुचक्र बन जाता है। उसे शुद्ध रूप से अपराध ही कहा जा सकता है। उसे समाचार का स्तर देना भी अपराधियों के जाल में फंसना ही होगा। वास्तव में कथित फर्जी खबर बाजारवाद की उपज है। बाजारवाद का मुख्य लक्ष्य किसी भी तरह माल बेचना होता है, भले ही उसके लिए किसी प्रकार का झूठ बोलना पड़े। इसलिए अगर खबर बेचनी है तो उसके लिए वे हथकंडे अपनाना अस्वाभाविक नहीं है, जिनमें नैतिकता की कोई जगह न रहे। खेद की बात है कि सामान्य माल बेचने के लिए जहां व्यापारी विज्ञापन का सहारा लेता है, वहीं खबर बेचने के लिए खबर को ही विकृत किया जाता है।
फर्जी खबर होती क्या है। एक प्रकार का जाली समाचार वहां होता है, जहां वास्तव में कोई समाचार ही न हो। किसी सामाजिक तनाव की स्थिति में अगर यह अफवाह फैला दी जाए कि इलाके में एक संप्रदाय के मोहल्ले में दूसरे संप्रदाय के लोगों ने हमला कर दिया और इस अफवाह को मीडिया ने प्रकाशित कर विश्वश्नीयता का जामा पहना दिया तो सामान्य तनाव को गंभीर दंगों में बदला जा सकता है। दूसरी प्रकार की जाली खबर तब बनती है जब वास्तविक घटना को ही विकृत करके समाज में शंका, भय या आक्रोश पैदा किया जाए। दोनों ही सूरतों में इसका उद्देश्य समाज या समाज के किसी विशेष वर्ग को आशंका या आतंक का शिकार बनाना होता है। इसकी दूसरी विशेषता यह होती है कि अफवाह या जाली खबर का प्रभाव उस वातावरण में सबसे अधिक होता है जब समाज या देश किसी आंतरिक या बाह्य संकट से घिरा हो, जनमानस व्याकुल हो या डरा हुआ हो तो किसी भी गलत सूचना को सही मानने की संभावना अधिक होती है और उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत और दूरगामी होती है।
दो महत्वपूर्ण उदाहरणों से जाली खबरों के पीछे आपराधिक मनोवृत्ति और उसके घातक परिणामों को समझा जा सकता है। कोरोना वायरस से पूरा विश्व लड़ रहा है। वैश्विक आपदा में भारत भी पूरी तरह उलझा हुआ है। जीवन और मरण की इस जंग में जहां पूरा समाज सरकार के साथ सहयोग कर रहा है, अधिकतर विपक्षी दल भी साथ दे रहे हैं, वहीं कुछ तत्व देश के इस संकट का लाभ उठाते हुए इस प्रकार की अफवाहों को प्रसारित कर रहे हैं जिनसे कुछ वर्गों में घबराहट पैदा होना स्वाभाविक होता है।
निजामुद्दीन मरकज की इमारत में बहुत से जमातियों के पाए जाने से प्रशासन और पुलिस अधिकारयों में हड़बड़ी मच गई, क्योंकि वायरस के आक्रमण के दौरान व्यक्तियों के बीच दूरी बनाए रखने के आदेश के उल्लंघन का इतना बड़ा उदाहरण पहली बार सामने आया था। इस देशव्यापी संकट में जहां अधिकतर लोगों ने साथ खड़े रहने का फैसला किया, वहीं कुछ लोग ऐसी अफवाहें फैलाने में लग गए जिनसे देशभर में सांप्रदायिक दंगे भड़कने की आशंका पैदा हो गई थी। अफवाह फैलाई गई, ‘‘वायरस की आरंभिक जांच के लिए सर्वेक्षण दरअसल भारतीय नागरिकता के लिए किया जाने वाला सर्वेक्षण ही है।’’ और यह भी, ‘‘तब्लीगी जमात के भगोड़े सदस्यों को खोजने के बहाने अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने की योजना है।’’ इन अफवाहों को स्थानीय लघु पत्रिकओं और इंटरनेट के माध्यम से प्रचारित किया गया। हमने देखा कि अचानक नगरों में चिकित्सा कर्मचारियों और डॉक्टरों के प्रति हिंसा की घटनाएं आरंभ हो गर्इं। महत्वपूर्ण बात है कि यह आक्रोश अक्सर बडेÞ नगरों की उन गरीब बस्तियों में हुआ, जहां बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक लोग रहते हैं। यह एक राष्टव्यापी कार्यक्रम को पटरी से उतारने का कुचक्र ही था।
वैश्वीकरण के साथ कई प्रकार की आपराधिक गतिविधियां चलाने के लिए भी गुप्त या भूमिगत संगठित व्यवस्थाएं भी बनीं, फिर चाहे वे नशीले पदार्थों की तस्करी के संगठन हों या आतंकवादी संगठन। यह भी हम जानते हैं कि इन संगठित उपक्रमों के बीच अक्सर आपसी तालमेल भी स्थापित होता है। ये सभी किसी-किसी अवसर पर एक-दूसरे से तालमेल से ही अपने इरादों को पूरा करने की योजनाएं बनाते हैं। जाली समाचारों का इस प्रकार के विश्वव्यापी षड्यंत्र में शामिल होने से दूरगामी परिणाम निकलते हैं। उदाहरण के लिए हाल की एक घटना को देखा जा सकता है। फोटो पत्रकारिता के लिए एक अमेरिकी कंपनी ने इस वर्ष के पुलित्जर पुरस्कारों की घोषणा की तो देश में हल्ला मच गया, क्योंकि जिन कश्मीरी पत्रकारों को पुरस्कार दिया गया, उन्होंने न केवल गलतबयानी पर पुरस्कार का दावा किया था, अपितु पुलित्जर संगठन ने जानबूझकर केवल भारत को बदनाम करने के लिए ही इस पुरस्कार की घोषणा की। यासीन डार नाम के एक पत्रकार ने एक चित्र खींचा, जिसमें एक बच्चे की लाश के पास उसके परिवार वाले शोक मना रहे थे। लेकिन इस चित्र की व्याख्या में कहा गया, ‘‘भारतीय सुरक्षाबलों ने 11 साल के आतिफ मीर के साथ पांच सशस्त्र युवकों को मारा।’’

विश्व प्रसिद्ध मीडिया संस्था के अधिकारियों और निर्णायकों ने यह परखने की आवश्यकता भी महसूस नहीं की कि समाचार सच है कि नहीं, जबकि इस घटना की खबर सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था। वास्तव में दो आतंकवादी एक कश्मीरी घर में घुसे और परिवार की कम उम्र की लड़की से शादी कराने की मांग की। परिवार वालों ने इंकार किया तो उन्होंने सबसे छोटे लड़के को बंधक बनाया। सुरक्षाबलों के आने पर अपनी जान बचाने से पहले उन्होंने उस बच्चे को गोली मार दी, क्योंकि वह भागने की कोशिश कर रहा था। लड़की पहले ही स्थानीय लोगों की सहायता से भागने में कामयाब हो चुकी थी, लेकिन पुल्तिजर ने शायद तय किया था कि समाचार सही हो या गलत भारत के विरुद्ध इसका इस्तेमाल करना है। इस प्रकार के अनैतिक संगठनों की ऐसी कार्रवाई को देश के विरुद्ध आक्रमण मान कर वही व्यवहार होना चाहिए जैसा किसी तस्कर गिरोह या आतंकवादी गुट के साथ होता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)