सेकुलर ज्ञान का थोथापन

    दिनांक 27-मई-2020
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मक्खन लाल
फिल्मी पैतरों में माहिर जावेद अख्तर कथित सेकुलरों में बड़े ‘ज्ञानी’ माने जाते हैं। जावेद उस खिलजी की तारीफें करते हैं जिसने अपने चाचा और श्वसुर की हत्या करके गद्दी हथियाई थी और हिन्दुओं पर जबरदस्त अत्याचार किए थे। जावेद की कलई बार-बार उघड़ चुकी है पर सेकुलर जमात के पास उनसे बड़ा ‘आलिम’ नहीं है

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जावेद अख्तर फिल्म जगत की जानी-मानी हस्ती हैं। कई सफल फिल्मों के गीत और पट-कथा लेखन का सेहरा इनके सिर पर है। वह संप्रग सरकार द्वारा पद्मभूषण से नवाजे गये हैं और साथ ही छह वर्ष के लिए राज्यसभा के लिए भी नामांकित किये गये थे। इन सब उपलब्धियों का मतलब सिर्फ इतना ही नहीं है कि सफलता के साथ-साथ वह किसी सरकार विशेष के विशिष्ट कृपापात्र थे, बल्कि यह एक प्रकार से ऐसा घोषणापत्र था जिसके दम पर वह किसी भी समय, किसी भी विषय पर, किसी के भी बारे में अपना विचार दे सकते हैं और लोगों से उनकी उम्मीद रहती है कि उसे बिना चूं-चपड़ किये स्वीकार कर लें। अगर किसी ने स्वीकार न कर, उनसे प्रश्न करने की जुर्रत की तो न केवल वह नहीं बल्कि उनकी पूरी सेकुलर जमात उस व्यक्ति को तरह-तरह की उपाधियों-सांप्रदायिक, प्रतिक्रियावादी, रूढ़ीवादी, दकियानूस, जाहिल आदि-और कभी कभी गालियों से भी नवाजती रही है।
हाल के कुछ महीनों में अपनी उपलब्धियों के बोझ से दबे और संप्रग सरकारों के एहसानों से अभीभुत जावेद अख्तर ने अपने ‘धर्म और इतिहास’ के 'ज्ञान' से भी हम सबको आलोकित करना शुरू किया है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए जावेद अख्तर के दो बहुप्रचलित वीडियो का जिक्र करना जरूरी है। एक वीडियो में वह सेकुलर पत्रकार राजदीप सरदेसाई और उन्हीं तरह के कुछ और लोगों से बात करते दिखाई दे रहे हैं। इस वीडियो में जावेद अपनी कुछ फिल्मी पटकथाओं और उनके कुछ संवादों को उद्धृत करते हुए अफसोस करते हैं कि अब वैसा लिखना संभव नहीं है। दूसरा वीडियो अभी हाल का है जिसमें जावेद अपने इतिहास 'ज्ञान' का प्रदर्शन कर रहे हैं।
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 जावेद खुद को जिस जहांगीर का वंशज बताते हैं उसी बर्बर इंसान के हुक्म पर
गुरु अर्जन देव को यूं यातनाएं देकर शहीद किया गया था
 
पहले दूसरे वीडियो को लेते हैं। इसमें जावेद एक टीवी चैनल पर प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान तारिक फतेह से इस्लाम पर बहस करने के लिए बुलाये गये थे। जावेद अख्तर बातचीत के स्तर को इतना गिरा देंगे, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी, लेकिन जिस विचारधारा को लेकर वह चल रहे हैं उसमें सब कुछ संभव है। खैर! बातचीत की शुरुआत तारिक फतेह से की गयी, जिन्होंने इस्लाम के बारे में कुछ बुनियादी सवाल उठाये। उन्होंने बीते दशकों, तथा शताब्दियों में मुसलमानों द्वारा दूसरे और अपने ही लोगों पर किये किये गये जुल्मों के साथ ही भारत के हिन्दुओं पर किये गये जुल्मों की बात की। तारिक ने याद दिलाया कि अगर जल्द ही कुछ न किया गया तो मात्र 10 प्रतिशत या उससे भी कम कट्टरपंथी मुसलमान पूरी दुनिया और सभ्यता को तबाह कर देंगे। इतना सुनते ही जावेद अख्तर लगभग आपे से बाहर हो गये और चीखते हुए बोले, ‘आपने क्या पढ़ा है, आपका स्रोत क्या है?’ जैसे ही तारिक ने बाबर, औरंगजेब आदि का नाम लेना शुरू किया, अख्तर गर्व से बोले, ‘हम बाबर और औरंगजेब की औलादें नहीं हैं। हम तो अकबर और जहांगीर की औलादें हैं।’
 
साथ में उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी की तारीफों के पुल बांध दिए। उसे एक 'महान सुल्तान' बताते हुए कहा कि 'उसने भारत के इतिहास में पहली बार भूमि सुधार और कर प्रावधान किये'। जावेद अख्तर को पता नहीं कि भारतवर्ष में भूमि कराधान की व्यवस्था अथर्ववेद के समय से ही है और उसे बराबर परिमार्जित किया जाता रहा है। मनु, वशिष्ठ, कौटिल्य आदि ने तो भूमि की उर्वरा शक्ति के आधार पर कर के रूप में उत्पाद का 1/8 से 1/4 भाग तक निर्धारित किया है। पूरे 3000 साल के साहित्य में निरन्तर इस बात को बल दिया गया कि कर का बोझ जनता की सामर्थ्य से ज्यादा न हो। कर कभी भी इतना न हो कि प्रजा उसके बोझ तले दब जाय। अलाउद्दीन खिलजी के पहले कर उपज का 1/6 यानी कुल उपज का 16 प्रतिशत था। खिलजी ने इसे बढ़ाकर 1/2 यानी कुल उपज का आधा कर दिया था। जबरन कर छीनने के बाद सुल्तान का कोई मतलब नहीं था कि प्रजा मर रही है या जिन्दा है। उसे तो फसल का आधा हिस्सा चाहिये था। जावेद अख्तर ने खिलजी की कीमतों के सरकारीकरण की बहुत तारीफ की। वह यह भूल गये कि किसानों की फसलों और व्यापार की अन्य वस्तुओं की कीमतों को अत्यधिक कम करके उसने न केवल सैनिकों और अधिकारियों को सस्ती दरों पर सामान उपलब्ध कराये बल्कि हिन्दुओं, जो कृषि और व्यापार में लगे थे, की आर्थिक कमर भी तोड़ कर रख दी था। अलाउद्दीन के बारे में यह भी बता दें की गद्दी हासिल करने के लिए उसने जलालुद्दीन खिलजी, जो उसका चाचा और श्वसुर भी था, का कत्ल उस वक्त किया था जब वह उसे खुशी से गले लगा रहा था।
 
जावेद अख्तर ने बहुत फख्र से अपने को अकबर और जहांगीर का वंशज माना, न कि बाबर या औरंगजेब का। समझ नहीं आता कि वंशावली और डीएनए के किस नियम के आधार पर वह बाबर और औरंगजेब को अकबर और जहांगीर से अलग करते हैं! अकबर के बारे में तो फिर कभी चर्चा करेंगे, पर पहले जहांगीर की बानगी देखते हैं। जहांगीर को भी, अलाउद्दीन खिलजी की तरह गद्दी हासिल करने की बहुत जल्दी थी। उसने भी बगावत की, पर उसे हासिल नहीं कर पाया जो खिलजी ने किया था। जहांगीर को इतिहास में इस बात के लिए हमेशा याद किया जायेगा कि उसने शेख अहमद सिरहिंदी के प्रभाव में सिखों के 5वें गुरू गुरु अर्जन देव का कत्ल किया था, वह भी उनके बिना किसी कसूर के। गुरु अर्जन सिंह के कत्ल का जिक्र जहांगीर ने खुद तुजूक-ए-जहांगीरी में किया है। दस्तावेजों के अनुसार गुरु अर्जन देव को 1606 ई. कैद करके लाहौर के किले में रखा गया था और वहां उन्हें बहुत यातनाओं के बाद मार डाला गया था।
 
पूरे मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं के हालात का वर्णन मशहूर किताब ‘तारीखे-वसाफ’ के लेखक शराफुद्दीन शिराजी ने इन शब्दों में किया है, ‘बुतपरस्ती को झुकाने और देवमूर्तियों को तोड़ने के लिए मजहबी सुरूर की रौ ऊंची फड़कती थी... इस्लाम के लिए मुहम्मदी फौजों ने उस नापाक जमीन पर बाएं-दाएं, बिना कोई मुरव्वत कत्ल करना शुरू किया। खून के फव्वारे छूटने लगे। उन्होंने इस पैमाने पर सोना-चांदी लूटी जिसकी कल्पना नहीं हो सकती। भारी मात्रा में जवाहरात और तरह-तरह के कपड़े भी।... उन्होंने इतनी बड़ी संख्या में सुंदर लड़कियों, लड़कों और बच्चों को कब्जे में लिया, जिसका कलम बखान नहीं कर सकती।... संक्षेप में, मुहम्मदी फौजों ने देश को बिल्कुल उजाड़ दिया। वहां के बाशिंदों की जिन्दगी तबाह कर दी, शहरों को लूटा, और उनके बच्चों पर कब्जा किया। अनेक मंदिर उजाड़ हो गए, मंदिर, देवमूर्तियां तोड़ डाली गईं और पैरों के नीचे रौंदी गईं, जिनमें सबसे बड़ा था सोमनाथ। उसके टुकड़े दिल्ली लाए गए और जामा-मस्जिद के रास्ते में उन्हें बिछा दिया गया ताकि लोग इसे याद रखें और इस शानदार जीत का जिक्र करें... सारी दुनिया के मालिक, अल्लाह की शान बनी रहे।’
 
आइए, अब जरा जावेद अख्तर के दूसरे वीडियो पर भी एक नजर डालें। इसमें जावेद अख़्तर सेकुलर जमात के कुछ लोगों से बात करते दिखाई दे रहे हैं। जावेद इस वीडियों में दावा कर रहे हैं कि ‘मैं नास्तिक हूं।.... मेरा कोई रिलिजियस बिलीफ नहीं है।... मैं किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करता....’!
 
उन्होंने शोले की अपनी पटकथा के बारे में कहा कि ‘शोले में एक सीन था जिसमें धर्मेंद्र शिवजी की मूर्ति के पीछे छुप जाता है और हेमा मालिनी आती है तो धर्मेंद्र कहता है-’ सुनो हम तुमसे... और वह समझती है, शिवजी बोल रहे हैं। वह हाथ जोड़ती है..... आज अगर पिक्चर बने तो शायद मैं वो सीन नहीं लिख पाऊंगा। बिकॉज इट विल क्रिएट प्रॉब्लम। 1975 में इसका प्रॉब्लम नहीं हुआ था।'
 
जावेद की घनीभूत पीड़ा है कि शायद वह भगवान शंकर की खिल्ली उड़ाने वाले दृश्य को आइंदा वैसा लिखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे। वह एक किसी पुरानी फिल्म के बारे में कह रहे हैं कि 'दिलीप कुमार, जिनका उनके अनुसार असली नाम यूसुफ खान है, ने एक फिल्म में भगवान की मूर्ति को उठाकर कहा है कि.... मैं इसे नाले में फेंक दूंगा'। पूरे वीडियो में उनका यह दर्द हिलोरें मार रहा है कि अब ऐसे संवाद नहीं लिखे जा सकते। बात तो सच है। उन्हें वीडियो में अपनी लिखी फिल्म शोले का भगवान शंकर की खिल्ली उड़ाने वाला बेहूदगी वाला दुश्य याद आता है मगर उसी शोले की कहानी में नेत्रहीन 'रहीम चाचा' याद नहीं आता, जिसमें अजान सुनकर बेटे की लाश पड़ी रहने पर भी 'मैं चलता हूं, नमाज का टाइम हो गया' वाली नमाज की पाबंदी यानी नमाज की 'अत्यंत महान आवश्यकता' और उसे समय पर पढ़े जाने की याद दिलाई जाती है।
 
कहते हैं, शबाना आजमी और उनके शौहर जावेद अख्तर दोनों मजहब नहीं मानते हैं। ऐसे तमाम लोग ये सारी बातें अपनी 'काफिरोफोबिक' मानसिकता के बचाव में करते हैं। जबकि अपनी हरकतों से शबाना और जावेद तमाम अवसरों पर यह साबित करते रहते हैं कि वे उम्मत का हिस्सा हैं, उससे अलग कुछ नहीं। उन्हें इसे भी गर्व से स्वीकारना चाहिए।
 
इन दोनों के इस्लाम को न मानने की एक बानगी देखिये। शबाना के सगे भाई और अख्तर के सगे साले हैं बाबा आजमी। अपने जीजा और बहन की तरह ही कम्युनिस्ट हैं और इस्लाम न मानने वाले। पर न जाने क्यों, जब स्त्री के अधिकार और अस्मिता की बात आती है, उनका इस्लाम इन सब पर हावी हो जाता है? अन्यथा क्या वजह रही होगी कि मराठी फिल्मों की अभिनेत्री उषा किरन और डॉ. मनोहर खेर की बेटी सौन्हिता खेर को शबाना आजमी के भाई और जावेद अख्तर के साले से शादी करने के लिए अपनी पहचान खत्म करनी पड़ी? बॉलीवुड में तो लोग सौन्हिता नाम भूल ही गए। अब तो सौन्हिता हो गई हैं तन्वी आजमी।
 
आज तक कभी किसी ने जावेद अख्तर या उनसे भी बड़े सेक्युलरवादी फिदा हुसैन को हिन्दू धर्म के अलावा किसी और मजहब के बारे में ओछी बातें कहते नहीं सुना। फिदा हुसैन को सेकुलरवादियों ने एक 'महान चित्रकार' के रूप में प्रचारित किया। उन्होंने तमाम हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाये, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर। हिन्दू देवियों के नग्न चित्र बनाना उनकी आदत थी। वह यह भी कहते थे कि 'इन देवियों का मैं मां की तरह आदर करता हूं।' लेकिन अपनी मां का आदर उन्होंने कैसे किया, उसकी भी बानगी उन्होंने दी। उन्होंने अपनी मां का एक चित्र बनाया, जिसमें पूरा शरीर, यहां तक कि कान और सर के बाल भी, बुर्के में ढके दिखाई; उसमें सिर्फ चेहरा दिखता है। यह सम्मान और किसी की मां के लिए क्यों नहीं?
 
जावेद यह तो कहते हैं कि वह अनीश्वरवादी हैं, किसी भगवान या 'गॉड' में विश्वास नही रखते, पर वह साफ क्यों नहीं बोलते कि कहीं कोई अल्लाह नहीं है। उसका आखिरी क्या, कोई पैगम्बर नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सहनशीलता की एक हद होती है। ऐसा क्यों हुआ, इसका उत्तर जावेद अख़्तर और उनके जैसों को खुद खोजना होगा। उन सबको यह समझाना होगा कि आजादी के बाद से, शोले फिल्म के बाद से गंगा में न केवल बहुत पानी बह चुका है, परन्तु उसे काफी दूषित भी किया गया है। समय के साथ लोगों में यह पहचानने की जागरूकता आई है कि कैसे कुछ लोग चुनिंदा बातें ही सामने रखते हैं और कैसे स्याह को सफेद और झूठ को सच बनाने की कोशिश करते हैं। समय आ गया है कि अपने विचारों के साथ थोड़ी ईमानदारी बरती जाये। (लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार हैं)