अफगानिस्तान और भारत का हित

    दिनांक 28-मई-2020   
Total Views |
आज के हालात में जब अफगानिस्तान की सरकार ही तालिबान की तरफ वार्ता की पींगें बढ़ा रही है तो भारत को अपने कदम भी बढ़ाने चाहिए। आईसी 814 विमान अपहरण के बाद से गंगा में बहुत पानी बह चुका। संवाद की अफगानी पहल भारत के लिए सकारात्मक संदेश
p54_1  H x W: 0
जुलाई 2019 में कतर में अफगानिस्तान के विभिन्न पक्षों के बीच वार्ता में शामिल तालिबान के सियासी नेता   (फाइल चित्र)

इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री हैरॉल्ड विल्सन की प्रसिद्ध उक्ति है-‘राजनीति में एक हफ्ते का समय बहुत लंबा होता है’। कोरोना वायरस की आंधी में जिंदगी संभालती दुनिया और इस बीच दक्षिण चीन सागर से लेकर भारत से सटी सीमा पर चीन की दुस्साहसपूर्ण गतिविधियों के बीच अफगानिस्तान में घटनाक्रम जैसे टी20 मैच की तरह बदलता रहा है। किसी दिन लगा कि अपने आंतरिक गतिरोधों को दूर न कर पाने के कारण अफगानिस्तान की राजनीति के धुरंधर तालिबान के लिए पूरा मैदान खाली छोड़ देंगे, तो अगले ही दिन तालिबान का एक वरिष्ठ वातार्कार पाकिस्तान के एक अखबार को कहता दिखा कि भारत ने हमेशा ही अफगानिस्तान में ‘नकारात्मक’ तत्वों का समर्थन किया है। फिर एक दिन राजनीतिक समझौते की सूरत बनती दिखती है और उम्मीद जगती है कि अगर सब कुछ सही रहा तो अफगानिस्तान की सरकार एक संगठित इकाई के तौर पर तालिबान के साथ बातचीत करने की स्थिति में होगी। लेकिन अगले ही पल तालिबान का मुख्य प्रवक्ता स्पष्ट कर देता है कि ‘बेशक पाकिस्तान भारत के साथ अपने विवाद का मूल कारण कश्मीर बताए, हमारा मानना है कि कश्मीर का घटनाक्रम विशुद्ध रूप से भारत का आंतरिक मामला है’।

अनिश्चित भविष्य
ऐसे में यह सवाल है कि आखिर अफगानिस्तान में हो क्या रहा है और भारत के नजरिये से वहां आने वाला समय कैसा रहने वाला है? इसका जवाब यही है फिलहाल तो भविष्य अनिश्चित और बड़ा चुनौतीपूर्ण है। भारत के लिए आशंकित होने के कई कारण हैं लेकिन उसे भयभीत होने की जरूरत नहीं। कई भारतीय विश्लेषकों ने तालिबान को पाकिस्तान की कठपुतली मानकर किसी भी बेहतरी की उम्मीद छोड़ दी है। पर इस तरह हम स्थिति का कुछ ज्यादा ही सरलीकरण कर रहे हैं। इससे जुड़ा एक बड़ा जोखिम यह है कि कहीं भारत अफगानिस्तान में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर न खो दे, जो उसके अपने सुरक्षा कवच को मजबूत करने में काम आता है। इसलिए वहां के हालात को उसकी सभी जटिलताओं के साथ समझना जरूरी है। इस दिशा में सबसे पहले हमें तालिबान संबंधित आशंकाओं को दरकिनार  करना होगा। 

भारत का तालिबान विरोध हैरान करने वाला है। अगर आईसी-814 विमान अपहरण कांड से जुड़ी यादों ने हमारी सोच को बंधक बना रखा है, तो आखिर भारत की विभिन्न सरकारों ने पाकिस्तान के साथ संबंध क्यों बरकरार रखे, जबकि विमान अपहरण कांड की साजिश तो पाकिस्तान ने रची थी? वास्तविकता यह है कि उस घटना के बाद भी पाकिस्तान ने भारत में अनगिनत हमले कराए, फिर भी 2018 तक हम पाकिस्तान के साथ अपने विवादों को खत्म करने की कोशिश में पूरी ईमानदारी से लगे रहे। साथ ही हम इसके समानांतर पाकिस्तान के किसी आक्रामक कदम का सामना करने के लिए अपनी सुरक्षात्मक तैयारियां भी मजबूत करते रहे। भारत जैसा विशाल आकार और संभावनाओं वाला देश पाकिस्तान जैसे दुष्ट देश से निपटने के प्रयास में अपने पैरों में जंजीरें नहीं डाल सकता। अगर तालिबान स्में मानवाधिकारों के प्रति सम्मान नहीं है और उसका कारगुजारियों का इतिहास निंदनीय है तो क्या? हमने दुनियाभर में ऐसे कई लोगों के साथ रिश्ता कायम रखा जो मानवाधिकारों को बुरी तरह कुचलते रहे, हमने कई तानाशाहों को अपना दोस्त भी कहा। भारत का हमेशा से यही रुख रहा है कि आंतरिक मुद्दों और विदेशी रिश्तों को अलग-अलग रखा जाए और यह सही भी है। किसी को हम पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं और ऐसे ही हम भी दूसरे देशों के मामले में फैसला नहीं सुनाते। अफगानिस्तान में पूर्व तालिबान शासन के खिलाफ संघर्ष में हमने जिन नेताओं का समर्थन किया, मानवाधिकारों के मामले में उनका इतिहास तालिबान से कोई खास बेहतर नहीं था। आज भारत और तालिबान की दोस्ती के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।

अक्सर एक अजीब तर्क दिया जाता है कि तालिबान के वर्चस्व वाला अफगानिस्तान लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद जैसे भारत-विरोधी आतंकवादी संगठनों के लिए पनाहगार बन जाएगा। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि लश्कर और जैश जैसे संगठन तो पाकिस्तान के औजार हैं जो पाकिस्तान और पाकिस्तानी कब्जे वाले जम्मू—कश्मीर से खुलेआम अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। अगर मान भी लिया जाए कि तालिबान एक कठपुतली है तो उस स्थिति में भी असली खलनायक तो पाकिस्तान ही होगा, तालिबान नहीं। फिर चीन के बारे में क्या कहेंगे जिसने कुख्यात पाकिस्तानी आतंकवादी को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित सूची में डालने के रास्ते में बार-बार रोड़े अटकाए? पर, हमारा सारा गुस्सा तालिबान के ही खिलाफ दिखता है।

खत्म करने होंगे संशय
तालिबान-पाकिस्तान के रिश्ते काफी जटिल हैं और इनसे जुड़े संशयों को खत्म करने की जरूरत है। सच्चाई यह है कि एक तरफ पाकिस्तान ने तालिबान को पनाह दे रखी है और  अफगानिस्तान की सरकारों के खिलाफ उसका इस्तेमाल करता रहा है, जिनके साथ आम तौर पर हमारे अच्छे संबंध रहे हैं। वहीं वह तालिबान पर कभी पूरा भरोसा नहीं करता। पाकिस्तान तालिबान नेताओं के परिवारों को बंधक बनाकर रखता है, तालिबान नेताओं की सभी बैठकों, यहां तक कि सशस्त्र अभियानों के दौरान भी पाकिस्तान के फौजी अधिकारी मौजूद रहते हैं। क्या वे इन मौकों पर उन्हें केवल सलाह देने के लिए वहां मौजूद रहते हैं,  या फिर वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तालिबान पाकिस्तान की लाइन से कहीं भटक न जाए? अफगानिस्तान ने डूरंड रेखा को कभी मान्यता नहीं दी, जबकि पाकिस्तान के लिए यह दोनों देशों को अलग करने वाली सीमा है। अफगानिस्तान का स्पष्ट मानना है कि डूरंड रेखा के दोनों ओर पश्तून इलाका है और यही अफगानिस्तान का भूगोल है जिस पर अंग्रेजों ने लगभग सौ साल तक राज किया। यही कारण है कि जब अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन था (1996-2001) और वह पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर था, तब भी उसने डूरंड लाइन को मान्यता नहीं दी थी। 

हमें यह भी देखना होगा कि अब अफगानिस्तान बदल गया है और तालिबान भी। अफगानिस्तान एक युवा देश है और 60 फीसदी आबादी को तालिबान शासन का कोई अनुभव नहीं, क्योंकि या तो उस समय इन लोगों का जन्म नहीं हुआ था, या वे इतने कमउम्र थे कि उस अनुभव को महसूस नहीं कर सकते थे। अत: यह उनकी याद का हिस्सा नहीं बन पाया। फिर अफगानिस्तान की लगभग एक तिहाई आबादी देश के बाहर रहती है।

अफगानिस्तान के लोगों को इंटरनेट और स्मार्टफोन आपस में और दुनियाभर से जोड़े रखता है। आज पहले वाला तालिबान नहीं रहा, जिसने खुद को दुनिया से काट रखा था, अब वह खुद को दुनिया से जोड़ कर रखता है। वे लोग अब मीडिया से रिश्ता बनाकर रखते हैं और सोशल मीडिया पर भी पूरी तरह सक्रिय हैं। पहले तालिबान के खिलाफ उत्तरी गठबंधन का समर्थन करने वाला भारत—ईरान-रूस का गठबंधन टूट चुका है और ‘इस्लामिक स्टेट’ को बाहर रखने के लिए रूस और ईरान ने तालिबान के साथ बड़े अच्छे रिश्ते बना लिए हैं। अमेरिका समेत अन्य पश्चिमी देशों को बरसों पहले यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई कि तालिबान को सैन्य रूप से हराना असंभव है और पिछले एक दशक से ये देश वहां सभी पक्षों से बातचीत करके युद्ध खत्म करने का कोई तरीका निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

चीन ने कई बार तालिबान प्रतिनिधिमंडल को अपने यहां बुलाया। यहां तक कि शांति सम्मेलन भी कराया जिसमें तालिबान के प्रतिनिधि और अफगानिस्तान के नेता मौजूद रहे। रूस ने भी इस तरह की कई बैठकें कराईं जिनमें भाग लेने के लिए भारत ने भी अपने दो पूर्व राजदूतों को भेजा था। दिलचस्प तथ्य है कि तालिबान इस शर्त पर अफगानिस्तान के इन नेताओं और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों से मिलने को तैयार हुआ कि वे निजी तौर पर इसमें शामिल हों। इनमें पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई समेत सभी दलों के नेता तथा सरकारी निकायों के लोग भी शामिल हुए।

इससे स्पष्?ट संकेत मिलता है कि आज का तालिबान 'पहले वाला' तालिबान नहीं रहा। वह न तो भारत की आलोचना करता है, न ही भारतीयों या उनकी परियोजनाओं पर हमला करता है। भारतीयों के खिलाफ ऐसे सभी हमले लश्कर और हक्कानी नेटवर्क जैसे पाकिस्तानी सेना समर्थित गुट करते रहे हैं। तालिबान ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि अफगानिस्तान के विकास में भारत एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। अगस्त 2019 में जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर दोषपूर्ण संवैधानिक स्थिति को सुधारते हुए अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने धमकी दी थी कि इस तरह के कदमों से अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया और जटिल हो जाएगी। लेकिन तभी तालिबान के प्रवक्ता ने सार्वजनिक तौर पर कुरैशी की बातों का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि इन दोनों मुद्दों का आपस में कोई संबंध नहीं। अभी हाल ही में जब शांति वार्ता में तालिबान प्रतिनिधिमंडल के उपनेता मुल्ला स्तानिकजई के हवाले से पाकिस्तानी अखबार में यह प्रकाशित हुआ कि भारत हमेशा से अफगानिस्तान में नकारात्मक ताकतों का समर्थन करता रहा है तो उस समय भी तालिबान के प्रवक्ता ने पहले से कहीं अधिक स्पष्टता के साथ यह बात कही कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है।

भारतीय विश्लेषकों को अन्य जगहों के घटनाक्रमों पर भी गौर करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र ने 16 अप्रैल, 2020 को अफगानिस्तान के हालात पर चर्चा के लिए पड़ोसी देशों की बैठक बुलाई। इस बैठक के लिए पाकिस्तान, चीन, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान को बुलाया गया। बैठक में अफगानिस्तान सरकार की भी नुमाइंदगी थी और दो ऐसे भी देश थे जो पड़ोसी न होने के बाद भी इसमें आमंत्रित थे-अमेरिका और रूस। लेकिन इस बैठक के लिए भारत को नहीं बुलाया गया, न ही बैठक में मौजूद किसी देश ने इसमें भारत की भागीदारी का मुद्दा उठाया। उस बैठक में मौजूद सभी नौ देशों ने जो कहा, उसमें यह बात आम थी कि वे सभी तालिबान के साथ बातचीत कर रहे हैं और स्वीकार करते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत है।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के संदर्भ में एक दशक का अनुभव रखने वाले भारत के पूर्व राजदूत विवेक काटजू ने एक अखबार में प्रकाशित अपने लेख में इस बात पर हैरानी जताई कि अफगानिस्तान की सरकार ने भी बैठक में भारत को शामिल न किए जाने पर एतराज क्?यों नहीं जताया जिसके हितों को ध्यान में रखते हुए हम तालिबान के साथ बातचीत नहीं करना चाहते। अमेरिकी प्रतिनिधि जल्मे खालिजाद की हालिया भारत यात्रा और उनका यह महसूस करना कि भारत में इस बात की पूरी क्षमता है कि वह अफगानिस्तान में अहम भूमिका निभा सके, अमेरिकी नीतियों में आ रहे बदलाव का संकेत है। इससे पहले अफगानिस्तान में भारत की बड़ी भूमिका का समर्थन करने में अमेरिका को हिचक होती थी। इसका कारण यह था कि अमेरिका नहीं चाहता था कि पाकिस्तान नाराज हो, क्योंकि पहले अफगानिस्तान युद्ध को चलाए रखने में पाकिस्तान की अहम भूमिका थी तो बाद में अमेरिका-तालिबान में समझौता कराने और अमेरिकी सैनिकों की वापसी में। एक बार जब ये सब हो जाए, तो भारत वहां अपने हितों के मुताबिक रुख अपना सकता है। 

वार्ता के दौर
तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के रिश्तों में भी जटिलताएं हैं। राष्ट्रपति हामिद करजई ने 2010 में तालिबान से बातचीत की थी और इसे देखते हुए अफगानिस्तान की सरकारें तालिबान से बातचीत के प्रयास करती रहीं, यहां तक कि पाकिस्तान और चीन के रास्ते भी। अफगानिस्तान की सरकारों ने विभिन्न नामों से शांति परिषदों का गठन किया जिनका एक ही उद्देश्य रहा-तालिबान के साथ बातचीत करना। बाद में 2015 में पाकिस्तान की पहल और चीन के समर्थन से तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के बीच दो दौर की सीधी बातचीत हुई। अफगानिस्तान सरकार की ओर से इसमें उपविदेश मंत्री हिकमत करजई ने भाग लिया। तब उस बातचीत का इसलिए कोई नतीजा नहीं निकल सका कि मुल्ला की मौत को छिपाने की बात खुल गई थी। लेकिन आज वह बात मायने नहीं रखती। अशरफ गनी सरकार तो तालिबान के साथ सीधे बातचीत करने को भी तैयार थी। गौरतलब है कि जब पाकिस्तान को पता चला कि अफगान सरकार तालिबान के साथ सीधे संपर्क की कोशिशों में हैं तो वह इतना नाराज हुआ कि उसने तालिबान के प्रतिनिधि मुल्ला बरादर को गिरफ्तार कर लिया। पाकिस्तान ने 2018 तक बरादर को हिरासत में रखा जब तक कि अमेरिका को महसूस नहीं हुआ कि तालिबान के साथ बातचीत शुरू करने के लिए उसे मुल्ला बरादर की मदद की जरूरत है। विभिन्न शांति सम्मेलनों के दौरान अफगानिस्तान में तमाम नेताओं की तालिबान के साथ मुलाकात हो चुकी है, यहां तक कि गनी भी बिना शर्त तालिबान के साथ बातचीत को बेताब थे। लेकिन यह मुलाकात इसलिए नहीं हो सकी कि तालिबान ने ही उनसे मिलने से इनकार कर दिया।

इधर अफगानिस्तान सरकार ने तो तालिबान को ‘मान्यता’ दे दी है, लेकिन तालिबान ही सरकार को मान्यता नहीं दे रहा और उसे कठपुतली सरकार बता रहा है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों के दौरान अफगानिस्तान सरकार की स्थिति कमजोर ही हुई है क्योंकि उसकी वैधता को लेकर संदेह पैदा हो गया है। 2014 में दिखावे के चुनाव के बाद 2019 में राष्ट्रपति पद के लिए हुआ चुनाव दोषपूर्ण रहा, जो बस नाम के लिए था। अब सभी समझ चुके हैं कि मतदाता क्या चाहते हैं, इससे कहीं ज्यादा अहम यह है कि पाकिस्तान के साथ सलाह-मशविरा करने के बाद अमेरिका क्या चाहता है, उस पर अंतिम नतीजा निर्भर करेगा। एक ऐसी कमजोर सरकार के साथ रिश्ते बनाना भारत के विकल्पों को सीमित करना होता और राहत की बात यह है कि राष्ट्रपति गनी और पूर्व मुख्य कार्यकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच सत्ता में भागीदारी का समझौता हो गया है। अगर ईमानदारी के साथ काम हुआ तो यह सरकार तालिबान के साथ बेहतर तरीके से तोलमोल कर सकती है। भारत के लिए भी यही अच्छा होगा।

भारत के सामने रास्ता
भारत को सिर्फ विमान अपहरण कांड को नहीं, बल्कि इतिहास के दूसरे संदर्भों को भी सही क्रम में याद रखने की जरूरत है। 1980 के पूरे दशक के दौरान चले जिहाद के दौरान अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकार के साथ भारत के नजदीकी संबंध बने रहे। पाकिस्तान की धरती से चलने वाली जिहादी तंजीमों की डोर पाकिस्तानी सेना के हाथ में थी जिसने तालिबान को पैसे और हथियार उपलब्ध कराने का फैसला किया।

हालांकि कम्युनिस्ट सरकार के सत्ता से हटने के बाद नई मुजाहिदीन सरकार ने भारत की ओर हाथ बढ़ाया, क्योंकि उसे लगता था कि अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान अपना नियंत्रण नहीं छोड़ेगा। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए मौजूदा स्थितियों में भारत के हित में यही है कि वह अफगानिस्तान के हर गुट के साथ बातचीत करे, चाहे वह हमें कितना ही असभ्य क्यों न लगे। लेकिन पाकिस्तान कतई छूट नहीं दी जा सकती कि वह तय करे कि हमारा एजेंडा क्या हो। जहां तक पाकिस्तान की बात है, वह कभी नहीं चाहेगा कि भारत की तालिबान के साथ बातचीत हो, क्योंकि उसे पता है कि काबुल पर जिसका भी शासन होगा, वह भारत को अपने पक्ष में रखना चाहेगा। अफगानिस्तान के लिए भारत से रिश्ते बनाने अहम हैं, क्योंकि एक तो वह विकास योजनाओं में मदद कर रहा है और दूसरे इससे अफगानिस्तान को पाकिस्तान की सेना के चंगुल से खुद को अलग करने का भी मौका मिलेगा। इसलिए भारत के लिए जरूरी है कि वह अफगानिस्तान को भारतीय चश्मे से देखे, न कि पाकिस्तानी चश्मे से। 

इसमें संदेह नहीं कि यह नाजुक वक्त है। भारत को सोच-समझकर अपने विकल्प आजमाने चाहिए। अगर संयुक्त राष्ट्र और तमाम देश खुलकर तालिबान के साथ रिश्ते रख रहे हैं तो आखिर हम ऐसा करने से परहेज क्यों करें? अगर हम आज अफगानिस्तान में हर गुट से वार्ता करेंगे तो इससे हमें कल के अफगानिस्तान के साथ बातचीत और संबंध रखने में आसानी होगी। इतना तय है कि तालिबान से बातचीत न करने का कोई फायदा नहीं होने वाला, खासतौर पर तब जब अफगानिस्तान की सरकार खुद ही तालिबान के साथ किसी समझौते पर पहुंच जाने वाली हो। यह कोई मुश्किल काम भी नहीं।

भारत ने अफगानिस्तान और उसके लोगों के साथ गहरे दोस्ताना संबंध बनाए हैं और वहां चल रहे किसी भी विनाशकारी खेल में उसकी अंशमात्र भी भूमिका नहीं है। भारत को अफगानिस्तान के सभी गुटों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए और अगर भारत से अनुरोध किया जाए तो उसे बिना किसी एजेंडे के अफगानिस्तान के विभिन्न गुटों के बीच प्रस्तावित वार्ता प्रक्रिया में एक दोस्त की तरह सहयोग करना चाहिए। एक शांत, स्थिर और आत्मनिर्भर अफगानिस्तान भारत के हित में है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमें अपने नीतिगत कदम उठाने होंगे।
(लेखक एम.एस. विश्वविद्यालय, वडोदरा के अटल बिहारी वाजपेयी नीति अनुसंधान और अंतरराष्टÑीय अध्ययन संस्थान के मानद निदेशक और इंडिया फाउंडेशन, नई दिल्ली के विशिष्ट सदस्य हैं)