विवादों पर भारी नेपाल से रिश्तों की गहराई

    दिनांक 28-मई-2020   
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 नेपाल ने कई इलाकों में भारत के साथ लगती सीमा को नए सिरे से परिभाषित करने वाले बिल को फिलहाल टाल दिया है। अब दोनों देशों को परस्पर विवाद को बातचीत से सुलझाने के लिए जरूरी समय मिल गया। हमारे रिश्ते एक-दूसरे के सरोकारों के प्रति संवेदनशील हैं और कोई वजह नहीं कि मिल-बैठकर इसे सुलझा न सकें।
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नेपाल ने अंतिम समय में अपने नए नक्शे को संवैधानिक मान्यता देने वाले विधेयक को संसद में पेश नहीं किया और इस तरह दोनों देशों के राजनीतिक रिश्तों में आया गतिरोध फिलहाल दूर हो गया है। ‘राजनीतिक’ का विशेष तौर पर उल्लेख इसलिए जरूरी है कि दोनों देशों के सांस्कृतिक रिश्ते तो निर्बाध रहे हैं और अगर कहें कि ये इतिहास-भूगोल की ज्ञात सीमाओं से भी परे हैं तो गलत नहीं होगा। हां, वर्तमान की अपनी एक भूमिका होती है और बेशक वह भूत का निर्धारण नहीं करता, लेकिन तिनका-तिनका जोड़कर भविष्य को जरूर गढ़ता है और इस कारण मौजूदा घटनाक्रम की महत्ता से इनकार भी नहीं किया जा सकता।

बुधवार 27 मई को नेपाल की संसद में नेपाल के नए नक्शे को मंजूरी के लिए एक बिल पेश किया जाना था, लेकिन ऐन मौके पर सरकार ने बिल प्रस्तुत नहीं किया। इस बिल को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन में ही मतभेद उभरने के कारण फिलहाल टाल दिया गया है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में भारत द्वारा कैलाश के लिए लिपुलेख होते हुए नए मार्ग को खोलने के बाद दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर विवाद शुरू हुआ और नेपाल की केपी शर्मा ओली सरकार ने नया नक्शा जारी किया जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा इलाकों को नेपाल का भाग दिखाया गया था। बुधवार को इसी नए नक्शे को मंजूरी दी जानी थी।

नए नक्शे को आधिकारिक बनाने के लिए 275 सीटों वाली प्रतिनिधि सभा में दो तिहाई सीटों की जरूरत थी और इसी कारण ओली सरकार को दूसरों की मदद की जरूरत थी। गठबंधन के सहयोगी पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की पार्टी के कई सदस्यों ने नए बिल पर आपत्ति जताई। दूसरी ओर 63 सदस्यों वाली विपक्षी नेपाली कांग्रेस को भी लगता था कि इस मामले में कुछ और विचार-विमर्श की जरूरत है। इसी कारण फिलहाल नए नक्शे को मंजूरी देने वाले विधेयक को पेश करने का विचार छोड़ दिया गया।

भरोसे पर टिका साझा भविष्य
फिलहाल, नए नक्शे को लेकर भारत और नेपाल के बीच के विवाद को परस्पर बातचीत से सुलझाने का मौका जरूर मिल गया है। इसमें संदेह नहीं कि भारत और नेपाल के रिश्ते समयातीत हैं और हमारी साझा संस्कृति ने इसकी जड़ों की मजबूती को बनाए रखा है। नेपाल और भारत के रिश्तों में जो भी हल्की-फुल्की तनातनी दिखती है, उसे किसी भी परिवार के भीतर उठने वाले एक विवाद की तरह ही देखा जाना चाहिए, जिसमें किसी विषय को लेकर मतभिन्नता हो सकती है, लेकिन उसे सुलझाने की इच्छाशक्ति और एक सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया मौजूद रहती है। कुछ ऐसा ही नेपाल के साथ हमारे रिश्तों में भी है।

वैसे, नेपाल के संदर्भ में दो बातों पर गौर किया जाना चाहिए। एक है विकास और दूसरा आंतरिक राजनीतिक समीकरण। विकास किसी भी सत्ता के लिए विचार का एक स्थायी विषय होता है और नेपाल के साथ भी यह है। इसमें कहीं से कोई परेशानी नहीं और दोनों देशों के भूगोल ने साझा संस्कृति के परस्पर मुक्त प्रवाह के लिए जो जमीन तैयार की है, उसमें नेपाल के विकास के हितों को महत्वपूर्ण माना गया है।

नेपाल की आंतरिक बाध्यताएं
किसी देश में राजनीतिक स्तर पर जो कुछ भी हो रहा होता है, उसका एक घरेलू आयाम तो होता ही है, कई बार उसका विदेशी आयाम भी हो जाता है जैसा नेपाल के मामले में है। नेपाल में अभी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) का शासन है। पार्टी की स्थापना दो वाम दलों कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (संयुक्त मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के 17 मई, 2018 के परस्पर मिलने से हुई। पार्टी के नियमित कामकाज को देखने का जिम्मा एनसीपी सचिवालय के पास है जिसमें प्रधानमंत्री ओली अल्पमत में हैं और इस बात को लेकर आशंकाएं जताई जा रही थीं कि 45 सदस्यीय स्थायी समिति और 174 सदस्यीय दल में वह बहुमत पा सकेंगे या नहीं। लेकिन चीन के सक्रिय सहयोग के कारण ओली सरकार अल्पमत की समस्या से निकल पाई। इसलिए नेपाल में आज जो भी हो रहा है, उसका एक चीनी कोण तो है ही। इसके अलावा भी यह ध्यान देने की बात है कि नेपाल में विदेशी निवेश के मामले में चीन सबसे बड़ा सहयोगी देश है क्योंकि वहां 90 फीसदी से ज्यादा निवेश चीन से ही आ रहा है।

नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना का भाग बनने के लिए भी दस्तखत कर रखा है। इसलिए यह मानना सर्वथा अनुचित होगा कि नेपाल की घरेलू घटनाओं पर चीन का कोई असर नहीं पड़ेगा। और चीन को लेकर तमाम तरह की भारतीय आशंकाओं की भी अपनी वाजिब वजहें हैं। शायद इसी कारण भारत के सेनाध्यक्ष कहते हैं कि सीमा को लेकर नेपाल की जो आपत्ति है, उसके पीछे किसी ‘तीसरे’ देश का हाथ है। लेकिन इसके जवाब में जब नेपाल के उप प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री ईश्वर पोखरेल यह कहते हैं कि भारतीय सेनाध्यक्ष का बयान ’नेपालियों’ का अपमान है तो यह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्तों को राजनीतिक ग्रहण लगाने जैसा है। एक बात तय है कि भारत और नेपाल के रिश्ते इस बात पर निर्भर नहीं करते कि कहां-कब-कौन सरकार है। राजनीति चाहे जब जिस तरह पेश आए, भारत और नेपाल के रिश्तों का आधार तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं दोनों देशों के लोगों का दिली रिश्ता।

इसलिए नेपाल की सरकार ब्रिटेन, भारत और नेपाल के साथ हुई 1947 की संधि पर फिर से विचार करने की जो भी कोशिश कर ले, होगा वही जो लोग चाहेंगे। गौरतलब है कि इसी संधि के कारण ब्रिटिश भारतीय सेना की छह गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना का भाग बनीं। आज भी नेपाल के युवाओं के पास यह विकल्प होता है कि वे चाहें तो नेपाल की सेना में काम करें, चाहें तो भारत की सेना में। नेपाल की सेना में तकरीबन 95 हजार सैनिक हैं और 50 हजार रिजर्व सैनिक जबकि भारतीय सेना में काम करने वाले नेपालियों की संख्या करीब 30 हजार है।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भारत और नेपाल के रिश्ते में ऐसी गहराई है कि उसमें हर परस्पर विवाद से निकलने की गुंजाइश है। यह गहराई इसलिए हमारे रिश्तों के स्थायी स्वरूप को निर्धारित करने में सक्षम रही और है, क्योंकि इसमें एक-दूसरे से जुड़ाव और एक-दूसरे के सरोकारों के प्रति संवेदनशीलता का अंतर्निहित भाव है। परस्पर रिश्तों की आजमाइश पहले भी हुई है, आज भी हो रही है और आगे भी होती रहेगी, लेकिन इसी साझा सांस्कृतिक विरासत  के कारण हम कदमताल करते हुए परस्पर रिश्तों की तात्कालिक बाधाओं से पार पाते रहे हैं और आगे भी ऐसा ही कर पाएंगे।