नजर वही जो झूठ पकड़े

    दिनांक 28-मई-2020
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प्रो. बृज किशोर कुठियाला
आजकल मीडिया के विभिन्न माध्यमों में फर्जी खबरों का सैलाब है। निहित स्वार्थ को पूरा करने के लिए कुछ तत्व सी खबरें बनाते और फैलाते हैं। ऐसे में सच और झूठ को पकड़ने की समझ विकसित करनी होगी

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सभी मत-पंथों में झूठ बोलना अनैतिक और पाप माना गया है, परंतु मनोविज्ञान में स्वीकार्य तथ्य है कि झूठ बोलना सामान्य मानवीय व्यवहार है। बाल्यकाल के संस्कारों में सत्य का आग्रह और झूठ के दुष्परिणामों का समावेश हो तो व्यक्ति को असत्य से परहेज की आदत हो जाती है। परंतु जब बच्चा अपने आसपास, विशेषकर परिवार में आवश्यक या अनावश्यक झूठ का प्रयोग देखता है तो उसके मन में झूठ के प्रति नकारात्मकता नहीं बन पाती। धीरे-धीरे झूठ के माध्यम से अपने काम निकलवाना व्यक्ति की आदत बन जाती है। कुछ लोग झूठ पर इतना निर्भर हो जाते हैं कि उनके मन में उचित-अनुचित या नैतिक-अनैतिक प्रश्न उठना ही बंद हो जाते हैं। झूठ पर सर्वाधिक शोध करने वाले मनोविज्ञानिक ब्रूनो वर्श्रे के अनुसार, ‘‘बच्चे दो से पांच वर्ष की आयु में झूठ बोलना सीखते हैं और 13-17 वर्ष का काल सबसे अधिक झूठ बोलने का होता है।’’ उसके एक सर्वेक्षण के अनुसार 60 वर्ष के बाद झूठ बोलना कम हो जाता है। एक अन्य शोध ने निष्कर्ष निकाला कि 44 प्रतिशत झूठ अपनी बात को मनवाने के लिए कहा जाता है और 22 प्रतिशत गलती छिपाने के लिए और 12 प्रतिशत दूसरों के संपर्क से बचने या टालने के लिए बोला जाता है। ये प्रतिशत अलग-अलग समाजों में कम ज्यादा हो सकते हैं, परंतु बौद्धिक क्षेत्र में समाज जीवन में झूठ और सत्य के चलन को समझने का प्रयास गंभीरता से हो रहा है।

मीडिया के विभिन्न साधन बहुत बड़ी संख्या में लोगों से संवाद की स्थिति बनाते हैं। मीडिया में बोला हुआ झूठ एक ही बार में असंख्य लोगों तक पहुंचता है और उसी अनुपात में उसका प्रभाव भी होता है। प्राय: पत्रकारिता में एक झूठी खबर का उदाहरण दिया जाता है जिसके कारण एक बड़ी पार्टी में विभाजन हुआ और तत्कालीन सरकार गिरते-गिरते बची। एक पत्रकार (वर्तमान में विख्यात) ने विरोधी पार्टी के नेता को साउथ ब्लॉक, दिल्ली में प्रधानमंत्री के कार्यालय के पास प्रसन्न मुद्रा में निकलते देखा।
 
पत्रकार ने दो पार्टियों के विलय की बैनर खबर अगले दिन लगवाई। यह फर्जी खबर का पहला उदाहरण नहीं था। लगभग तीस वर्ष पूर्व ‘एड्वरटोरियल’ का प्रचलन हुआ था। पाठकों को मूर्ख बनाने के लिए प्रचार को समाचार के रूप में प्रस्तुत करना भी तो फर्जी खबर की तरह धोखा ही है। परंतु समाचार पत्र यह कह कर बचाव कर लेते थे कि कोने में ‘एड्वरटोरियल’ छपा रहता है। उस बहुत छोटे अक्षरों में छपे को कितने पढ़ लेते थे और कितनों को यह शब्दावली समझ आती होगी?

सोशल मीडिया के आने के बाद तो नई संभावनाओं का अंबार लग गया। अब सबको कुछ भी और किसी को भी बोलने की छूट है। एक ही बात को कई साधनों से प्रसारित करने की सुविधा है। बार-बार एक ही बात कही जा सकती है। दिखाना, सुनाना और पढ़वाना सब एक साथ हो सकता है। जब तक मीडिया नहीं था, समाचार पत्र आने से पहले झूठ आमने-सामने की बात से ही प्रेषित हो सकता था या सुनी-सुनाई बात को नमक-मिर्च लगाकर दोहराने से। मीडिया के आने से सच-झूठ को बड़े स्तर पर फैलाने का कार्य सरल और सहज हो गया, परंतु नियंत्रण सीमित लोगों के हाथ में ही था। सोशल मीडिया में तो हर किसी को झूठ बोलने व कपट करने के असंख्य अवसर हैं। पिछले 5-6 वर्ष में जो सोशल मीडिया की पहुंच सुलभ हुई है उससे तो हर कोई, कभी भी, कहीं से भी, किसी से भी बात कहने की स्थिति में है। मानव के इतिहास में मनुष्यों का इतना व्यापक और घना जुड़ाव कभी नहीं हुआ। जितना विस्तार हुआ, उससे अधिक संवाद की संभावनाएं बनीं और उसी अनुपात में सत्य-असत्य के प्रसार की क्षमताएं बढ़ी हैं।

सभी प्रकार के मीडिया में झूठ कई कारणों से और अनेक प्रकार का होता है। वर्तमान में फर्जी खबर का मुख्य कारण वैचारिक युद्ध है। एक छोटा परंतु अति सक्रिय वर्ग प्रजातंत्र के चुनावी दंगल में बार-बार मात खा चुका है। उनका वैचारिक दिवालिया पिट चुका है। संख्या कम हो रही है। मैदान की लड़ाई लड़ने की क्षमता रही नहीं है। उनके खोखलेपन का भांडा फूट चुका है। ये लोग पहले मंचों से जनता को बरगलाते थे, आज प्रत्यक्ष मंच कम मिलते हैं तो झूठ और फरेब की फैक्ट्री खोल कर बैठे हैं। विशेषकर सोशल मीडिया में गढ़े हुए झूठ को लेकर खूब खेल खेलते हैं। इनके लक्ष्य पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा मुख्यत: रहते हैं। आजकल परस्पर विरोधी गुटों में आपसी मेल-जोल हुआ लगता है। पारंपरिक मीडिया का एक भाग इनका सहयोगी है। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर भी ये सक्रिय हैं। किसी भी घटना का तुरंत ‘मीम’ बना कर ‘वायरल’ करना इनका कार्य रहता है। समाचार को एकपक्षीय बना कर भी निरंतर प्रस्तुत करते हैं। कुछ नहीं से समाचार गढ़ने का भी इनका एक तरीका है। ‘हेट स्पीच’ का भी प्रयोग सोशल मीडिया में बखूबी करते हैं।

तब्लीगी जमात की जब पोल खुली तो दुष्प्रचार तंत्र ने सोशल मीडिया के माध्यम से सांप्रदायिकता का विष फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को इस बात पर बदनाम करने की भरपूर कोशिश की गई कि ‘भारत में मुस्लिम समाज को मजहबी  स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है।’ भारत विरोधी इन वर्गों को विदेशों में छिट-पुट समर्थन प्राप्त होता है। विशेषकर धन तो प्रचुर मात्रा में विदेशों से आता है।
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फर्जी खबर का एक नया नमूना : सोशल मीडिया पर इस चित्र के बारे में कहा गया कि ‘लॉकडाउन के कारण शहर से अपने गांव जाते समय इस बैलगाड़ी का एक बैल मर गया। इस कारण कभी पति, तो कभी पत्नी को बैलगाड़ी खींचनी पड़ी।’  जबकि सच तो यह है कि एक बैल को खुद गाड़ीवान ने बेच दिया था। 

समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू सोशल मीडिया में झूठ को आगे बढ़ाने का है। आजकल व्हाट्सएप सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला मंच है। बिना देखे-पढ़े या बिना समझे प्राप्त सामग्री को आगे बढ़ा देने की आदत बहुत लोगों को है। अनजाने में ही झूठ के प्रसार में सीधे-साधे लोगों से अपराध हो जाता है। हालांकि इसे कम करने के प्रयास भी हुए हैं। पांच से अधिक ‘फॉरवर्ड’ करने की सुविधा नहीं है। अब तो यदि कोई ‘पोस्ट’ बहुत अधिक बार ‘फॉरवर्ड’ हो गई हो तो उसको और आगे भेजने की एक सीमा है।

फेसबुक पर भी मनगढ़ंत सामग्री डालने की, पसंद करने की और समूहों में डालने की परंपरा पड़ चुकी है। ट्विटर पर तो खूब टकराव होता हैं, जिनमें झूठ व अभद्र भाषा का भी प्रयोग होता है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि फर्जी खबर, मिथ्या जानकारी और घृणित वक्तव्य सोशल मीडिया में चलते ही रहेंगे, बल्कि उनके बढ़ने की संभावनाएं भी प्रबल हैं। इन विधाओं का स्वरूप और स्वभाव ऐसा है कि कानून व नियम बनाने से झूठ व धोखा कम तो हो सकता है पर पूर्णत: रुकना संभव नहीं है। सोशल मीडिया में झूठ का विषाणु तो चलने वाला है। समझदारी यह है कि जानकारियों की भीड़ में से सच और झूठ को पहचानने की जौहरी दृष्टि जनमानस को देनी चाहिए। जो व्यक्ति ‘स्मार्टफोन’ का प्रयोग करने की तकनीक सीख सकता है, थोड़ा-सा प्रयास करने से उसको सत्य-असत्य की परख भी सिखाई जा सकती है। यह कार्य नया नहीं है। वर्षों से ‘मीडिया लिटरेसी’ के अभियान समस्त संसार में चल रहे हैं। रेडियो के लिए श्रोता मंच, समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के लिए पाठक मंच, टेलीविजन व फिल्मों के लिए दर्शक मंच मीडिया का उपयोग करने वाले आमजन को अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित की समझ देते रहे हैं। अब आवश्यकता है कि मीडिया साक्षरता व जागरूकता अभियान के अंतर्गत सभी को सोशल मीडिया में बढ़ते झूठ को पहचानने व उसका खंडन करने का विवेक व तकनीक सिखाई जाए। इसे सोशल मीडिया के माध्यम से सिखाना सरल है। माना कि सरकारें, समाचार प्रसारण की संस्थाएं व कुछ स्वयंसेवक संगठन फर्जी खबर का समय- समय पर भांडा फोड़ रहे हैं, परंतु झूठ की मात्रा इतनी अधिक है कि हर वह व्यक्ति जो सोशल मीडिया का प्रयोग करता है उसे झूठ को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए।

वर्तमान में फर्जी खबर को पहचानने के अनेक पाठ ‘आनलाइन’ प्राय: सभी विदेशी भाषा में उपलब्ध हैं। कई तो वैचारिक झुकाव रखते हैं। पत्रकारिता विश्वविद्यालय में भारत केंद्रित पाठ्यक्रम बनाया गया है।

किसी भी खबर की सत्यता को जांचने के लिए दो स्तरों पर परीक्षण करना है। पहले देखें कि खबर, पोस्टर, मीम या वीडियो का उद्देश्य, स्रोत, तथ्य व लक्षित उद्देश्य क्या है। सामान्यत: यदि उद्देश्य किसी को बदनाम करना या गलतफहमी फैलाना है तो उसके असत्य होने की संभावना अधिक हो जाती है।

सोशल मीडिया में अगर प्रमाणिक सामग्री है तो स्पष्ट रूप से स्रोत दिया होता है और स्रोत की विश्वसनीयता भी सामग्री का सत्यापन करती है। स्रोत न होना, स्पष्ट न होना या अक्षरों में भेद गढ़े हुए झूठ की तरफ इशारा है। सामग्री में कुछ तथ्य हों तो उनको जांचना चाहिए। आमतौर से सचाई के साथ कुछ झूठ मिश्रित करने की चालाकी की जाती है। तथ्यों को गूगल में देखा जा सकता है या पूछताछ करके जांच की जा सकती है। तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना भी फर्जी सामग्री का सूचक है। हर सामग्री का कोई लक्षित समूह होता है। यदि किसी विशेष वर्ग या समूह को बरगलाने या भड़काने का प्रयास है तो उस सामग्री का पुन: परीक्षण की आवश्यकता है। इसी प्रकार चित्र/वीडियो, टेक्स्ट, संरचना व भाषा से भी खबर के सत्य-असत्य होने का निर्णय लिया जा सकता है।

आजकल अनेक ऐसे ‘एप’ चल रहे हैं जिनसे फर्जी या सही होने का पता लगाया जा सकता है। जनमानस को फर्जी और सच में अंतर करने की कला सिखा दी तो इस विषाणु का न केवल दुष्प्रभाव कम होगा, बल्कि फर्जी खबर की बीमारी ही जड़ से समाप्त हो जाएगी।

 (लेखक संवाद विज्ञान के प्राध्यापक व हरियाणा उच्च शिक्षा परिषद् के अध्यक्ष हैं)