नीम चढ़ा करेला

    दिनांक 28-मई-2020
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राहुल महाजन
फेक न्यूज और सोशल मीडिया एक दूसरे के सहारे हैं। मीडिया की फर्जी खबरों को सोशल मीडिया पंख लगाता है। सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें फैलने का एक कारण किसी खास पोस्ट  को वायरल करने की सनक भी है। साथ ही, यहां कुछ स्वयंभू संपादक भी हैं, जिनकी हर मसले पर विशेषज्ञ राय होती है। सख्त  कानून नहीं होने से सोशल मीडिया पर नकेल कसने के उपाय कारगर साबित नहीं हो रहे
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 मुंबई में ट्रेन चलने की फर्जी खबर फैलाकर बांद्रा स्टेशन पर मजदूरों को इकट्ठा किया गया। (फाइल चित्र)

कोंविड-19 के साथ देश को एक और संकट का सामना करना पड़ रहा है, वह है फेक न्यूज। कुछ दिन पहले कोरोना वायरस को ठीक करने वाली फर्जी दवाओं और नुस्खे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे। टिकटॉक पर फेस मास्क पहने एक व्यक्ति 30 सेकंड के वीडियो में इलाज बता रहा था कि गरम पानी, नमक और सिरका से कुल्ला करने पर कोरोना वायरस खत्म हो जाता है। इसके अलावा, कोरोना वायरस ठीक करने वाले गद्दे के आविष्कार जैसी फर्जी सूचनाओं का भी सोशल मीडिया पर बोलबाला रहा। साथ ही, यह भी दिखा कि गलत खबर का परिणाम क्या हो सकता है। मध्य प्रदेश के इंदौर में एक 65 वर्षीय व्यक्ति की कोरोना  से मौत हो गई थी। 2 अप्रैल को उसकी शिनाख्त के लिए डॉक्टर, स्वास्थ्य विभाग और राजस्व विभाग की टीम गई। लेकिन इलाके में अफवाह फैला दी गई कि टीम मुसलमानों को पकड़ कोरोना वायरस का इंजेक्शन लगा रही है। लिहाजा भीड़ ने टीम पर हमला कर दिया।

फर्जी खबरें वैसे तो पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन गई हैं, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह कहीं ज्यादा खतरनाक और चुनौतीपूर्ण हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है देश की अधिकांश आबादी के लिए सोशल मीडिया बिल्कुल नया है और इस पर मिलने वाली हर जानकारी को वे सही मान लेते हैं। उनके लिए गलत और सही सूचनाओं में अंतर मालूम कर पाना तब और भी मुश्किल हो जाता है, जब ऐसी कोई सूचना उनके परिवार और संबंधियों द्वारा उन्हें भेजी जाती है। कोरोना वायरस के बारे में अनभिज्ञता के बीच ऐसी भ्रामक सूचनाओं से निपटना चुनौती से कम नहीं है। 

लाकडॉउन के दौरान विभिन्न राज्यों में प्रशासन द्वारा की जा रही सख्ती की तस्वीरें हमारे सामने हैं। महाराट्र में फर्जी, भ्रामक और नफरत भरी जानकारी फैलाने को लेकर 363 मामले दर्ज हो चुके हैं। इनमें 196 लोगों को आपत्तिजनक पोस्ट डालने, सोशल मीडिया पर भ्रामक वीडियो या तस्वीरें डालने या फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इन सभी मामलों में 155 व्हाट्सएप पर फर्जी जानकारी साझा करने, जबकि 140 मामले फेसबुक पोस्ट से जुड़े हैं। कोलकाता पुलिस ने तो 18 मार्च से 18 मई, 2020 के बीच 1.30 लाख फर्जी सूचनाएं सोशल मीडिया से हटाई हैं। साथ ही, 270 मामले दर्ज कर 199 लोगों को गिरफ्तार भी
किया है।

फर्जी खबरों, जानकारियों और वायरल पोस्ट को नियंत्रित करने के लिए देश में लंबे समय से कवायद चल रही है, लेकिन अब तक सारे उपाय नाकाम साबित हुए हैं। सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों के मुताबिक, सोशल मीडिया को नियंत्रित कर पाना फिलहाल भारत में संभव नहीं है। समस्या यह है कि अक्सर किसी बड़ी घटना के बाद फर्जी खबरों के मामले बढ़ जाते हैं। भारत में ज्यादातर सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को सूचना प्रौद्योगिकी कानून की कोई जानकारी ही नहीं है। इसलिए लोग बिना सोचे-समझे किसी भी सूचना को आगे बढ़ा देते हैं। इसके अलावा फेसबुक, व्हाट्सएप और गूगल जैसे ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफार्म और सर्च इंजन के सर्वर भारत में नहीं हैं। दरअसल, ये विदेशी कंपनियां भारतीय कानूनों को बहुत गंभीरता से नहीं लेती हैं। ऐसे बहुत से मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें सोशल मीडिया मंच पुलिस समेत अन्य जांच एजेंसियों को गंभीर अपराध से जुड़े मामलों में भी जानकारी लेने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अन्य देशों में फर्जी खबरों, फर्जी सूचनाओं और वायरल पोस्ट की रोकथाम के लिए सख्त कानून हैं। फर्जी खबरों और सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर सिंगापुर में कानून बहुत सख्त है। वहां सोशल मीडिया कंपनी और उपयोगकर्ता, दोनों को कानून के दायरे में रखा गया है।

देश में हाल के दिनों में परंपरागत मीडिया में भी फर्जी खबरों का चलन बढ़ा है। पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय में प्रवासी मजदूरों की दशा पर दो याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि कोरोना से जुड़ी खबरों के प्रकाशन-प्रसारण में मीडिया को विशेष जिम्मेदारी का परिचय देगा। साथ ही, यह सुनिश्चित करना होगा कि कोरोना संक्रमण से जुड़ी किसी भी खबर को बिना तथ्यों की पड़ताल किए या फर्जी खबरों को छापा या दिखाया न जाए। स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया को अपने अंदर झांकने की जरूरत है। कोरोना संक्रमण काल में पारंपरिक मीडिया में ऐसी खबरों की भरमार रही है जो तथ्यों से कोसों दूर थी और जिसके कारण लोगों में भ्रम और डर का माहौल पैदा हुआ।
 
 
कहां कैसा कानून?
  •  यूरोपीय संघ
    2019 में यूरोपीय संघ की परिषद द्वारा कानून में बदलाव कर सोशल मीडिया उपयोगकर्ता को जिम्मेदार बनाया गया है। इससे इंटरनेट पर फोटो या पोस्ट का अपने प्रयोग के लिए चोरी करने जैसे मामलों पर लगाम कसने में कामयाबी मिली है। इंटरनेट सेवा प्रदाता, सोशल मीडिया और सर्च इंजन कंपनियां इस कानून को मानने के लिए बाध्य हैं।
  •  सिंगापुर
    सिंगापुर में भी भ्रांति फैलाने, आपत्तिजनक पोस्ट करने या किसी भी तरह की फेक न्यूज फैलाने पर 10 साल की सजा का प्रावधान है। फर्जी खबरों पर रोक नहीं लगाने पर सोशल मीडिया कंपनियों पर 5.13 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही, संबंधित व्यक्ति को पोस्ट हटाने या उसे संशोधित करने के लिए भी कहा जा सकता है। निर्देशों का पालन नहीं करने वाले पर 10.26 लाख रुपये का जुर्माना या 1 साल की सजा हो सकती है।
  • आस्ट्रेलिया
    यहां भी फर्जी खबर फैलाने से रोकने में नाकाम सोशल मीडिया कंपनी पर सालाना टर्न ओवर का 10 प्रतिशत जुर्माना या 3 साल तक की सजा हो सकती है। इसके अलावा, सोशल मीडिया कंपनी आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली पोस्ट, हत्या, दुष्कर्म और अन्य तरह के गंभीर अपराधों से संबंधित पोस्ट हटाने में असफल रहती है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करते हुए संबंधित व्यक्ति पर 80.58 लाख रुपये तथा निगम या संगठन पर 4.029 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  •  मलेशिया
    मलेशिया में फर्जी खबरों को रोकने के लिए बेहद सख्त कानून बनाया गया है। ये कानून हाल ही में लागू किया गया है। मलेशिया में फर्जी खबरों को फैलाने पर 84.57 लाख रुपये का जुर्माना या 6 साल की जेल या दोनों का प्रावधान है।
  •  फ्रांस
    फ्रांस ने 2018 में फर्जी खबरों से निपटने के लिए दो कानून बनाए। फ्रांस ने ये कदम 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में रूस के दखल का आरोप लगने के बाद उठाए थे। ये कानून राजनीतिक पार्टियों या उसके उम्मीदवारों को फर्जी खबर के खिलाफ अदालत जाने की इजाजत देते हैं। इसके अलावा फ्रांस की ब्रॉडकास्टिंग संस्था को ये अधिकार देते हैं कि वह फर्जी खबर फैलाने वाले किसी भी टीवी चैनल या नेटवर्क को बंद कर सकती है।
  •  जर्मनी
    जर्मनी में 2018 में फर्जी खबरों को रोकने के लिए नेटवर्क इन्फोर्समेंट एक्ट सभी कंपनियों और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों पर लागू किया गया है। देश में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए अपने प्लेटफार्म पर चलाई गई सामग्री से संबंधित शिकायतों की समीक्षा करना अनिवार्य है। अगर वह  गैरकानूनी पाई जाती है तो उसे 24 घंटे के भीतर हटाना होता है। फर्जी खबरों फैलाने वाले किसी व्यक्ति पर 38.83 करोड़ रुपये और किसी कंपनी पर 388.37 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। यह कानून इंटरनेट पर नफरत भरी पोस्ट फैलाने वालों पर भी लागू होता है।


झूठी खबरों की बाढ़
7 मई को टाइम्स आॅफ इंडिया में छपी खबर को ही देखें। इसके हैदराबाद संस्करण में खबर छपी कि देश में कोविड-19 से मरने वालों की संख्या देश में 50,000 तक पहुंच गई है, जबकि 7 मई को सुबह 8 बजे तक मरने वालों का आंकड़ा 1783 था। इसी तरह, ‘न्यूज पोर्टल’ ‘न्यूज झारखंड’ ने दावा किया कि जयपुर के ट्रांसपोर्ट नगर क्षेत्र में एक साधु की चिलम से 300 लोगों में कोरोना फैला। जयपुर के जिला कलेक्टर के अनुसार प्रकाशित खबर की कोई सत्यता नहीं थी। अधिकारी के मुताबिक ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं।

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10 अप्रैल को कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इंडिया टाइम्स की (अब हटा ली गई) एक खबर को ट्वीट किया, जिसमें महाराष्ट्र में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की कमी का हवाला देते हुए तंज कसा गया था कि केंद्र सरकार दूसरे देशों को यह दवा निर्यात कर रही है। लेकिन यह खबर भी गलत तथ्यों पर आधारित थी। प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) ने जानकारी दी कि स्वास्थ्य मंत्रालय महाराष्ट्र को 34 लाख हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की गोलियां पहले ही आवंटित कर चुका है। इसी तरह, मीडिया में एक खबर परोसी गई, जिसके मुताबिक केंद्रीय कर्मचारियों को सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक काम करना पड़ेगा। साथ ही, उनकी शनिवार की छुट्टी भी रद्द कर दी जाएगी। लेकिन पीआईबी ‘फैक्ट चेक’ ने इसे भी झूठ करार देते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने न तो ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है और न ही ऐसे किसी प्रस्ताव पर विचार कर रही है।

साफ है कि पारंपरिक मीडिया भी तथ्यों पर आधारित खबरें छापने के अपने दायित्व पर खरा नहीं उतर पा रहा है। ऐसे में इस बारे में हस्तक्षेप की आवाज उठना स्वाभाविक है। वैसे भारतीय मीडिया पर कार्रवाई के प्रावधान तो हैं, लेकिन विदेशी मीडिया जिस तरह से लगातार भारत के खिलाफ फर्जी खबरों की बमबारी कर रहा है, वह परेशान करने वाला है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने हाल ही में कश्मीर में मारे गए हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी रियाज नायकू को गणित का अध्यापक से बागी कमांडर बनने जैसी फर्जी कहानियां गढ़ीं। 

विदेशी मीडिया सबसे बड़ा सिरदर्द

कोविड-19 की रोकथाम के लिए भारत सरकार के लॉकडाउन के फैसले को पूरी दुनिया सराह रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स अमेरिका में लॉकडाउन की हिमायत करता है, लेकिन अपनी वेबसाइट पर भारत में लॉकडाउन को गरीबों को भूखा मारने का फरमान बताता है। वाशिंगटन से चलने वाली वेबसाइट ‘द एटलांटिक’ का रवैया भी कुछ ऐसा ही है। उसने 31 मार्च, 2020 को अपनी वेबसाइट पर एक लेख में अमेरिका में लॉकडाउन का समर्थन किया, लेकिन 27 मार्च को प्रकाशित लेख में भारत के लॉकडाउन को ‘रूखा और बेरहम’ बताया था। साथ ही, भारत सरकार पर तंज कसते हुए इसने लिखा कि सरकार ने यह दिखाया है कि कोविड-19 से कैसे नहीं निपटना चाहिए। दुष्प्रचार फैलाने में ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ भी पीछे नहीं है। उसने 12 मार्च को अमेरिका को चीन और इटली के लॉकडाउन से सीख लेने की नसीहत दी, लेकिन भारत में लॉकडाउन पर शीर्षक लगाया ‘भारत में लॉकडाउन, फैला डर: गरीबी हमें पहले मार डालेगी’। ऐसे में देश में विदेशी अखबारों के प्रति गुस्सा और आक्रोश स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में दो बातें सामने आती हैं। पहला, विदेशी मीडिया को भारत को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है। इसके लिए उनके साथ संवाद जरूरी है। दूसरा, भारत को अपने मीडिया को इतना सशक्त करना होगा ताकि वह दुनिया में भारत की आवाज बन सके और विदेशी मीडिया की ओछी हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दे सके।
    (लेखक राज्यसभा टीवी के मुख्य संपादक हैं)