‘इस्लामोफोबिया’ की बात करने वाले रूढ़ीवादी और खुद को न बदलने की कसम खाने वाले लोग हैं

    दिनांक 28-मई-2020   
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जो लोग ‘इस्लामोफोबिया’ की आड़ लेकर अनर्गल प्रलाप करते हैं, यह वही लोग हैं जो समय और माहौल के हिसाब से खुद को न बदलने की कसम खाए हुए हैं। इसलिए रूढ़ीवादी मुसलमानों को हर तरफ दुश्मन ही नजर आते हैं
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पिछले दिनों दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जफरूल इस्लाम खान के कुवैत का नाम लेकर भारत को धमकाने की पूरे देश में जमकर आलोचना हुई। हकीकत में देखें तो जो ‘इस्लामोफोबिया’ की आड़ लेकर अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं, यह वही लोग हैं जो समय और माहौल के हिसाब से खुद को न बदलने की कसम खाए हुए हैं। इसलिए रूढ़ीवादी मुसलमानों को हर तरफ दुश्मन ही नजर आते हैं। आजादी के सात दशक बाद मुसलमानों के एक तबके में कोई तब्दीली नहीं आई है। न ही उनका आचरण बदला है और न ही मानसिकता। जबकि देश और वैश्विक स्तर पर तस्वीरें बदल चुकी हैं। इसके बावजूद मुसलमानों का व्यवहार आज भी दूसरी कौम पर जबरिया राज करने जैसा ही है।

बात-बात में टकराना इनकी फिरत में शामिल हो गया है। दिल्ली के डॉक्टर मुफती मुकर्रम अहमद कहते हैं कि इस्लाम में पड़ोसियों को तकलीफ देने की सख्त मनाही है, ऐसे में कोई मुसलमान किसी अन्य मतावलंबी को तकलीफ देने की सोच भी कैसे सकता है। कोई जरूरी नहीं कि आपकी हर बात स्वीकारी जाए। इसका मतलब यह कतई नहीं कि वह आपसे नफरत करता है। ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता अपने हिसाब से संविधान और कुरान की व्याख्या कर हर दम मुसलमानों को बहकाते आते हैं। ऐसे में बेहतर यही है कि मुसलमान खुद तमाम परिस्थितियों को समझें और उसके अनुकूल कार्य करें। क्योंकि राजनीतिक दल अपने लाभ-हानि के हिसाब से आपके सामने मुददे परोसते हैं। इसलिए मुसलमान खुद सजग बनें। पढ़ें-लिखें और इतने समझदार बनें कि उन्हें कोई बरगला न सके। इसमें कोई शक नहीं कि मुगल शासन के दौरान हिंदुओं पर अत्याचार किए गए ।

यह पूरा इतिहास बेहद हिंसक और लूट-खसोट वाला रहा है। इसके बावजूद मुसलमानों का एक तबका उनमें से न केवल कई को हीरो मानता है, बल्कि उनकी बुराई करने पर भड़क उठता है। होना यह चाहिए था कि वे खुद ऐसे दुष्टों की मुखालफत करते और उनके नाम से देश में बने तमाम स्मारकों, सड़कों के नाम परिवर्तन की बात को आगे रखते। लेकिन इसके विपरीत हो यह रहा है कि जब ऐसी शख्सितों के नाम पर बनी सड़कों, इमारतों और रेलवे स्टेशन के नाम बदले जाते हैं तो यह तबका इस्लाम और मुसलमान पर हमला बताकर आसमान सिर पर उठा लेता है। मुसलमान इस्लाम के नाम पर भारत के टुकड़े भी चुपचाप देखता रहा। यही नहीं आज भी इनका व्यवहार और नीतियां विभाजनकारी ही बनी हुई हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि देश बंटवारे के समय लाखों लोगों की जानें गईं और अनगिनत बेघर हुए। कश्मीर में हिन्दुओं के साथ क्या हुआ ? उनके पलायन के जिम्मेदार कौन लोग हैं ? क्यों जब आप सीएए और एनआरसी की बात करते हो तो कश्मीरी हिन्दुओं के विस्थापन की बात नहीं करते ? यह सवाल हर दम मुस्लिमों के एक तबके से पूछे जाते रहेंगे।

 पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान से लगती सीमा पर देश के कई जवान आतंकियों के हाथों अपनी जान गंवा चुके हैं। क्या मुसलमान यह नहीं मानते कि उनकी चुप्पी से कश्मीर में इस्लामिक आतंकियों को बल मिल रहा है ? जबकि होना तो यह चाहिए कि देश के मुसलमानों को हर उन मुददों पर मुखर होना चाहिए, जिससे देश और भाईचारा को नुक्सान पहुंचता हो। केवल आपके लिए भाईचारा दिखाया जाए, ऐसा नहीं चलेगा। पाकिस्तान के आतंकी हमारे देश के लिए नासूर हैं। इसलिए मुसलमानों का साफ संदेश होना चाहिए कि पड़ोसी मुल्क अपनी हरकतों से बाज आए।

 भारतीय मुसलमानों को वैचारिक तौर पर बदलना ही होगा। यह मान लेना कि भारतीय जनता पार्टी उनके लिए गलत और बाकी पार्टियां सही हैं, ठीक नहीं। ऐसा कर वे अप्रत्यक्ष रूप से सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। जो उनके और देश के हित में काम करे, उन्हें वोट देंगे। मुसलमानों की यह सोच होनी चाहिए। उन्हें आधुनिकता, विविधता और परिवर्तनशीलता स्वीकारनी होगी। देश में हर जगह, हर अवसर पर अपनी खास पहचान बनाए रखने की जिद छोड़नी होगी। क्या गैर इस्लामी देशों में वे अपने हिसाब से यह सब कर सकते हैं ? नहीं न ! इसलिए उन्हें भारत की परिस्थिति और समय की नजाकत को समझना होगा। आप अपने व्यवहार से ऐसा जाहिर नहीं करेंगे तो देश में इस्लामोफोबिया होने का ठिकरा मुसलमानों के सिर फूटता रहेगा। अगर वे चाहते हैं कि यह सब बदले तो उन्हें चाहिए कि जब भी मलेशिया और तुर्की जैसे देश भारत में मुसलमानों के परेशान होने और कश्मीर पर अनर्गल प्रलाप करें तो उनका विरोध करने वालों में वे सबसे आगे रहें। फिर देखिए कैसे माहौल बदलता नजर आता है। मुसलमान हिंदुओं को अपना दुश्मन मानना छोड़ें, क्योंकि उनकी बदौलत और सहनशक्ति के कारण ही आज वे भारत में निरंतर फल-फूल रहे हैं।