‘विश्वस्त मीडिया’ का चीन की शह पर भारत-द्वेष

    दिनांक 29-मई-2020
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‘आत्मनिर्भर भारत’ से चिढ़ा मीडिया झूठे तथ्यों और फर्जी खबरों  के  सहारे चीन की तरफदारी में जुटा
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नेपाल से कथित सीमा विवाद को भी भारतीय मीडिया के वामपंथियों ने तूल देने की पूरी कोशिश की। शायद इसलिए क्योंकि चीन ऐसा चाहता है। दूसरी तरफ मीडिया का वह अधकचरा वर्ग भी है जिसे नेपाल-भारत संबंधों का इतिहास और संवेदनशीलता की समझ नहीं है। एबीपी न्यूज ने तो मयार्दा की सारी हदें तोड़कर अभिनेत्री मनीषा कोइराला के लिए लिखा कि वह ‘खाती भारत का और गाती चीन का’ हैं। ऐसा वही कर सकता है जिसे कोइराला परिवार के भारत से रिश्तों का पता न हो। आज नेपाल की सरकार भले ही भारत विरोधी है लेकिन इससे दोनों देशों के सदियों पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ता। अच्छा होगा कि वह दो भातृवत राष्ट्रों के बीच दरार डालने से बाज आए।

वास्तव में ‘चाइनीज वायरस’ ने भारतीय मीडिया को जकड़ रखा है। जैसे ही प्रधानमंत्री ने स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने वाली ‘आत्मनिर्भर भारत' योजना का आरंभ किया, मीडिया के एक जाने-पहचाने वर्ग में खलबली मच गई। स्थानीय कंपनियों और उनके उत्पादों के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हो गया है। अमदाबाद की एक कंपनी ने देसी वेंटिलेटर बनाए। उनमें से एक मॉडल में कुछ कमियां सामने आईं। ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ और उसी समूह के अखबार ‘अहमदाबाद मिरर’ ने इसे तिल का ताड़ बना दिया। बताया जाने लगा कि जितने लोगों की जान गई है वे सभी ‘नकली वेंटिलेटर’ के कारण ही गई। अखबार की मंशा तब पता चली जब उसने इस बहाने ‘मेक इन गुजरात' और ‘गुजरात मॉडल’ की खिल्ली उड़ानी शुरू की। जबकि इस कंपनी ने सरकारी अस्पतालों को मुफ़्त वेंटिलेटर बनाकर दिए हैं। वेंटिलेटर को मरीजों की मौत के लिए दोषी ठहराना कहां तक उचित है, क्योंकि विदेशों से आए महंगे वेंटिलेटरों पर रखे गए रोगियों की मृत्यु दर भी लगभग इतनी ही है?

उधर एनडीटीवी में चीन समर्थक दुष्प्रचार जारी है। पिछले एक महीने से यह चैनल लोगों को यही समझाने में व्यस्त है कि ‘कोविड-19 विषाणु के फैलने में चीन की कोई गलती नहीं। यह तो उन देशों की सरकारों की गलती है जो इसे रोक नहीं पार्इं।’ इस तरह की विकृत पत्रकारिता करने वाले कुछ दूसरे मीडिया संस्थानों के लिए यह समय ‘मालिक-मजदूर संघष’ को बढ़ावा देने का है। एनडीटीवी का ही एक पत्रकार कुंभ की बसों को यूपी बॉर्डर पर खड़ी प्रियंका वाड्रा की बसें बताते रंगे हाथ पकड़ा गया। एक तरफ मीडिया मजदूरों की समस्या को वर्ग संघर्ष के अवसर के तौर पर देख रहा है, दूसरी तरफ इंडिया टुडे जैसे समूह हैं जो इस मानवीय त्रासदी से पैसे कमाने में जुटे हैं। पत्रिका इन मजदूरों की फोटो बेचकर मुनाफा कमा रही है। मानवीय संवेदना का पाखंड निश्चित रूप से अनैतिक है।

मीडिया का काम यह भी है कि वह किसी घटना को उसके संदर्भ में दिखाए। सभी गैर-भाजपा राज्य सरकारों ने एक सुर में मांग की थी कि लॉकडाउन हटाने का काम हमें खुद तय करने दीजिए। केंद्र ने बात मान ली। परंतु अब कांग्रेस के 'विश्वस्त पत्रकारों' ने गाना शुरू कर दिया है कि जब आपदा आ गई है तो केंद्र सरकार गायब हो गई है। ये वही लोग हैं जो डेढ़ महीने से चिल्ला रहे थे कि संघीय ढांचे का उल्लंघन हो रहा है। राज्यों को अपने हिसाब से काम नहीं करने दिया जा रहा है। आजतक और न्यूज18 ने समाचार दिया कि मस्जिदों में अजान पर रोक का गाजीपुर के जिÞलाधिकारी का आदेश निरस्त कर दिया गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अजान की अनुमति दे दी है। यह गलत समाचार है लेकिन ऐसा नहीं है कि गलती से चल गया। जिलाधिकारी ने लाउडस्पीकर से अजान पर रोक लगाई थी और उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में इस रोक को सही ठहराया। लेकिन इन दो चैनलों ने इसे बिल्कुल पलट दिया।

कुछ दिन पहले विवादित पत्रकार शेखर गुप्ता की वेबसाइट में एक लेख छपा था कि भाजपा की सरकारों को हराने के लिए विपक्ष को झूठी खबरों का सहारा लेना चाहिए। लेख की भावना यही थी, बस शब्दों के चयन में थोड़ी चतुराई बरती गई। यह मात्र संयोग नहीं कि कांग्रेस पार्टी ने तत्काल इस पर अमल करना शुरू कर दिया। पार्टी के नेता और प्रवक्ता तो पहले से झूठ बोलने में झिझकते नहीं थे, लेकिन अब लगभग हर दिन हो रहा है कि कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर रोहिंग्या और बांग्लादेश की फोटो भारत की बताकर डाली जाती है। कांग्रेस के दुष्प्रचार तंत्र की तरफ से झूठी खबरों की भी बाढ़ आई हुई है।