न्यायपालिका: व्यवस्था को चाहिए ‘न्याय’

    दिनांक 29-मई-2020   
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सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पद के लिए नामों के चयन, उनके तबादले और पदोन्नति की सिफारिश करने वाली ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था की कार्यशैली एक बार फिर चर्चा में

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हाल ही में सेवानिवृत्त हुए न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने कहा है, ‘‘कॉलेजियम एक क्लब की तरह काम करती है।’’ यह पहला मौका नहीं है जब ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था की कार्यशैली पर न्यायपालिका के भीतर से ही इस तरह की टिप्पणी की गई है। इनसे पहले 2018 में न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर, जो ‘कॉलेजियम’ के सदस्य थे, ने इससे भी कहीं ज्यादा सख्त टिप्पणी करते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र भी लिखे थे।

यही नहीं, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून और इससे संबंधित संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित करने वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति चेलामेश्वर ने तो अक्तूबर, 2015 में अपने अल्पमत के फैसले में इस कानून को सही ठहराने के साथ ही मौजूदा ‘कॉलेजियम’ प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए थे। इससे ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था के प्रति न्यायपालिका के भीतर पनप रहा असंतोष सार्वजिनक हुआ था। न्यायमूर्ति चेलामेश्वर की टिप्पणियों से साफ था कि ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था पूरी तरह दोष-रहित नहीं है और इसमें सुधार की काफी गुंजाइश है। न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने अवकाश ग्रहण करने के बाद कोच्चि में एक कार्यक्रम में स्वीकार किया कि उन्हें भी राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून के पक्ष में निर्णय सुनाना चाहिए था।

अब न्यायमूर्ति गुप्ता की उपरोक्त टिप्पणी स्पष्ट संकेत देती है कि ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं है। हालांकि, एक साक्षात्कार में न्यायमूर्ति गुप्ता यह स्वीकार करते हैं कि कभी-कभी ‘कॉलेजियम’ में शामिल न्यायाधीशों के बीच एक-दूसरे को उपकृत करने के आधार पर नियुक्तियां की जाती हैं। वे कहते हैं, ‘‘यह क्लब की तरह काम करता है। इसमें व्यक्ति, व्यक्ति में अंतर होता है।’’

न्यायमूर्ति गुप्ता इस सनसनीखेज खुलासे के बाद भी  न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर जोर देते हैं और कहते हैं कि अंतत: कोई भी व्यवस्था उतनी ही अच्छी होती है जितना उसका संचालन करने वाला व्यक्ति होता है।

‘कॉलेजियम’ की कार्यशैली पर बार-बार सवाल उठने के बावजूद इसमें किसी प्रकार के बदलाव का विरोध हो रहा है। सवाल यह है कि अगर इस प्रक्रिया में कुछ खामियां हैं तो उन्हें दूर करने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था में सुधार के बारे में अक्तूबर, 2015 के फैसले में दिए गए सुझावों को पूरी गंभीरता से आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा है?

मौजूदा ‘कॉलेजियम’ व्यवस्था को ‘अंकल जज सिन्ड्रोम’ तक का नाम दिया जाता रहा है। सवाल है कि उच्च न्यायालयों द्वारा न्यायाधीश पद के लिए उच्चतम न्यायालय की ‘कॉलेजियम’ को भेजे जाने वाले नामों को लेकर क्यों बार-बार ‘भाई-भतीजावाद’ और पारदर्शिता के अभाव जैसे आरोप लगते हैं? न्यायाधीशों की नियुक्तियां पहले कार्यपालिका ही करती थी लेकिन शीर्ष अदालत के 1982 और 1993 के दो फैसलों तथा बाद में इस सारे मामले में राष्ट्रपति को दी गई सलाह के साथ ही यह समूची प्रक्रिया न्यायपालिका ने अपने हाथ में ले ली। लेकिन इसके बावजूद न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव और इसमें भाई-भतीजावाद व्याप्त होने के आरोप लगना बंद नहीं हुए। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विधि आयोग ने नवंबर, 2008 में अपनी रिपोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव करने की सिफारिश की थी।

अंतत: मोदी सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में लगने वाले आरोपों से निजात पाने और इसमें ज्यादा पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून बनाया, जिसे उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से अक्तूबर, 2015 में असंवैधानिक घोषित कर दिया।

इसके साथ ही एक बार फिर स्थिति जस की तस हो गई। हां, इस दौरान एक बदलाव जरूर आया कि अब ‘कॉलेजियम’  के फैसलों को उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर ‘अपलोड’ किया जाने लगा, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है।

बेहतर होगा कि इस प्रक्रिया को लेकर होने वाले विवादों पर विराम लगाने के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों मिलकर अक्तूबर, 2015 के फैसले में दिए गए सुझावों और निर्देशों पर अमल करने की दिशा में कदम उठाएं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)