राह दिखाने वाला ही भटक गया

    दिनांक 29-मई-2020
Total Views |
डॉ. हिमांशु द्विवेदी

जल्दी खबरें परोसने का दबाव तथ्यों के प्रति उदासीनता ले आया है। जिस मीडिया पर समाज को राह दिखाने का दायित्व था, वह खुद भटक गया है। विश्वसनीय माने जाने वाले वेब मीडिया की खबरें बिना उनकी सत्यता जांचे प्रसारित होने की परंपरा शुरू हो गई

p_1  H x W: 0 x
वेबसाइड पर परोसी जाने वाली अधिकांश खबरें सच के करीब नहीं होतीं

यह दौर रफ्तार का है। जीवन के हर हिस्से में तेजी है। सब दौड़ रहे हैं। सुकून से बैठकर चिंतन-मनन की परंपरा अब जिंदगी में नहीं दिखती। अब साध्य महत्वपूर्ण हो गया है, साधन की पवित्रता का कोई अर्थ नहीं दिखता। इससे मीडिया भी अछूता नहीं रह सका है।

खबरों में रफ्तार के प्रति दबाव ने तथ्यों के प्रति उदासीनता ला दी है। दुर्भाग्य से सत्य के प्रति उदासीनता पहले ही पत्रकारिता में आ चुकी थी। तथ्यों के प्रति उदासीनता ने नीम पर करेला की कहावत को चरितार्थ कर दिया है। सत्य और तथ्य की आत्मा खबरों से निकल गई है। समाज को राह दिखाने का दायित्व लिए खबरों का संसार अब खुद भटकने लगा है। ऐसा हम सब सतत देख रहे हैं और महसूस कर रहे हैं। दरअसल, तकनीक ने यह हालात पैदा किए हैं।

खबरों के स्रोत अनंत हैं। उनका सत्य और तथ्य के प्रति विश्लेषण लगभग असंभव है। कुछेक सौ रुपये खर्च कर न्यूज पोर्टल प्रारंभ हो जा रहे हैं। खुद को मीडियाकर्मी बताने वाले असंख्य लोग हाल में पैदा हुए हैं। उनके स्रोत क्या हैं? संपादन की क्या व्यवस्था है और पत्रकारिता की पवित्रता के प्रति उनका दायित्व क्या है? इनके जवाब फिलहाल अनुत्तरित हैं।  हो यह रहा है कि तकनीकी तौर पर हिट पाने के लिए और पाठकों-दर्शकों को खुद तक खींच लाने की लालसा में ऐसी खबरें भी परोसी जा रही हैं जो सत्य के करीब भी नहीं हैं।

बिना संपादन के खबरों को प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। एक ही खबर, अलग-अलग विचारों की मिलावट के साथ लोगों तक पहुंच रही है। यह समझ पाना कठिन हो गया है कि सच क्या है और झूठ क्या है। यही इस वक्त का सबसे बड़ा संकट है। इसकी बड़ी वजह है संपादन नाम की संस्था का समाप्त हो जाना।

आज छोटे-छोटे समूह जिस तरह से मीडिया में दखल बढ़ा रहे हैं, उसने चिंता और बढ़ाई है। उनके आर्थिक स्रोत कम हैं और समाज और पत्रकारिता की शुचिता के प्रति जिम्मेदारी भी कम हैं।  दुर्भाग्य से इस अंधी दौड़ में बड़े समूह भी शामिल हो गए हैं। वेब मीडिया जो सबसे अविश्वसनीय है, उसकी खबरें बिना उनकी सत्यता जांचे प्रसारित होने की परंपरा शुरू गई है। यह सब एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ की वजह से है। हमें समझना होगा कि एक अंधी दौड़ है, इसकी हार-जीत कोई मायने नहीं रखती। यह अल्पकालिक जीत हमेशा के लिए भरोसे का संकट पैदा करती है।

संस्थान प्रमुख की जिम्मेदारी है कि वे समझें कि पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं है। यह समाज के प्रति दायित्व का पुनीत कार्य भी है। भरोसा इसकी आत्मा है। खबरों की रफ्तार भले धीमी हो पर सत्य और तथ्य उसकी आत्मा बनें और भरोसा उसके आधार हों। एक यही तरीका भविष्य में फेक न्यूज की चुनौतियों से सामाना करा सकेगा और पत्रकारिता की सत्य और तथ्य के प्रति निष्ठा को फिर से स्थापित कर सकेगा।
(लेखक हरिभूमि-आईएनएच के प्रधान संपादक हैं)