गुरु अर्जुन देव : जिन्होंने धर्महित किया अपने जीवन का उत्सर्ग

    दिनांक 30-मई-2020   
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(30 मई, बलिदान दिवस पर विशेष)
गुरु अर्जुन देव ने सिख संगत को संबोधित करते हुए कहा था, - “संतों! आज के बाद तुम्हें दो नियम बदल देने हैं। पगड़ी बांधों और कमर में हर समय तलवार लटकाओ। गुरु गद्दी के स्थान पर अकाल तख्त की रचना करो

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श्री गुरु अर्जुन देव जी सिख धर्म के पंचम गुरु थे तथा धर्म की रक्षा के खातिर अपना बलिदान दिया। सिख पंथ को महान धर्म का रूप देने में उनका बड़ा योगदान था। महान संतों के अमृत वचनों को संकलित कर उसे “आदि ग्रंथ” का रूप देकर उन्होंने सिखों के साथ ही सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। उनके इस महान योगदान के लिए गुरु अर्जुन देव का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है।
श्री गुरु अर्जुन देव सिखों के चतुर्थ गुरु श्री गुरु रामदास के सबसे छोटे पुत्र थे। उनका जन्म 15 अप्रैल, 1563 को हुआ। गुरु अर्जुन देव महान तत्ववेत्ता, दार्शनिक एवं साहित्यकार होने के साथ-साथ साहसी व्यक्तित्व के धनी थे तथा सिख इतिहास में उनका अपना एक अलग ही स्थान है। गुरु रामदास ने ‘अमृतसर’ नामक सरोवर के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया। अमृतसर अर्थात अमृत का सरोवर। इस सरोवर के निर्माण में गुरु अर्जुन देव ने सक्रिय रूप से कार्य किया अतः इस कार्य को पूर्ण करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। भक्तिभाव में सराबोर रहने वाले गुरु अर्जुन देव ने लिखा है- "राज न चाहों, मुकति न चाहों, मन प्रीत चरन कमलारे"।
1 सितम्बर, 1581 को श्री गुरु रामदासजी ने अपने इस तृतीय पुत्र अर्जुन देव को सारी संगत के सम्मुख गुरु गद्दी सौंप दी। गुरु गद्दी पर आसीन होने के पश्चात गुरु अर्जुन देवजी ने सरोवर के बीचों बीच हरिमंदिर बनवाया। हरिमंदिर बनाते समय गुरुजी के अनुयायियों ने उन्हें सलाह दी कि हरमंदिर बहुत ऊंचा और विशाल होना चाहिए, क्योंकि हरमंदिर जितना ऊंचा होगा उसका मान उतना ही अधिक होगा; किन्तु गुरु अर्जुन देवजी इस बात से सहमत नहीं हुए। उन्होंने कहा कि वृक्ष जितना अधिक फलों से लदा होता है, उसकी डालियां उतनी ही झुकी होती हैं। अतः हरिमंदिर इस क्षेत्र की सबसे नीची इमारत होगी। गुरु अर्जुन देव ने स्वयं मंदिर का नक्शा बनाया। उनके अनुसार हरिमंदिर में प्रवेश करने के लिए सबको विनम्र बनकर कुछ सीढ़ियां नीचे उतरनी पड़ेंगी तथा इसका मुख्य द्वारा चारों दिशाओं में खुलेगी जो सबके लिए हर समय खुला रहेगा।
गुरु अर्जुन देव दूरदर्शी थे। उनके महान प्रयत्नों से “श्री गुरुग्रंथ साहिब” जैसा महान धार्मिक ग्रंथ अस्तित्व में आया। रामायण और भगवद्गीता की भांति इस महान ग्रंथ का आविर्भाव अपने समय की ऐतिहासिक घटना घटना थी। इसके लिए गुरु अर्जुन देव को सदैव स्मरण किया जाएगा। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सिख धर्म के महान गुरुओं की वाणियों को संग्रहित किया। गुरु अर्जुन देव के बाद जिस क्रम से गुरु गद्दी परम्परा के वंशज आगे आते गए, उसी क्रम में उनकी वाणियों और शब्दों को इस महान ग्रंथ में स्थान प्राप्त होता रहा। गुरु अर्जुन देव ने सर्वप्रथम जिस पुस्तक का प्रकाशन कराया था, उस समय उसका नाम “गुरु ग्रंथ साहिब” नहीं था, उस समय उसे “पोथी साहिब या आदि ग्रंथ” के नाम से पुकारा जाता था। तब इस ग्रंथ के लिए कहा गया था- “पोथी परमेश्वर की थान।” इसका सर्वप्रथम प्रकाशन सन 1604 में किया गया। इस ग्रंथ में गुरुनानक देव तथा उनके पूर्ववर्ती और उस समय के प्रमुख सन्त जैसे संत नामदेव, संत कबीर, संत रामानन्द, संत रविदास, संत सूरदास, संत मीराबाई आदि संतों की वाणी व पदों को गुरुग्रंथ साहिब में संग्रहित करके उसका सम्पादन किया गया। इस ग्रंथ को सर्वप्रथम “श्री हरिमंदिर साहिब” में दर्शनार्थ रखा गया था। उस समय “पोथी साहिब” का पहला ग्रंथी बाबा बुड्ढाजी को बनाया गया।

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उल्लेखनीय है कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब बहुआयामी ज्ञान व शिक्षा का स्रोत है इसलिए इस ग्रंथ की अपनेआप में बहुत महत्ता है। सिखों के लिए तो यह ग्रंथ अत्यधिक श्रद्धा का केन्द्र है ही साथ ही अन्य मतावलम्बियों के लिए भी यह अनुकरणीय है। सिख परिवारों में जन्म, विवाह, मृत्यु तथा अमृत के संस्कार गुरु ग्रंथ साहिब को साक्षात् परमात्मा मानकर विधिवत किए जाते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब की मूल प्रति अभी भी करतारपुर में रखी हुई है। इसमें प्रथम पांच गुरुओं तथा नौवें गुरु तेग बहादुर जी की वाणियों का संग्रह है। बाद में गुरु गोविन्द सिंह ने इसमें गुरु तेग बहादुर के वचनों तथा गीतों का योग भी किया। तब से गुरुग्रंथ साहिब का रूप इसी प्रकार का रहा और इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। ग्रंथ साहिब के अन्त में गुरु अर्जुन देव जी का एक सम्पादकीय वचन है जिसके अनुसार इस थाल में चार पदार्थ हैं- सत्य, सन्तोष, विचार तथा नाम। इस प्रकार गुरु अर्जुन देव जी ने इस ग्रंथ में साधना के उच्च अनुभवों की चिरन्तनता और जीवन को सार्थकता प्रदान करने की कालजयी शिक्षाओं को संग्रहित किया है।
गुरु अर्जुन देव मूलत: आध्यात्मिक महापुरुष थे। उनके नेतृत्व के चलते उस समय धार्मिक आन्दोलन राजनीतिक रूप में भी परिवर्तित हो गया। गुरु अर्जुन देवजी के कार्यों से मुस्लिम शासन को आपत्ति होने लगी। दिल्ली की गद्दी पर उन दिनों जहांगीर पदासीन था। कुरान शरीफ के मुकाबले में सिख गुरु ने एक पुस्तक की रचना की है, ऐसी खबर सुनकर बादशाह का कुपित हो जाना स्वाभाविक था। यही नहीं बादशाह तक यह शिकायत पहुंचाई गई कि गुरु अर्जुन देव ने धन एकत्रित करने के लिए मसनद नियत किए हैं तथा बादशाह स्वयं अर्जुन देव से मिलने आया और कहा कि आपने इस्लाम के विरुद्ध इस पुस्तक की रचना क्यों की है?
गुरुजी ने कहा कि उन्होंने तो गुरुओं की वाणी और भक्तों के भजनों का संग्रह करके बीड़ बांधी है। बादशाह चाहे तो स्वयं देख ले... ज्यों ही एक पृष्ठ निकाला गया तो उसमें ईश्वर-भक्ति का विषय निकला। बादशाह ने कहा कि इसमें इस्लाम के पैगम्बर की प्रशंसा में भी कुछ गीत शामिल करें। किन्तु अर्जुन देव जानते थे कि इस समय अपनी स्वतंत्रता खो देने का अर्थ बहुत विनाशकारी होगा अत: उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस ग्रंथ में जो कुछ भी लिखा गया है वह आदि गुरु की प्रेरणा से लिखा गया है, मैं किसी और को प्रसन्न करने के लिए अपनी ओर से इसमें कुछ नहीं बढ़ा सकता। गुरु अर्जुन देव के इस निर्भीक उत्तर से बादशाह को बहुत गुस्सा आया। जहांगीर ने किसी भी तरह से गुरु अर्जुन देव को सजा देने अथवा उन्हें मुसलमान बनाने का निश्चय कर लिया। आदि ग्रंथ में से कुछ भाग हटा देने और 2 लाख रुपये देने का दण्ड मुस्लिम शासक द्वारा दिया गया। श्री गुरु अर्जुन देव ने यह दंड की रकम देने से मना कर दिया। गुरु अर्जुन देव की सारी सम्पत्ति जब्त करके भी दंड की रकम पूरी न हो सकी। दंड दो या इस्लाम स्वीकार कर लो। ये दो ही पर्याय उनके सामने रखे गए। ये दोनों भी पर्याय गुरु अर्जुन देव ने अस्वीकार कर दिए।
20 मई, 1606 को श्री गुरु अर्जुन देव को जघन्य यंत्रणाएं देकर मारने की योजना बनाई गई, लाहौर के मई माह की भयंकर धूप की गरम रेत में उन्हें खड़ा किया गया। गरम कड़ाह में खड़ा करके उनपर खौलता हुआ गरम पानी डाला गया। इस तरह की भयंकर यातनाओं को सहन करते हुए भी ईश्वर स्मरण करते रहे। उनकी ईशवर भक्ति और श्रद्धा अंशमात्र भी कम नहीं हुई। गुरु अर्जुन देव के मुख से “तेरा किया मीठा लागे नाम पदारथ नानक मांगे” ये शब्द बाहर निकले। बादशाह का अन्तिम आदेश हुआ कि उन्हें गाय की खाल पहनाई जाए...। ज्येष्ठ की शुक्ल चतुर्थी को उन्हें कड़े बंदोबस्त के साथ सैनिकों ने रावी नदी में में स्नान के लिए लाया। वे नदी में स्नान करने के लिए उतरे और फिर वे कभी बाहर नहीं निकले। इस तरह 30 मई, 1606 को श्री गुरु अर्जुन देवजी का स्वर्गवास हो गया।
गुरु अर्जुन देव ने सिख संगत को संबोधित करते हुए कहा था, - “संतों! आज के बाद तुम्हें दो नियम बदल देने हैं। पगड़ी बांधों और कमर में हर समय तलवार लटकाओ। गुरु गद्दी के स्थान पर अकाल तख्त की रचना करो। यदि अपने धर्म को बचाना चाहते हो तो तुम्हें जालिम शत्रुओं से युद्ध करने के लिए अपनेआप को संगठित करके तैयार रहना होगा। शान्ति और सब्र से कोई भी धर्म या कौम अब अपनेआप को सुरक्षित नहीं रख सकती। उसके लिए शक्ति जरूरी है।“ इस प्रकार श्री गुरु अर्जुन देव ने सिख धर्म को एक नई दिशा दी। आगे के गुरुओं ने इस धर्म में समय के साथ-साथ और भी कई परिवर्तन किए।
श्री गुरु अर्जुन देव जी को शत-शत नमन...