पीयूष मिश्रा करना चाहते हैं विपश्यना, जानिए क्यों ?

    दिनांक 31-मई-2020   
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''इक बगल में चांद होगा, इक बगल में रोटियां, इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियां, हम चांद पे रोटी की चादर डाल कर सो जाएंगे और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएंगे

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लॉकडाउन में बार—बार सोशल मीडिया पर यह गीत—गीत लौट—लौटकर सामने आता है। उन थके हारे कदमों के साथ जो अपनी मंजिल की तरफ बढ़े जा रहे हैं। इस गीत को पढ़ते हुए, सुनते हुए या गुगगुनाते हुए एक चिर—परीचित सा चेहरा आपके अवचेतन से निकल कर जो सामने खिलाखिला उठता है, वह पीयूष मिश्रा का चेहरा है।
पीयूष 'शब्द उत्सव' के फेसबुक पेज पर लाइव थे। बात होनी थी, दिल, दुनिया और आने वाले दौर की। शब्द उत्सव की तरफ से जारी पोस्टर से ऐसा ही लगा था कि यह पूरी बातचीत एक औपचारिक बातचीत बनकर रह जाएगी लेकिन अनुराग पुनेठा के संचालन और पीयूष के सीधे—सादे व्यवहार ने इस पूरी बातचीत को अनौपचारिक बना दिया। इस संवाद में शामिल सभी लोगों को अपनी बात कहने और सुनने का पूरा अवसर मिला। इसका श्रेय पीयूष मिश्रा को ही जाता है। उन्होंने पहले तय समय की सीमा को खत्म करके संवाद को सबके लिए सहज बना दिया। इसका परिणाम था कि पूरी बातचीत दो घंटे से अधिक समय तक चली।
विचाराधारा से परे भी एक डायमेंशन होता है
विचारधारा को लेकर पीयूष ने कहा कि मुझ पर बहुत आरोप लगते हैं कि मैं यहां से वहां हो गया। वहां से यहां हो गया। यह कैसी बात है? विचारधारा को लेकर कोई वामपंथी है या फिर नहीं है। और यदि वह वामपंथी नहीं है तो वह आरएसएस का पक्का होगा? अरे बाबा कोई तीसरा डायमेंशन नहीं हो सकता क्या? क्या एक अध्यात्म नाम का डायमेंशन नहीं हो सकता? क्या मुझे अपनी मानसिकता के साथ जीने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
भगत सिंह को लेकर अपनी बात रखते हुए पीयूष ने कहा— जिन्होंने भी देश की आजादी के लिए काम किया, उन्हें बिना यह देखे कि वे किस धरे से ताल्लुक रखते थे, वे आरएसएस थे या वामपंथी थे, बिना किसी बंटवारे के जिन लोगों ने अपना खून—पसीना आजादी की लड़ाई में बहाया है, उनको शामिल करना चाहिए। इतना ही नहीं, जो लड़े और जिनका नाम भी नहीं आया कहीं, ये हक बनता है कि आजादी की लड़ाई में उनका भी नाम शामिल किया जाए। हमने तो प्लेट में रखी हुई आजादी पाई है। भगत सिंह जैसे क्रातिकारियों ने काम किया और इनके काम किए जाने के बाद हमने इन्हें धरों में बांट दिया। ये आरएसएस थे, ये वामपंथी थे, ये सोशलिस्ट थे, ये कांग्रेसी थे, ये हिन्दू महासभा के थे। अरे बाबा ये सब इंसान थे। देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे। अब खत्म करते हैं इस बात को। यह बेतुका सवाल हुआ। हम कुछ ना कुछ करने ही तो आए हैं।
पंडित का फिल्म में कोई कैरेक्टर होगा तो वह व्याभिचारी ही होगा, खान चाचा का कोई कैरेक्टर होगा तो वह मजहब का पक्का और पांच वक्त का नमाजी होगा, पादरी का कोइ कैरेक्टर होगा तो वह सबकी मदद करने वाला होगा। ऐसा पहले लगता था कि संयोगवश होता है लेकिन ये तो सिलसिला ही बन गया। प्रश्नकर्ता ने फिर वेब सीरिज पाताललोक का जिक्र किया। जिसमें प्रश्नकर्ता के अनुसार अति ही हो गई? ये सब कब तक चलेगा? इस प्रश्न का जवाब बातचीत में पीयूष मिश्रा ने यह कर टाल दिया कि मैं कुछ भी कहता हूं तो विवाद हो जाता है। मैं विवाद में पड़ना नहीं चाहता। इस तरह उन्होंने इस सवाल को मान्यता प्रदान की। जिसे हम सब आज तक मानते आए थे कि यह महज संयोग है। पीयूष के जवाब से ऐसा ही लगा कि फिल्मों में यह सब दिखाया जाना महज संयोग नहीं है।
पीयूष और इरफान खान दोनों ने एनएसडी से अभिनय की शिक्षा ली। पीयूष 1986 में पास आउट हुए और एक साल बाद 87 में इरफान पास आउट हुए। 88 में कोई बैच ना होने की वजह से दोनों बैच काफी करीब आए। इरफान को याद करते हुए पीयूष कहते हैं — मकबूल में हम दोनों को विशाल भारद्वाज ने मौका दिया। हमने एनएसडी में जो सीखा था, वहां आजमाने और दिखाने का हमें संयोग से मौका मिला। इरफान से मैं उतना घनिष्ठ नहीं था जितना तिग्मांशु धूलिया है और विशाल भारद्वाज से था। फिर इरफान के लिए मुझे मदारी लिखने का मौका मिला। जिसे पहले मैं लिख रहा था और बाद में छोड़ दी।
इरफान एक चार्मिंग बंदा था, जिसे मैं कह सकता हूं कि हममें से वह किसी में नहीं था। मैं तो कहता हूं कि 53 साल की उम्र कोई जाने की नहीं होती। उसे नहीं जाना चाहिए था। उसने गलती की। उसे थोड़ा और रहना चाहिए था। उसका करियर भी उफान पर था। न जाने वह कितना गुल खिलाता अभी अगर वह होता तो।
लॉकडाउन के दौरान अवसाद में जा रहे लोगों को लेकर जब एक प्रश्न आया तो पीयूष ने कहा कि यदि लोग मुझे सुनना चाहते हैं तो मेरा हक नहीं बनता कि मैं डिप्रेशन में चला जाऊं। हालांकि डिप्रेशन होता है। रात को सोते हुए लगता है कि पीयूष मिश्रा कहां जा रहे हो? कब खत्म होगा यह सब। फिर सुबह लगता है कि चाहे कभी खत्म ना हो। अगर यह खत्म नहीं होगा तो हम खत्म हो जाएं क्या? हमें खत्म होने का हक नहीं है। हमें लॉक डाउन के साथ जीना पड़ेगा। फिलहाल की स्थिति यह है कि हमें इसके साथ जीना सीखना होगा।
इतना कुछ करने के बाद और क्या इच्छाएं हैं? इस पर पीयूष ने कहा कि सही बताऊं तो विपश्यना करने की इच्छा। अभिनेताओं को विपश्यना करनी चाहिए क्योंकि वहां एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है। फिर यह मुर्धन्य सवाल है कि आप कहां से आ रहे हैं और कहां को जा रहे हैं? यदि आप कहीं से नहीं आ रहे और कहीं को नहीं जा रहे तो इसका मतलब है कि आप अंधकार से आए हैं और अंधकार में चले जाएंगे।
हुस्ना पर पीयूष से सवाल न हो तो मानो उनसे किया कोई संवाद पूरा नहीं होता। हुस्ना पर किए गए एक प्रश्न पर हुस्ना का परिचय पीयूष ने कराया— वास्तव में यह मेरा एक प्ले था। 30 जनवरी 1995 को यह प्ले हुआ था, लेडी श्रीराम कॉलेज में। इसके निर्देशक थे एनके शर्मा, इसकी स्क्रिप्ट, लिरिक्स और म्यूजिक मैंने की थी। इसकी स्क्रिप्ट पाकिस्तानी राइटर हैं ए हमीद उनकी एक कहानी है, उस पर मैने यह प्ले डेवलप किया था। उसका यह गाना था। करते-करते मैं लाहौर चला गया। वहां घुमा और करते-करते हुस्ना से मिल लिया। यह सारी चीजें इसलिए सशक्त हुई क्योंकि मैंने इसके पात्रों को देखा है। मैं हर किसी से कहना चाहता हूं कि आप किसी का परिचय पाना चाहते हैं तो पहले उसे पढ़िए और पढ़ने के बाद उसे देखिए। देखने के बाद उसकी फिल्म बनने लगेगी, धीरे-धीरे और आप उसके नजदीक जाने लगेंगे। ऐसे परिचय होता है अपने पात्रों से। जैसे मैं एक्टिंग करता हूं। अपने पात्रों से परिचय करता हूं। जब तक मैं उनके नजदीक नहीं चला जाता, तब तक मैं परफॉर्म नहीं कर पाता। इसलिए मैं कम से कम डेढ़ महीने पहले स्क्रीप्ट मंगाता हूं। जिससे मुझे उन्हें आत्मसात करने का, उनसे साक्षात्कार करने का मौका मिले।
यदि हुस्ना को कभी सिनेमा के पर्दे पर उतारना हुआ तो मुझे आलिया भट्ट बहुत अच्छी लगती है। हुस्ना के तौर पर मैं उसको विजुअलाइज करता हूं।
पीयूष मिश्रा के साथ बातचीत के लिए होमवर्क की जरूरत होती है। जैसे एक प्रश्न में उनके नाटक को उपन्यास बता दिया गया। इसी तरह एक सवाल आया कि आप हुस्ना के तौर पर तो आलिया भट्ट को देखते हैं लेकिन हुस्ना के सामने जो पीयूष मिश्रा हैं, उस किरदार के लिए कौन सा अभिनेता आपको सही लगता है?
पीयूष के नाटक में हुस्ना के सामने जो किरदार है, जिसके आस-पास पूरी कहानी बुनी गई है। वह पीयूष नहीं है, उस किरदार का नाम जावेद हैं। पीयूष इसलिए सवाल सुनकर चौंक जाते हैं। जो स्वाभाविक था। जावेद हुस्ना को चिट्ठी लिखता है। जावेद वही प्रेमी है जिससे हुस्ना का निकाह होने वाला था और बंटवारे की वजह से जो हो नहीं पाया। जावेद हुस्ना को बंटवारे के लगभग 15 सालों के बाद चिट्ठी लिखता है कि उस देश का हाल अब कैसा है, जिसे पाकिस्तान नाम दे दिया गया है।
वैसे जब पीयूष हुस्ना सुनाते हैं और जो हुस्ना की पृष्ठभूमि नहीं जानते, वे सोच सकते हैं कि यह पीयूष की ही कोई अधूरी प्रेम कहानी है। यह संभव भी है कि यह कोई अधूरी प्रेम कहानी हो, जिसे उन्होंने हुस्ना में पीरो कर खुद भी भीगे और सुनने-देखने वालों को भी बार-बार सराबोर किया।
हुस्ना की शुरूआती पंक्तियों में हुस्ना का पता मिलता है—
''लाहौर के उस
पहले जिले के
दो परगना में पहुंचे
रेशम गली के
दूजे कूचे के
चौथे मकां में पहुंचे
और कहते हैं जिसको
दूजा मुल्क उस
पाकिस्तां में पहुंचे।''
जावेद इस गीत में हुस्ना से पूछता है—
''ओ हुसना मेरी
ये तो बता दो
लोहड़ी का धुंआ क्या
अब भी निकलता है
जैसा निकलता था
उस दौर में हां वहां
ओ हुसना
ये हीरों के रांझों के नगमे
क्या अब भी, सुने जाते है हाँ वहाँ
ओ हुसना
और रोता है रातों में
पाकिस्तां क्या वैसे ही
जैसे हिन्दोस्तां
ओ हुसना।''
संवाद धीरे—धीरे अंतिम पड़ाव की तरफ बढ़ रहा था। इसी बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न आया। भारतीय महापुरुषों को लेकर। वे फिल्मी पर्दे पर नजर नहीं आते। उन पर ना के बराबर फिल्में बनी है। अभी भी केशव बलिराम हेडगेवार, विनायक दामोदर सावरकर, महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे चरीत्र हमारे बीच हैं, जिन पर एक अच्छी फिल्म की प्रतीक्षा भारतीय दर्शक कर रहे हैं।
पीयूष ने इस प्रश्न के जवाब में कहा कि हमारे यहां बेहद साधु-संत किस्म के लोग हैं। 1986 में अलग—अलग स्वतंत्रता सेनानियों की जिन्दगी पर आधारित एक सीरीज बन रही थी। मैं उसमें सुखदेव कर रहा था। उसकी निर्देशक अमाल अल्लाना थीं जो अब्राहिम अल्काजी की बेटी हैं । अल्काजी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पहले निदेशक हुए।
मेरा एपिसोड तो आ ही नहीं पाया। उससे पहले एक एपिसोड सुभाष चन्द्र बोस पर बन चुका था। उस एक एपिसोड की वजह से पूरी सीरीज बैन हो गई। उस एक एपिसोड में सुभाष चन्द्र बोसजी को एक पीले रंग का पेय पदार्थ पीते हुए दिखा दिया गया था। जिसके बाद उस एपिसोड पर यह आरोप लगा कि उन्हें शराब पीते हुए दिखाया गया है।
वे आदमी हैं, वे शराब भी पीएंगे। उसमें क्या बुरी बात है? यहां बहुत मीन-मेख निकाला जाता है। बहुत प्यारा—निर्दोष कैरेक्टर लिखा जाए। इसका दबाव बहुत होता है। इसके चक्कर में लेखक इसे लिखना ही नहीं चाहते। फिक्शन कैरेक्टर पर इसीलिए कोई लिखना चाहता है क्योंकि वहां ढंग से एक्सप्लोर करने का अवसर मिलता है। यह एक वजह हो सकता है। वर्ना शिवाजी पर, महाराणा प्रताप पर तो पहले बननी चाहिए फिल्म।
आखिर बातचीत के अंतिम पड़ाव में पीयूष मिश्रा के लिखे नाटक 'गगन दमामा बाज्यो' का जिक्र आ ही गया। जब जिक्र आ गया तो भगत सिंह की मोहब्बत में इस नाटक को लिखा गया या फिर इसे लिखते हुए पीयूष को भगत सिंह से प्रेम हुआ। यह एक प्रश्न था, जिसे उनसे पूछा जाना चाहिए था।
‘गगन दमामा बाज्यो’ की सूक्ति गुरु ग्रन्थ साहिब से ली गई है, जो व्यक्ति को लड़ने की और ना हारने की प्रेरणा देता है। इस नाटक में पीयूष ने भगत सिंह की उस प्रेमिका का वर्णन किया है, जिसका जिक्र इतिहासकार नहीं करते लेकिन पीयूष के अनुसार— लोक के गीत में, किस्सो और कहानियों में वो आज भी जीती है। उसने भगत के जाने के बाद विवाह नहीं किया। उसकी उम्र थी। वह चाहती तो दूसरी शादी कर सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
पीयूष ने बताया कि नाटक का पूरा विचार कॉमरेड एनके शर्मा का था। उसने कहा कि भगत सिंह पर प्ले करते हैं। उस पर लिखा नहीं गया। कुछ किया नहीं गया। आपने क्लास में सिर्फ एक चैप्टर पढ़ा है कि भगत सिंह एक क्रांतिकारी थे। उन्होंने बम फेंका था। लेकिन यह नहीं बतलाया कि बम कहां फेंका था? जहां बम फेंका था, वहां कोई नहीं था। सैंडर्स को मारा फिर इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि हमें नहीं मारना चाहिए था। एक व्यक्ति के मारे जाने से क्रांति नहीं आती। उस वक्त तक मैंने कुछ लिखा नहीं था। फिर तय हुआ कि लिखा जाए। मैंने बहुत पढ़ा। पढ़ते हुए जब मिला कि वे उस समय साढे तेईस साल के थे तो मैंने कई दफा इस बात को कन्फर्म किया कि क्या वे साढ़े तेईस साल के ही थे। मैने उसके बाद इतिहास को किनारे रखा। मुझे पता चला कि वह पांच फुट दस इंच का बंदा, रंग गोरा, जन्म से ही नायक था। जिसके लिए राजगुरु का ऐतिहासिक बयान है कि ‘’इसको लड़कियों से बचाते-बचाते दम निकल जाती है।‘’ 1924 तक उसकी अंग्रेजी बहुत खराब थी। उसने 1928 तक अपनी अंग्रेजी शानदार कर ली। इतना सबकुछ इतनी कम उम्र में योजना के साथ किया। उसने अपनी मृत्यु की भी योजना बनाई। ऐसे ही नहीं मरना है। क्रांति की ज्वाला भड़का के जानी है। जेल में 114 दिनों की भूख हड़ताल कर दी। यह यकीन नहीं होता कि ऐसा बंदा हुआ होगा। फिर मैंने नाटक लिखा और लिखते समय इस बात का ध्यान रखा कि इसे मैं युवाओं के लिए लिख रहा हूं। लोगों ने ‘गगन दमामा बाज्यो' को पसंद किया।
यह पीयूष मिश्रा का जादू था कि संवाद में शामिल कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता था कि यह खत्म हो। पीयूष भी सहज थे। एक—एक सवाल का जवाब देते हुए। फिर भी पूरे संवाद को मॉडरेट कर रहे अनुराग पुनेठा को इसे एक खुबसूरत मोड़ पर लाकर खत्म करना ही था और इस भरोसे के साथ कि अगली बार पीयूष मिश्रा से सभी की आमने—सामने शब्द उत्सव के मंच पर मुलाकात होगी। इस पूरे संवाद का समापन हुआ।