जयंती विशेष: अहिल्याबाई होलकर-एक धर्मपरायण शासिका

    दिनांक 31-मई-2020
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आशीष त्रिपाठी
भारत प्रतिभा की धरती है, संपूर्ण भारत के प्रत्येक कोने में अनेक प्रतिभा संपन्न पुरुषों और महिलाओं ने जन्म लिया है और देश को एक नई दिशा प्रदान की है। 18वीं शताब्दी की ऐसी ही एक अद्भुत प्रतिभा संपन्न महिला थी देवी अहिल्याबाई होल्कर 

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उनका जन्म 31 मई 1725 ई को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक सामान्य सिंधिया परिवार में हुआ था ।
1733 ई में मात्र 8 वर्ष के अवस्था में मालवा प्रांत के राजा मल्हार राव होलकर के पुत्र खंडेराव होलकर से विवाह के उपरांत इंदौर आ गईं ।
बाल्यकाल से ही भगवान शिव की आराधना के कारण उनका अधिकतम समय भक्ति में ही बीतता था, लेकिन 1754 ई में उनके ऊपर एक भीषण संकट आ गया, मालवा और भरतपुर प्रांतों में चौथ वसूली को लेकर एक भीषण युद्ध हुआ जिसे कुम्भेर की लड़ाई कहा गया ,इस युद्ध में उनके पति को वीरगति प्राप्त हुई । पति की मृत्यु के बाद उस समय की सामाजिक परंपरा के अनुसार अहिल्याबाई ने सती होने का प्रयास किया लेकिन अपने ससुर मल्हार राव होलकर के समझाने पर इस निर्णय को बदल दिया। इस घटना के बाद से अहिल्याबाई और अधिक शिव भक्ति में रत हो गई । 1766 ई में पुनः मालवा और अहिल्याबाई पर संकट आया जिसमें मल्हार राव होलकर की अकस्मात मृत्यु हो गई । राज्य के प्रधान की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई ने अपने पुत्र और होलकर साम्राज्य के दीपक माले राव होलकर को उत्तराधिकारी बनाया । लेकिन विधाता को कुछ और ही स्वीकार था इसलिए 1 वर्ष में ही अहिल्याबाई के 16 वर्षीय पुत्र और होलकरों के उत्तराधिकारी माले राव की भी मृत्यु हो गई ।
यही समय था जब 1767 ई में जनता और सेना के विशेष आग्रह पर पेशवाओं की सहमति के बाद अहिल्याबाई ने राज्य की कमान संभाली ।
वैसे तो भारत में प्राचीन काल से नारी शक्ति का शासन और प्रशासन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बहुत योगदान रहा है। कभी राजा की पुत्री, राजा की पत्नी या राजा की मां के रूप में राजनैतिक-सामाजिक कार्यों में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है।
आधुनिक भारत में अहिल्याबाई होल्कर की भूमिका भी बहुत अभूतपूर्व और असाधारण रही है । इनके इसी असाधारण क्षमता और कार्यशैली के कारण जनता ने इन्हे देवी, पुण्यश्लोक, अवतरित महिला और राजमाता जैसी उपाधियों से अलंकृत किया था ।
अहिल्याबाई स्वयं युद्धों में नेतृत्व करने वाली एक कुशल योद्धा और एक अत्यंत न्यायप्रिय शासिका तो थी हीं, लेकिन इन सबसे बढ़कर जो उनके जीवन चरित्र की दो मूल और मौलिक बातें थी वह सामाजिक सरोकार और धर्मपरायणता थी ।
अहिल्याबाई ने धर्म आधारित राजनीति को बल दिया उन्होंने व्यक्तिगत लाभ और हानि के विचार से ऊपर उठकर देश में धर्म की स्थापना और पुनरुत्थान के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया ।
किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी संस्कृति और सभ्यता से होती है। इतिहास में भारत की संस्कृति को ह्रास करने वाले तमाम आक्रांताओं ने, सनातन सभ्यता की पहचान देवालयों,मन्दिरों और मठों को निशाना बनाया और इन्हें क्षत-विक्षत किया ।
अहिल्याबाई होल्कर ने ऐसे देश के प्रत्येक कोने में खंडित किए गए मंदिरों और देवालय का नवीनीकरण कराया । अहिल्याबाई होलकर आधुनिक भारत में उन विरले शासकों में एक हैं जिन्होंने भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए पूरी संपदा , क्षमता और सम्पूर्ण जीवन को समर्पित और निछावर कर दिया।
भगवान शिव की अनन्य भक्त होने के कारण उन्होंने लगभग सभी ज्योतिर्लिंगों का नवीनीकरण कराया और इनके सुलभ संचालन के लिए अत्याधिक अनुदान दिया । बाहर से आए तुर्की और मुगल जैसे तमाम आक्रांताओं के द्वारा जिन सनातनी स्थलों को लूटा गया उनमें सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों का देवी अहिल्याबाई ने पुनरुत्थान कराया चाहे वह काशी का महादेव विश्वनाथ मंदिर हो या सौराष्ट्र का सोमनाथ मंदिर । इन्होंने सुदूर हिमालय में केदार और बद्रीनाथ धाम के लिए सड़क का निर्माण भी कराया साथ ही दक्षिण के रामेश्वरम मंदिर में भी निर्माण कार्य के साथ अनुदान उपलब्ध कराया जो कि उत्तर से दक्षिण की धरती पर एक ही संस्कृति के प्रवाह के विश्वास को दर्शाता है ।
देवी अहिल्याबाई ने ऐतिहासिकता और धार्मिकता के संदर्भ से ही अपने प्रांत की राजधानी को इंदौर से नर्मदा के तट पर बसे शहर महेश्वर में स्थानांतरित किया और यहां पर अनेक धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं और संरचनाओं का निर्माण करवाया ।
अहिल्याबाई होल्कर ने आम जनमानस के उपयोग और सुलभता के लिए अनेक कुएं ,धर्मशालाएं ,शिक्षण संस्थान , रात्रि विश्राम स्थल, सड़कें आदि का निर्माण कार्य भी भरपूर मात्रा में करवाया । उन्होंने वाराणसी से कोलकाता के बीच एक लंबे सड़क मार्ग का निर्माण करवाया । देवी ने सामाजिक कल्याण के ऐसे अनेक निर्माण कार्यों को मालवा के साथ-साथ देश के अन्य भागों में भी गति प्रदान की ।
प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार सर जॉन मालकम अपनी पुस्तक "ए मेमोइर आफ सेंट्रल इंडिया : इंक्लूडिंग मालवा एंड एडज्वाइनिंग प्रोविंसेस"
में लिखते हैं कि "अपने राज्य के आंतरिक प्रशासन में अहिल्याबाई की सफलता बिलकुल आश्चर्यजनक थी, अपने सीमित क्षेत्र में वह सदैव शुद्धतम तथा सर्वाधिक आदर्श शासकों में से एक प्रतीत होती हैं " ।
देवी अहिल्याबाई होल्कर भारत की वह शासिका हैं जिन्होंने राज्य सत्ता को समाज के कल्याण का माध्यम मात्र ही समझा ना की विलासिता का । उनके शासन की सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि उन्होंने स्वयं को केवल ईश्वर के अंश मात्र के रूप में ही शासन का भागीदार कहा ,उनका यह मत था कि यह शासन, शक्ति और सत्ता शिव के हाथ में है ,शिव ही शक्ति और सत्ता के वास्तविक मूल हैं और वह स्वयं एक प्रतिनिधि मात्र । इसलिए उन्होंने सदैव अपनी शाही घोषणाओं में 'श्री शंकर' के नाम से हस्ताक्षर किये । अतीत में ऐसी उच्यतम धर्मपरायणता और कर्मयोग के उदाहरण अत्यंत अल्प ही मिलेंगे ।
शायद इसीलिए महान संत स्वामी परमहंस योगानंद जी ने उन्हें 'आधुनिक भारत की महानतम महिला' कहा । शास्त्रों में निहित है कि
सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥
अर्थात सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नही, इसलिए, तू धर्मपरायण बन ।
इसी मूल शास्त्रीय वाक्य को अपना ध्येय बनाकर जीवन जीने वाली और होलकर राज्य के शाही वाक्य "प्राहोमेशोलभ्या श्री: कर्तु: प्रारब्धात" (अर्थात सफलता उसे प्राप्त होती है जो प्रयास करता है ) को सार्थक एवं चरितार्थ करने वाली दैवीय महिला,पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर जी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन एवं सादर श्रद्धांजलि ।
लेखक, दिल्ली विवि में सहायक प्राध्यापक हैं