दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम ने वही दोहराया, जो उनके पूर्वजों ने किया

    दिनांक 04-मई-2020
Total Views |
ले. कर्नल (से.नि.) आदित्य प्रताप सिंह
जो इस्लामिक राष्ट्र संघ की शक्ति की धमकी जफरुल इस्लाम खान आज दे रहे हैं, वह काम उनके पत्र में लिखे नायक शाह वलीउल्लाह देहल्वी 1760 में हिंदुस्थान पर अहमद शाह अबदाली को आक्रमण करने के लिए निमंत्रित करके कर चुके हैं। अफगान शासक अबदाली को शाह वलीउल्लाह और बरेली के रोहिला नवाबों ने उस समय हिंदुस्थान की सबसे बड़ी सैन्य और राजनीतिक शक्ति, मराठा साम्राज्य के विरुद्ध जिहाद के लिए आमंत्रित किया था और हिंदुस्थान के सभी मुसलमानों के सहयोग का भरोसा भी दिया था।

a_1  H x W: 0 x
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम लेखक और पत्रकार हैं। देवबंद शिक्षित, इस्लाम के जानकार माने जाते हैं। यह इस्लामिक शिक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में उनकी कमजोरी भी है। इस्लाम की मान्यता लोकतन्त्र और अन्य धर्म एवं मत—पंथ विरोधी है। वह केवल दारुल इस्लाम या इस्लाम अपने आप में एक राष्ट्र है की विचारधारा में विश्वास करती है। वह लोकतान्त्रिक राष्ट्र राज्य की भौगोलिक सीमा रेखाओं में विश्वास नहीं करती। इस्लामिक वैश्विक भाईचारा इस मान्यता का मूल सिद्धान्त है। वैश्विक इस्लामिक खिलाफत इस्लाम की राजनीतिक परिकल्पना है। जो इस्लामिक राष्ट्र संघ की शक्ति की धमकी जफरुल इस्लाम खान आज दे रहे हैं, वह काम उनके पत्र में लिखे नायक शाह वलीउल्लाह देहल्वी 1760 में हिंदुस्थान पर अहमद शाह अबदाली को आक्रमण करने के लिए निमंत्रित करके कर चुके हैं। अफगान शासक अबदाली को शाह वलीउल्लाह और बरेली के रोहिला नवाबों ने उस समय हिंदुस्थान की सबसे बड़ी सैन्य और राजनीतिक शक्ति, मराठा साम्राज्य के विरुद्ध जिहाद के लिए आमंत्रित किया था और हिंदुस्थान के सभी मुसलमानों के सहयोग का भरोसा भी दिया था। 14 जनवरी, 1761 का पानीपत युद्ध और मराठा पराजय ने भारत का इतिहास बदल दिया। मराठा सैन्य और राजनीतिक पराभव ने ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को जन्म दिया। वह जिहाद भारत में उदय हो रही हिंदवी स्वराज के ध्वज वाहक हिन्दू शक्ति के विरुद्ध था। आज जफरुल इस्लाम का कथन कोई क्षणिक क्रोध की अभव्यक्ति नहीं अपितु हिंदुओं को उनके स्याह इतिहास को याद दिलाने का सुविचारित उपक्रम है।
 
इतिहास अपने आपको बार-बार दोहराता है। जो जफरुल इस्लाम आज कर रहा है, यह प्रक्रिया मध्ययुगीन जफरुल इस्लाम यानी उनके पूर्वज समय-समय पर करते आए हैं। भारत के अनेक मध्ययुगीन हिन्दू राज्य ऐसे ही जफरुल इस्लाम के जिहादी आवाहन से नष्ट हुए। यही इतिहास इस्लाम की जिहाद के आधुनिक प्रेरणा स्रोत हैं। कभी 19वीं सदी में एएमयू संस्थापक सैय्यद अहमद खान ने भी ऐसी ही वाह्य इस्लामिक शक्तियों की धमकी हिंदुओं को दी थी। इसका वर्णन डॉ बी आर अंबेडकर की पुस्तक “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया” में पढ़ा जा सकता है। खिलाफत आंदोलन के अगुवाकर अली बंधु भी 20वीं सदी में अफगानों को ब्रिटिश इंडिया पर आक्रमण के लिए आमंत्रित करते हैं। जफरुल इस्लाम के पत्र में मुहम्मद इकबाल या अल्लामा इकबाल का नाम भी इस्लामिक सभ्यता के निर्माता के रूप में लिखा है, जो जफरुल इस्लाम की इस्लामिक अलगाववादी विचारधारा का परिचायक है। क्योंकि इकबाल ही 1930 में पाकिस्तान की परिकल्पना करने वाले पहले व्यक्ति थे। भारतीय सभ्यता का विभाजन करने वाला व्यक्ति इकबाल जफरुल इस्लाम का आदर्श है। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष का आदर्श कट्टरपंथी जाकिर नायक है, जो भारत के विरुद्ध जिहाद का आवाहन करता है, जो भारत का एक वांछित अपराधी और भगौड़ा है।
 
जफरुल इस्लाम अकेले नहीं हैं इस जिहादी मुहिम में अपितु इस्लामिक संगठनों से लेकर मूढ़ वाममार्गियों की पूरी जमात उसके साथ है। वह तो मात्र प्रतीकात्मक आवाज़ हैं, उसका समर्थक तो पूरा जिहादी समुदाय है। लेकिन जफरुल इस्लाम जैसे भूल जाते हैं कि भारत न तो आज मध्ययुगीन सभ्यता में है और शक्ति विहीन है। क्या अरब देश अब भारत से 1970 और 80 के दशक वाली आर्थिक बढ़त रखते हैं ? क्या वह भारतीय अर्थव्यवस्था से कटकर भारतीय जिहादियों के लिए अपने देशहितों की बलि दे सकते हैं? जफरुल इस्लाम और उनके जैसे विश्व में अनेक कटृटरपंथी अभी भी इस्लाम की मध्ययुगीन ताकत और राजनीतिक प्रभुसत्ता के गुमान में हैं। वह अरबों की छाती पर बैठे इजरायल को बार-बार भूल जाते हैं, जो मात्र 92 लाख जनसंख्या और 20,770 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला राष्ट्र संयुक्त अरब सैन्य संगठनों को तीन बड़े युद्धों में परास्त कर चुका है। जो आज अरबों की घोर शत्रुता के बाद भी पश्चिमी एशिया की सैन्य महाशक्ति और सम्पन्न राष्ट्र है। जफरुल इस्लाम को इस लिखित राष्ट्रद्रोह के लिए सरकार द्वारा कठोर संवैधानिक दंड देना चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक राष्ट्रहित में आज अलगाववादी इस्लामिक विचारधारा पर अंकुश लगाने की नितांत आवश्यकता है।