समता के लिए सबको शिक्षा मिलना जरूरी: बाबासाहेब

    दिनांक 04-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 27 :-

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बाबासाहेब ने समाज को शिक्षा लो, संगठन करो और संघर्ष करो- का मूलमंत्र दिया। इस मूलमंत्र में शिक्षा का प्रथम स्थान है। दुर्भाग्य से उनका शिक्षा विषयक चिंतन, सुसंगठित रूप में, प्रबंध रूप में उपलब्ध नहीं है। वह अन्यान्य रचनाओं में बिखरा पड़ा है। सभा सम्मेलनों में और परिषदों में किए हुए भाषण, पत्रवांग्मय, नियतकालिकों में छपे लेख, शिक्षा संस्थाओं को दी भेंट, प्रांतिक या केन्द्रीय विधिमंडलों में तथा विश्वविद्यालयों में किए भाषण, अन्यान्य आयोगों के सामने दिए गए साक्ष्य आदि में ये विचार व्यक्त हुए हैं। शिक्षा का तत्वज्ञान, ध्येयवाद, शिक्षा का सामाजिक आशय, पाठ्यक्रम का स्वरूप और ध्येय, विद्यार्थियों का दायित्व, अध्यापकों की पात्रता, पाठशाला तथा महाविद्यालयों की जिम्मेदारी, शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण और उसकी मीमांसा, ऐसे अलग-अलग पहलुओं पर चिंतन के साथ-साथ उन्होंने गहरे उतरकर भाष्य किया है। प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालयों का कारोबार, साक्षरता, सार्वत्रिक शिक्षा की अनिवार्यता आदि बातों की भी उन्होंने चर्चा की है। अपने चिंतन में उन्होंने सिद्धांतों के साथ ही व्यावहारिकता को भी महत्व दिया है। बाबासाहेब का स्पष्ट मत था कि शिक्षा और समाज का एक अटूट रिश्ता है, क्योंकि शिक्षा ही समाज के सांस्कृतिक उन्नयन का आधार है। वे कहते हैं कि समाज अपना स्तर ऊंचा उठाने के लिए सामूहिक पद्धति से जो प्रयास करता है, वह शिक्षा है। समताधिष्ठित समाज निर्माण के लिए शिक्षा जैसा दूसरा साधन नहीं है। समता के लिए सबको शिक्षा मिलना जरूरी है। बाबासाहेब कहते हैं, ‘शिक्षा सामाजिक समानता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक शक्ति है।’ वे कहते हैं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता को अबाधित रखने और उसकी रक्षा के लिए काम आने वाली ताकत शिक्षा से ही प्राप्त होती है।