डॉक्टरों के फूटे सिर, गली की ख़ाक छानती पुलिस और इस्लामोफोबिया का मायाजाल, मरकज़ से शाहीनबाग़ तक एक ही पटकथा के हिस्से हैं

    दिनांक 04-मई-2020   
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कोरोना बीमारी एक कुटिल, आक्रामक, बीमार मानसिकता पर सवार होकर देश-दुनिया को दहला रही है। एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है, जिसकी आकांक्षाएं जिहाद की मध्ययुगीन मारीचिका की रेत में रोपी हुई हैं। डॉक्टरों के फूटे सिर, गली-गली की ख़ाक छानती पुलिस और इस्लामोफोबिया का मायाजाल, एक ही पटकथा के हिस्से हैं। दांवपेंच भी एक जैसे हैं। शक्लें बदलती हैं। नाम बदलते हैं

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कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी। बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं के समर्थन में पत्थरबाजी, हिंदुओं को न्याय दिलाने वाले सीएए क़ानून के विरोध में पत्थरबाजी, दिल्ली का दंगा और अब कोरोना से लड़ने वाले निस्वार्थ योद्धाओं पर पत्थरबाजी। इन सबमें एक समानता है-कट्टरपंथी राजनैतिक इस्लाम। पृष्ठभूमि में एक ही पटकथा चल रही है। एक ही मकसद पोसा जा रहा है, वो है इस ‘दारुल हर्ब’ को ‘दारुल इस्लाम’ में बदलना। एक ख्वाब जो सैकड़ों सालों से बेचा जा रहा है, और खूब बिक भी रहा है, वह है दुनिया में इस्लाम का परचम लहराना। शाहीनबाग़ हो या मरकज़, तबलीग हो या हुर्रियत, सब इसी के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। इनका एक पारिस्थितिकी तंत्र या इकोसिस्टम है जो इन सारे फसादों में सक्रिय रहता है, इन फसादों को गढ़ता है, संचालित करता है, गली-कूचों-कस्बों-नगरों और महानगरों में एक आक्रामक मानसिकता की अगुआई करके अपनी धौंस जमाता है, फिर अलग-अलग चेहरों द्वारा एक ख़ास तरह का विमर्श गढ़ता है और विक्टिम कार्ड के तेज़ाब से अपने ऊपर लगे दाग धो डालता है।
 
क़त्ल करो और चिल्लाओ कि “हमें मार डाला
इस विक्टिम कार्ड के खेल का लंबा इतिहास है। कश्मीर घाटी से हिंदुओं को खदेड़ा जाता है, नृशंस हत्याकांड और हिंदू महिलाओं पर पैशाचिक अत्याचार किए जाते हैं, फिर कश्मीर में “भारत”, “भारत की सेना” और “हिंदुओं” द्वारा किए गए अत्याचारों पर छाती पीटी जाती है। पाकिस्तान बांग्लादेश में 70 सालों तक हिंदुओं पर अत्याचार होता है। चुप्पी सधी रहती है। फिर भारत द्वारा एक निर्दोष क़ानून लाया जाता है, सीएए। जिसका एकमात्र मकसद सताए गए हिंदू—सिखों आदि को राहत देना। तब तूफ़ान खड़ा होता है और दुनिया में भारत द्वारा “मुसलमानों से किए जाए रहे भेदभाव” का झूठ फैलाया जाता है।

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दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में जमातियों द्वारा चिकित्सकों, नर्सों और पुलिस कर्मियों पर
थूकने की घटनाएं घटीं लेकिन “इस्लामोफोबिया” की बात कहने वाले इस पर मौन रहे
 
तरीके सधे हुए हैं। झूठ को बार-बार दुहराओ। सच को कितनी भी बार कहा जाए, उसे मत सुनो। हिंदुओं के पवित्रतम आस्था स्थलों पर खड़ी विदेशी हमलावरों की निशानियों का घमंड करो। इन ऐतिहासिक अपराधों को देखकर हिंदू का दिल कचोटे तो उसे अपनी जीत मानो, और जब हिंदू उसके लिए मांग उठाए तो हल्ला मचाओ कि नफरत और फिरकापरस्ती फैलाई जा रही है। प्रयाग को इलाहबाद बना रहने दो। अयोध्या को फैजाबाद बना रहने दो। हिंदुओं के सिरों की मीनार बनाने वालों का गुणगान करो। भारत की राजधानी में औरंगजेब के नाम पर सड़क का नाम रखो। और जब बदलाव किया जाए तो उसे ‘मुस्लिम विरोधी/ फासिस्ट’ कहो। तबलीगी पूरे देश को खतरे में डाल दें तो चुप रहो। और जब मीडिया तबलीगियों की करतूत जगजाहिर करे तो उसे ‘सांप्रदायिक पत्रकारिता’ और ‘गोदी मीडिया’ जैसे विशेषण दो। उसे मुसलमानों पर हमला करार दो। मौलवियों के वीडियो आएं कि रमजान की खरीददारी सिर्फ मुसलमान दुकानदारों से करो तो चुप्पी मार लो। इसका उल्टा वीडियो सामने आए तो दुनिया में तमाशा बनाओ। यही है वह विक्टिम कार्ड। अखिल इस्लामवाद के खिलाड़ी दशकों से इसका बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं।
 
मरकज़ का रोहिंग्याओं वाला राज़
 
जब रोहिंग्याओं या बांग्लादेशी घुसपैठ पर बात होती है तो मुस्लिम नेतृत्व के आलाप में केन्द्रीय स्वर वैश्विक इस्लामवाद ही होता है। उन्हें इलाज करने वाले डॉक्टर और सेवा करने वाली नर्सों से नफरत है लेकिन रोहिंग्या और बांग्लादेशी इनकी आंखों के तारे हैं। इसी सोच के तार दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन मरकज़ से जाकर जुड़ते हैं। और इस सोच पर सवार कोरोना वायरस दुनिया में कोहराम मचाता है।

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आखिर किसके दम पर कटृटरपंथी शरजील इमाम जैसे लोग देश के एक हिस्से को काटने की धमकी देते हैं ?
 
दिल्ली के तबलीगी मरकज़ के जमातियों ने खबरों में खूब जगह बनाई। सरे आम थूकते, पेशाब करते तबलीगियों की हरकतें सारे देश ने देखीं। लेकिन मरकज़ का एक राज़ तत्काल सामने नहीं आया और जब राज़ खुला तो दुनियाभर से आती कोरोना की लोमहर्षक तस्वीरों के पीछे छिप गया। खबर ये थी कि मरकज़ के उस बदनाम इज्तिमा में रोहिंग्याओं ने भी हिस्सा लिया था। चौंकाने वाली बात ये है कि दिल्ली के श्रमविहार और शाहीनबाग़ के कैम्पों में रहने वाले रोहिंग्या इसमें हिस्सा लेकर शरणार्थी कैम्पों में वापस नहीं लौटे बल्कि गायब हो गए। आशंका है कि ये देशभर की अनेक मस्जिदों में छिपे हुए हो सकते हैं। इनमें से अनेक पंजाब के डेराबस्सी और जम्मू में भी देखे गए। इसी तरह तेलंगाना के हैदराबाद के रोहिंग्याओं ने हरियाणा के मेवात के इज्तिमा में हिस्सा लिया और यहां से सीधे “इस्लाम की दावत” देने निकल पड़े।
 
भारत में इस समय 40 हजार रोहिंग्या मुस्लिम हैं, जिनमें से साढ़े सत्रह हजार संयुक्त राष्ट्र द्वारा शरणार्थी के रूप में दर्ज हैं अर्थात इनके पास संयुक्त राष्ट्र संघ का शरणार्थी कार्ड है। भारत सरकार को चिंता है कि तबलीगियों के साथ इज्तिमा करके निकले रोहिंग्या, कोरोना पॉजिटिव हो सकते हैं और देश की कोरोना से जंग को और कठिन बना सकते हैं। इसलिए गृह मंत्रालय ने राज्यों को पत्र लिखकर रोहिंग्याओं की कोरोना जांच करने को कहा है। यहां एक प्रश्न ये भी उठता है कि ये कैसे शरणार्थी हैं, जो शरणार्थी शिविरों से निकलकर तबलीग के इज्तिमा में पहुंच जाते हैं और वहां से गायब हो जाते हैं या मज़हबी प्रचार करते घुमते हैं ? इनमें से ज्यादातर के पास मोबाइल फोन भी नहीं हैं, जिससे इन्हें ढूंढना और पकड़ना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इनकी पहचान के लिए पुलिस के पास इनके उंगलियों के निशान हैं। लेकिन पहचान तो तब होगी जब वे पकड़े जाएंगे। जब एनआरसी को लेकर कई मौलाना बड़े मुखर थे, तब वे देश में जगह-जगह यही चीख रहे थे, “बांग्लादेशी हमारे भाई हैं। रोहिंग्या हमारे भाई हैं। हम पहले मुसलमान हैं, फिर उसके बाद और कुछ हैं।” सच यह है कि इस्लाम के नाम पर बांग्लादेशी और रोहिंग्याओं को भारत में बसाने के लिए शाहीन बाग़ गढ़ा गया था। उन्ही के लिए और उन्ही के दम पर शरजील इमाम पूर्वांचल को भारत से काटकर अलग करने की योजना समझा रहा था। आज उन्ही रोहिंग्याओं को लेकर जमात भारत में कोरोना बांट रही है। और कठमुल्ला-वामपंथी-छद्म सेकुलर गठजोड़ उसकी लीपापोती करने में विक्टिम कॉप्लेक्स का पत्ता चलने में लगा है।
 
“इस्लामोफोबिया” की नौटंकी
 
इस विक्टिम कार्ड का नया नाम है ‘इस्लामोफोबिया।’ देश-दुनिया कोरोना से जूझ रही है लेकिन यहां अलग ही दुनिया बस रही है। इस्लामी बिरादरी के नाम पर शरणार्थी बनकर आए रोहिंग्या तबलीग के इज्तिमा में पहुंच जाते हैं और वहां सारी दुनिया को इस्लाम के झंडे के नीचे लाने की कोशिशों का हिस्सा बनते हैं। इस दुनिया में भारत भी शामिल है। क्या इसीलिए इन्हें शरण देने की मांग उठाई गई थी ? मस्जिदों में विदेशी मुस्लिमों को हफ़्तों छिपाकर रखा जाता है। इज्तिमा होते हैं। और वहां से रोहिंग्याओं समेत दुनियाभर से आए ये तबलीगी गायब हो जाते हैं। सारे देश में पुलिस छिपे हुए जमातियों को ढूंढने के लिए ख़ाक छानती घूमती हैं डॉक्टरों और पुलिस पर मानवता को शर्मसार करने वाले हमले होते हैं। देश लाखों—करोड़ का नुकसान उठाता है। किसान, गरीब मजदूर, कामगार तकलीफ उठाते हैं। लेकिन मज़हब के ठेकेदारों की मोटी चमड़ी में कोई सिहरन नहीं होती। कट्टरपंथी राजनैतिक इस्लाम और उसका इकोसिस्टम गंभीर समस्या को गंभीरतम बना रहा है।
 
डॉक्टरों के फूटे सिर आपको परेशान करते रहें, लेकिन आप चुप रहें। यदि आपने आपत्ति की तो आप “इस्लामोफोबिया” फैलाने वाले यानी इस्लाम से लोगों को डराने वाले, घोषित कर दिए जाएंगे।
 
वास्तव में भारत कोरोना वायरस से नहीं कट्टर सोच और बंद दिमागों से लड़ रहा है, क्योंकि भारत में समय पर लॉकडाउन हो गया था। 25 मार्च को जब 135 करोड़ के देश में मात्र 600 कोरोना मरीज सामने आये थे, जिनमें से हर एक की यात्रा का इतिहास (ट्रेवल हिस्ट्री) मौजूद था, तब भारत ने 21 दिनों का लॉकडाउन लगा दिया। आज मई के प्रारंभ में ये संख्या 35 हजार को पार कर गई है, क्योंकि जाहिल जमातियों ने इसे देश के इस छोर से उस छोर तक फैला दिया है।
 
300 की आड़ में 3 लाख का घोटाला
लेकिन सच बोलना मना है। पटकथा के प्यादे तबलीग की सचाई सामने आने से भड़के हुए थे। फिर उन्हें एक बहाना मिला। खबर आई कि 300 जमाती कोरोना से ठीक होने के बाद इलाज के लिए अपना प्लाज्मा देने को तैयार हो गए हैं। वैसे तो प्लाज्मा थैरेपी कोरोना का कोई रामबाण इलाज नहीं है, उलटे ये रोगी के लिए घातक भी हो सकता है। आईसीएमआर ने इसके अत्यंत सीमित प्रयोग का निर्देश दिया है। फिर भी जो वास्तव में सहयोग देने के लिए आगे आए हैं, उनका उत्साहवर्धन होना चाहिए। लेकिन इन मुठ्ठीभर की आड़ में उस पाप को नहीं ढका जा सकता जो तबलीगी जमात ने किया है और करोड़ों लोगों को खतरे में डाल दिया है।

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कोरोना से लड़ रही पुलिस और चिकित्सकों पर हो रहे हमलों पर चुप्पी साधने वाले कौन हैं ?
 
ये लोग झूठ पर झूठ बोलते रहे। मरकज़ में रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद इन्होंने झूठ बोला कि “हम तो जाना चाहते थे, लेकिन लॉकडाउन के कारण फंस गए” सच ये है कि इन लोगों को काफी पहले प्रशासन का पत्र मिल गया था। लेकिन इन्होंने अपना इज्तिमा जारी रखा। इस बीच मौलाना साद कोरोना को अफवाह बतलाता रहा। इस दौरान ये लोग अपनी संख्या को लेकर भी पुलिस-प्रशासन से झूठ बोलते रहे। पहले हजार, फिर डेढ़ दो हजार और आखिर में बोले तीन हजार। अंत में पता चला कि वास्तविक संख्या 9 हजार के लगभग थी। लेकिन शर्म तो दूर, जब इनको वहां से निकाला गया तो ये लोग डॉक्टरों और पुलिस वालों पर थूकने लगे। बहुत सारे तो चुपचाप फरार हो गए, जिन्हें पुलिस अभी तक ढूंढ रही है और क्वारंटाइन कर रही है। इन लोगों के कारण देश भर में लाखों लोगों को क्वारंटाइन करना पड़ा है। इनमें 27 हजार से ज्यादा खुद तबलीगी हैं, जिनकी हरकतों की चर्चा मीडिया में आम है।
 
इन्होंने न केवल पूरे भारत में बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना बांटा। लीबिया, श्रीलंका, पाकिस्तान, मलेशिया, मालदीव, ब्रूनेई, इंडोनेशिया और ब्रिटेन तक, ये लोग वायरस लेकर गए। मलेशिया सरकार ने तो साफ़ कह दिया कि मलेशिया में कोरोना तबलीगी ही लेकर आए। दिल्ली मरकज़ से निकलकर एक जमाती फिलिस्तीन गया, और वहां का पहला कोरोना मरीज बना। फिलिस्तीन में कोरोना फैलाया। पाकिस्तान में तबलीगियों का तीन दिनी इज्तिमा हुआ था। वहां से एक जमाती थाइलैंड गया, उसका वीडियो सामने आया है। खाँसता, नाक पोंछता ये जमाती एक ट्रेन पकड़ता है और पूरे रास्ते लोगों पर थूकता जाता है और ट्रेन के अपने मुकाम पर पहुंचने के पहले उसी ट्रेन में मर जाता है। मलेशिया में 27 फरवरी से 1 मार्च तक तबलीगियों का इज्तिमा हुआ। 670 कोरोना मामले इसी इज्तिमा से निकले, जो दुनियाभर के देशों में गए। इंडोनेशिया में मध्य मार्च में इन्होंने इज्तिमा किया। कोरोना संकट के बीच पाकिस्तान में तब्लीगियों ने अपने इज्तिमा में ढाई लाख लोगों को इकट्ठा किया।
 
सनक के नखलिस्तान में जिहाद की खेती
 
तबलीगी जमात अकेली नहीं है, जो सातवीं शताब्दी के अरब के रेगिस्तान में जीती है। देवबंदी, अहले हदीस, अहले सुन्नत, जमात ए इस्लामी... सूची लंबी है। लेकिन केस स्टडी की दृष्टि से फिलहाल तबलीगी जमात पर ही चर्चा की जा सकती है। तबलीगी की जिन्दगी का मकसद दुनिया को मुस्लिम बनाना और मुस्लिम को सच्चा मुस्लिम बनाना। सच्चा मुस्लिम यानी टखनों तक ऊंचा पैजामा, घुटनों तक लंबा कुर्ता, बिना मूंछ की दाढ़ी। मरकज़ों में आपको पेशाब या पाखाने में ज्यादा पर्दा नहीं दिखाई देगा क्योंकि वहां हर चीज़ इस्लाम (हाँ, ये भी) के हिसा से हो ये देखा जाता है। एक थाल 4-5 साथ खाते हैं। इसलिए मरकज़ से इतने कोरोना मरीज़ निकल रहे हैं। वे परिवार नियोजन के खिलाफ बोलते मिलेंगे। बहुपत्नी प्रथा की दुहाई देते मिलेंगे। अरबी तौर तरीकों को अपनाने की सीख देते मिलेंगे। तबलीगी दुनिया के हर कोने में जमात बनाए किसी ‘अमीर’ की सरपरस्ती में घूमते मिलते हैं। ब्रुकलिन से लेकर बाली तक, सूरत से लेकर सहारा रेगिस्तान तक। ये दुनिया के लगभग सभी देशों में पाए जाते हैं। ये देवबंद को मानते हैं।

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शाहीन बाग में वही मजमा लगाए हुए थे जिन्हें बांग्लोदशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं का दर्द और उनके आंसू दिखते हैं ।
 
आज सबसे ज्यादा तबलीगी बांग्लादेश में हैं, फिर क्रमशः भारत, पाकिस्तान और मलेशिया में।एक तबलीगी दूसरे तबलीगी से इतना भाईचारा महसूस करने लगता है कि मुस्लिम समाज के कठोर जाति और मज़हबी (बरेलवी, वहाबी आदि) परिवारों में आपस में शादियां होने लगती हैं। पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश और दुनिया के दूसरे भागों में इस्लामी कट्टरता के प्रचार में इन लोगों ने बड़ी भूमिका निभाई है क्योंकि इनकी तबलीग 14 सौ साल पुराने अरबी तौर-तरीकों को मुसलमानों की जिंदगी में उतारने को लेकर है , जो अंततः जिहादी आतंकवाद को और जाकिर नाइक जैसे कठमुल्लों को ही खाद-पानी देती है। कश्मीरी आतंकियों में भी आपको तबलीगी मिलेंगे और लश्कर—ए—तैयबा में भी। यूरोप के भी अनेक जिहादी तबलीग की पृष्ठभूमि के थे।
 
जमात—ए—इस्लामी के उलट तबलीगी खुद को राजनीति से दूर बताते हैं, लेकिन रसूख खासा रखते हैं। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान में कोरोना संकट के मद्देनज़र ईरान से जियारत करके आने वाले शियाओं को तो सीमा पर रोक लिया गया लेकिन लाखों के मजमे सजा रहे जमातियों का कुछ न किया जा सका क्योंकि उनके शुभचिंतक पाकिस्तान के एस्टब्लिश्मेंट में परत दर परत घुसे हुए हैं। इन लोगों को पाकिस्तान में बेरोक-टोक घूमने की आज़ादी हैै। पकिस्तान के बाहर भी जाते हैं तो कोई पूछने वाला नहीं। इन्हें कोई पुलिस वाला रोक नहीं सकता। इसी धींगा-मुश्ती के दम पर इन्होने पाकिस्तान में लाहौर से कराची तक, खैबर, अंदरूनी सिंध से लेकर बलूचिस्तान और पीओके तक कोरोना फैला दिया। भारत में जिस तरह से कोरोना की रोकथाम में लगे हुए पुलिस और स्वास्थ्य विभाग पर पत्थर –लाठियां चलीं वैसे पाकिस्तान में भी चलीं; वहां तो तबलीगियों ने खूब छुरेबाजी भी की।
 
राष्ट्रीय बीमारी के पैरोकार

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 जमातियों ने केवल पूरे भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना बांटा। लीबिया, श्रीलंका, पाकिस्तान, 
मलेशिया, मालदीव, ब्रूनेई, इंडोनेशिया और ब्रिटेन तक, ये लोग वायरस लेकर गए।
 
अब ध्यान से देखिए। इन तबलीगियों की हिमायत कौन कर रहा है ? वही लोग जो शाहीन बाग़ की हिमायत कर रहे थे। कोरोना से लड़ रही पुलिस और चिकित्सकों पर हो रहे हमलों पर चुप्पी साधने वाले कौन हैं ? वही, जो कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार और कैराना पर चुप्पी साधे थे। कोरोना मरीज की सूचना देने पर या थूकने से मना करने पर की गई हत्या, को कौन लोग छिपा रहे हैं ? वही, जो अख़लाक़ पर बवंडर उठाते हैं पर गोतस्करों के हाथों मारे गए गोसेवकों और बीएसएफ के जवानों के लिए एक शब्द भी नहीं कहते। तबलीगियों की हरकतों को बताने से मीडिया को कौन लोग रोकना चाह रहे हैं ? वही, जो कुछ दिन पहले “असहिष्णुता” का रोना रो रहे थे। जो चिल्लाते रहते हैं कि 2014 के बाद से मीडिया के आज़ादी छीन ली गई है।
जमातियों ने केवल पूरे भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना बांटा। लीबिया, श्रीलंका, पाकिस्तान, मलेशिया, मालदीव, ब्रूनेई, इंडोनेशिया और ब्रिटेन तक, ये लोग वायरस लेकर गए।
 
आज भारत में तथाकथित “इस्लामोफोबिया” का दुष्प्रचार करने वाले कौन हैं ? वही जो कुछ दिन पहले सीएए को लेकर दुष्प्रचार कर रहे थे। कोरोना को लेकर इस तंत्र के अपने जुमले हैं, जो मौकापरस्त फितरत के चलते बदलते रहते हैं। जब कोरोना “काफिरों” के मुल्क जैसे इटली, अमेरिका, स्पेन में फैलने की बात हो तो वे ‘अल्लाह का अज़ाब’ (सजा) हो जाता है। जब मुसलमानों में फैलने की बात हो तो वह ‘मुसलमानों की आज़माइश’ हो जाती है। फिर इस आज़माइश को पूरा किया जाता है लॉकडाउन को धता बताकर, सामूहिक नमाज़ पढ़कर, इज्तिमा करके और पुलिस प्रशासन के साथ असहयोग और पत्थरबाजी करके।
 
समझना होगा कि गली मोहल्लों से लेकर, चमकदार न्यूज़ पोर्टलों तक, मज़हब में डूबा और सियासत में पिरोया, कहीं जकात पर पलता तो कहीं तनख्वाहों या नजरानों की सड़क पर सरपट भागता, ये एक अच्छी तरह गढ़ा हुआ तंत्र है। इसमें पत्थरबाज भी हैं, पत्रकार भी। इसमें मज़हबी नेता भी हैं और सियासी पिट्ठू भी। ये तंत्र बीमारी भी है और उस बीमारी का पैरोकार भी।