झूठ का बारूद

    दिनांक 04-मई-2020   
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समूचा देश चायनीज वायरस से लड़ रहा है, मगर देश के भीतर ऐसे भी कुछ तत्व हैं, जो आपदा की इस घड़ी में देश से लड़ रहे हैं। उन्होंने भीतर ही भीतर देश की एकता के विरुद्ध लड़ाई छेड़ रखी है। उनकी मंशा लोगों को आपस में लड़ाने की है। जनता के बीच अविश्वास और घृणा की खाई खोदने में व्यस्त ये लोग या समूह, जिनका दाना-पानी आजादी के बाद से उसी ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चल रहा है, जिस नीति को आधार बनाकर अंग्रेजों ने इस देश पर राज किया था। दूसरी ओर, इनके साथ वे लोग भी कदमताल कर रहे हैं, जिन्होंने अलग-अलग देशों में तख्तापलट की पटकथा लिखी और उसे ‘क्रांति’ का नाम देकर पूरी दुनिया को गुमराह किया।
आज की परिस्थिति विशेष है। लॉकडाउन में लोगों के स्व-नियंत्रण की परीक्षा हो रही है और इस बंद की कीमत चुकाकर भी पूरा देश जिस तरह स्व-नियंत्रण का परिचय दे रहा है, वह पूरी दुनिया के लिए उदाहरण है। ऐसे समय में भारत के भीतर लड़ाई छेड़ने का मंसूबा पाले बैठे लोग किसानों और मजदूरों के मन में एक चिंगारी पैदा करना चाहते हैं, ताकि उनके स्वार्थ का तंदूर गरम रहे। इन्होंने लंबे समय तक गरीब, गरीबी और वर्ग शोषण के नाम पर मलाई काटी है। उनके नेतृत्व का फलसफा यही है कि उनका नेतृत्व बना रहे। किसी को और कुछ मिला हो या नहीं, पर वे सत्ता की निकटता और मलाई प्राप्त करते रहे हैं। उन्होंने देश या दुनिया के किसी कोने में श्रमिकों का भला किया हो, ऐसा कोई ‘मॉडल’ नहीं दिखता है। आज उनके निशाने पर भारत का गरीब और मजदूर वर्ग है।
दरअसल, समाज की ‘फॉल्ट लाइन’ पर राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकने वाली इन दोनों धाराओं को लोगों ने पहचाना और नकार दिया है। लगातार दो आम चुनावों में लोगों ने यह बता दिया है कि भारत में अब विभाजनकारी राजनीति नहीं चलेगी, मगर मीडिया समूहों के भीतर अब भी ऐसी आवाजों के हित पोषक हैं, जो घटनाओं को जाति-धर्म, ऊंच-नीच के चश्मे से दिखाते हैं जिससे ये धाराएं वापस तंत्र की मुख्यधारा में आ जाएं। हाल के समय में कई बार ऐसे मौके आए जब औरों का घर जलाकर हाथ सेंकने वाले इन महारथियों का झूठ पकड़ा गया।
कुछ दिन पहले भदोही से एक खबर आई थी, जिसमें कहा गया था कि भूख से परेशान होकर एक महिला ने अपने पांच बच्चों को नदी में फेंक दिया, वह खबर झूठी थी। इसके बाद राजस्थान से एक खबर आई कि साधुओं के चिलम से 300 लोग संक्रमित हो गए। इसी तरह, एक और खबर फैलाई गई कि एक साधु की भूख से मौत हो गई, जबकि वह साधु जिस मंदिर व्यवस्था से जुड़े हुए थे, वहां दिन में 5-6 बार खाना मिलता है। ऐसी झूठी खबरों पर कार्रवाई हुई है, परंतु इस तरह लगातार आ रही ऐसी खबरें बताती हैं कि भूख को मुद्दा, भले झूठा ही सही, बनाने की पूरी तैयारी है।
भूख को ‘लॉकडाउन’ की उपज ठहराने की तैयारी तब है, जब भारत दुनिया के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है और इस देश का संवेदनशील समाज लगातार जरूरतमंदों की भरपूर मदद कर रहा है। गरीबों, वंचितों को खाना देने के लिए समूह, संस्थाएं और व्यक्ति आगे आ रहे हैं। पुलिस स्थान विशेष पर भोजन की आवश्यकता के आकलन और खाद्यान्न वितरण में मदद कर रही है। देश के बड़े-बड़े धार्मिक समूह लगातार लंगर चला रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, विश्व हिन्दू परिषद् हजारों-लाखों लोगों को खाना खिला रहे हैं। इस पूरी सकारात्मकता के बीच झूठी खबरें फैलाने और उनके पकड़ में आने से यह पता चलता है कि वास्तव में असलियत कुछ और है। उनके पास बताने के लिए एक भी सच्ची खबर नहीं है। ऐसे लोगों से हमें बहुत सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि केवल राजनीतिक तौर पर उन्हें बुहार देने से कुछ नहीं होगा।
भारत को बांटने की बात करने वाले अलग-अलग मचानों पर बैठे हुए हैं। उनके निशाने पर भारत है, इसकी एकता है। इन लोगों के मंसूबों को बेपर्दा करना बहुत जरूरी है। झूठ फैलाने वालों पर रासुका के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि ये लोग राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय सौहार्द को बिगाड़ रहे हैं। मीडिया के माध्यम से झूठ फैलाने वालों पर भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। जिस तरह से स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए सरकार ने एक फैसला लिया है, उसी प्रकार मीडिया में छद्म आवरण ओढ़कर भारत पर हमला करने वालों के लिए भी एक निर्णय लिया जाना चाहिए। अगर इन सब पर कार्रवाई नहीं हुई तो कोरोना से हमारी लड़ाई भी अधूरी रहेगी। हर आपातकाल में भारत के सामने जो ये विघ्नसंतोषी खड़े होते हैं, इनका समूल नाश किए बिना भारत में स्थायी शांति असंभव है।