भारत को सक्षम और समर्थ बनाने का समय

    दिनांक 04-मई-2020   
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चीन से आए एक वायरस से बदली दुनिया, लेकिन अब हम इस संकट को अवसर में बदलें, प्रकृति से संतुलन बनाकर आगे बढ़ें और विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न हो। कोरोना के बाद का समय भारत को सक्षम और समर्थ बनाने का है

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चीन की जमीन से आए एक वायरस ने पूरी दुनिया को थाम दिया है। वायरस प्राकृतिक है या मानव निर्मित, यह अभी बहस का विषय है। विश्व भर के लगभग 180 देश इस वायरस गिरफ्त में हैं। लाखों लोगों की असमय मृत्यु हो चुकी है। संकट बड़ा है, लेकिन इससे पार भी पाना है और निश्चित इसका भी कोई न कोई समाधान जरूर निकलेगा। अब आगे क्या? इस बात की क्या गारंटी है कि जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने की मनुष्य की प्रवृत्ति हो चली है, आगे कोई नया ऐसा वायरस नहीं आएगा। बात अब कोरोना की नहीं रह गई है, इस आपदा से हम कैसे निपटेंगे? उससे इतर हमें यह भी सोचना है कि आगे ऐसी परिस्थितियां न उत्पन्न हों, इस दिशा में काम किया जाए।
इस वायरस से आर्थिक और समाजिक समेत सभी तरह की गतिविधियां रूक गई हैं, लेकिन वहीं एक अच्छी बात भी हुई है, प्रकृति स्वयं को संतुलित कर रही है। नदियों का जल शुद्ध और निर्मल होकर बह रहा है। पशु-पक्षी चहचहाने लगे हैं। पक्षियों का कलरव अब सुनाई देता है। जंगली जानवर जंगल से निकल कर निर्भीक होकर शहरों की सीमा तक घूम रहे हैं। इस वायरस ने इस बात का आभास करा दिया है कि सारे संकट की जड़ में मनुष्य की अपरिमित इच्छाए ही हैं। इस संकट से उबरने के बाद हमें इसी बात पर जोर देना है कि कोरोना के बाद विश्व को दोबारा ऐसी परिस्थिति का सामना न करना पड़े। प्राकृतिक संतुलन बना रहे, स्थितियां समान्य रहें, विकास हो, लेकिन विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न हो, प्रकृति से उतना ही लें, जितनी आवश्यकता हो। पिछले दिनों हमने अनुभव किया है कि प्रकृति स्वयं को संतुलित करने में सक्षम है। यदि हम उसके संसाधनों का उपभोग करें तो स्वयं को संतुलित करने के लिए समय भी दें, ऐसा हमारा प्रयत्न होना चाहिए।
विश्व भर के संसाधनों पर कब्जा करने की होड़ और अपने वर्चस्व को निर्माण करने की प्रवृत्ति के कारण चीन को जो संयमित व्यवहार दिखाना चाहिए था, वह प्रश्नों के दायरे में है। रोग को छुपाना और विश्व भर में रोग न फैले, इसके लिए समय पर सचेत न करना, दोनों ही अपराध के श्रेणी में आने चाहिए। विश्व भर में रोग फैलने के बाद स्वास्थ्य संबंधित संसाधनों की बिक्री में घटिया माल देना, यह व्यापार बुद्धि का ही लक्षण है और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को बर्बाद करने की ही मनोवृति का परिचायक है।
दुनिया का सबसे समृद्धशाली देश अमेरिका कोरोना संक्रमण से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। स्वास्थ्य सेवाओं की उत्तम व्यवस्थाओं के लिए पहचाने जाने वाले यूरोपीय देश अपने नागरिकों को बचाने में अक्षम दिखाई दिए हैं। दुनिया के सभी देश, भले वे पूंजीवादी, साम्यवादी और समाजवादी, किसी भी व्यवस्था का अनुपालन करते हों, उन्होंने अपनी व्यवस्था में अर्थ को ही प्रधानता दी है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पहले आर्थिक संसाधनों पर कब्ज़ा जमाती है और बाद में राज्य पर कब्ज़ा करती है। पूंजीवाद और साम्यवाद स्वामित्व की भावना से ओत-प्रोत हैं। इस कारण उनका सारा व्यवहार शोषणवादी मानसिकता को जन्म देता है। हमारा ही वर्चस्व संपूर्ण विश्व में हो, इस मानसिकता से एक गलाकाट प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ है। प्रकृति के संसाधनों पर कब्जा करने की मानसिकता ने पर्यावरण पर संकट खड़ा किया है। प्रकृति के साथ अमानवीय व्यवहार के कारण पहले भी अनेक रोग जैसे स्वाइन फ्लू, सार्स, इबोला, मैडकाऊ आदि हम देख चुके है। आज का कोरोना संकट भी इस मानसिकता से ही उपजा है।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के अपने उद्बोधन में उल्लेख किया कि संकट को अवसर में बदलें और एक नए प्रकार की व्यवस्था का सृजन करें। उन्होंने कहा कि जैसे दुनिया ने योग को स्वीकार किया, वैसे ही हम इस समय आयुर्वेद को भी विश्व में स्थापित कर सकते हैं। आयुर्वेद आयु को बढ़ाने वाला और "सर्वे सन्तु निरामया:" (सभी निरोगी हो) का विचार करने वाला चिकित्सा शास्त्र है, जिसका उपचार अतिरिक्त प्रभाव (Side Effect) नहीं देता। इस समय अनेक विद्वान कहने लगे हैं कि अब हमारी व्यवस्था का आधार स्वदेशी होना चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था कि पश्चिम की व्यवस्था मनुष्य की आत्मा की महाशत्रु है। जब आज विश्व में नए सिरे से विचार करने की चर्चा चली है, तब भारतीय चिंतन के आधार पर मानव मात्र के कल्याण का विचार ही उस स्थान की पूर्ति कर सकता है।
आगे हमें अपने देश को सक्षम और समर्थ बनाना होगा। सामरिक तथा आर्थिक, दोनों ही दृष्टि से हमें शक्तिशाली होना है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हमारी व्यवस्थाएं विश्व मानकों के समकक्ष होनी चाहिएं। गत कुछ दिनों में सभी क्षेत्रों में अनेक योजनाएं आई हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में आयुष्मान योजना, रक्षा के क्षेत्र में शस्त्रों की खरीद, गरीब कल्याण के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन अभी के अनुभव से लगता है, इन क्षेत्रों में अभी और भी प्रयास होने बाकी हैं।
महात्मा गांधी ने कहा था कि स्वदेशी की हमारी भावना का अर्थ है – हमारी वह भावना, जो हमें दूर के क्षेत्र को छोड़कर अपने समीपवर्ती प्रदेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है। कोरोना संक्रमण में देश के सम्मुख प्रवासी मजदूरों का एक गंभीर विषय है, उनकी सुरक्षा और भोजन व्यवस्था को लेकर सभी राज्य चिंतित हैं। वास्तव में हमको स्वदेशी और विकेंद्रित इस प्रकार की अर्थव्यवस्था खड़ी करनी होगी, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और रोजगार, दोनों हो सकें। रोजगार का विचार करते समय, हमें विचार करना होगा कि रोजगार के लिए व्यक्ति को अपना घर और परिवार छोड़ना न पड़े। उत्तर प्रदेश सरकार का 'One District One Product' उस दिशा में एक कदम है। इससे स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन हमें इतने पर ही संतुष्ट होने के बजाय और छोटे स्तर पर संकुलशः विचार करना चाहिए। घर से अधिक लंबे समय दूर रहने के कारण परिवार से अलगाव, वृद्ध माता-पिता की सेवा से दूरी और सामाजिक विघटन जैसे दोष निर्माण होते हैं। इसलिए महान विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि रोजगार की व्यवस्था ऐसी हो कि व्यक्ति कार्य करने के बाद रात्रि को अपने परिवार में आ सके।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों में उल्लेखित प्रकृति, विकृति और संस्कृति की चर्चा की है। जहां दुनिया ने विकृति और प्रकृति तक ही अपना व्यवहार सीमित किया, वहीं भारत ने अपने स्वभाव के अनुसार स्वास्थ्य सम्बन्धी सामग्री दुनिया के देशों को उपलब्ध कराकर संस्कृति निष्ठ व्यवहार का परिचय दिया है। दुनिया ने हमारे पीएम नरेन्द्र मोदी और भारत की जनता को "Thank You People Of India" कहकर भारत के व्यवहार की सराहना की है। भारतीय चिंतन में प्रकृति को मां मानने की जो दृष्टि है, वह हमारा संबंध वृक्ष, नदी और जीवों से जोड़ती है। "ईशावास्यमिदं सर्वं" के आधार पर हम सभी प्राणी जगत में एक तत्व का दर्शन करते हैं। इसलिए पृथ्वी हमारे लिए बाजार नहीं परिवार है। हम भोग नही, त्याग पूर्ण जीवन दृष्टि से युक्त है। हम शोषण नहीं, पोषण के पक्षधर हैं। हमारे संस्कार में विकार नहीं सहकार है। हम ईश्वर के प्रति विश्वासी है। इस कारण हम संकट में दूसरो के सहयोगी बनते हैं। तेन त्यक्तेन भुंजीथा अर्थात त्याग पूर्वक उपभोग, यह हमारी जीवन दृष्टि है। "त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् , ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्" अर्थात् कुल के लिए अपना, समाज और राष्ट्र के लिए कुल का तथा मानवता के लिए सर्वस्व त्याग हमारा जीवन आदर्श है।
आज मानवता के सम्मुख, जो संकट खड़ा है, उस संकट में हम और हमारा विचार ही मानवता को बचा सकता है। हम भारत वर्ष को शक्तिशाली बनाकर और अपनी संस्कृति का गौरव लेकर खड़े हो, यही समय की मांग है। अर्नाल्ड टॉयंबी ने कहा था कि भारत की उदारता और विशाल दृष्टि मानव की एकता की सिद्धि में उसकी विशेष देन होगी और मेरा विश्वास है कि विश्व की भावी पीढ़ियां संयुक्त मानव जाति के लिए इसे भारत की एक विशेष भेंट के रूप में स्वीकार करेंगी। आओ हम सभी इस कर्तव्य को पूर्ण करने का संकल्प लें।
( लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री हैं )