#चायनीज वायरस :कोरोना महामारी से जूझ रही दुनिया में भारत की संस्कृति का होता जयगान

    दिनांक 05-मई-2020
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प्रो. भगवती प्रकाश
 
कोरोना महामारी से जूझ रही दुनिया में भारत की संस्कृति का एक बार फिर जयगान हो रहा है। सब रोगमुक्त
रहें, सुखी रहें, इस भाव को लेकर भारत ने राहत का हाथ बढ़ाया है। हमारी यही थाती हमें विश्व में एक उच्च
स्थान देती है

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चायनीज कोरोना वायरस के विरुद्ध आज विश्व के 200 से अधिक देशों में एक अपूर्व एकजुटता व पारस्परिक सहकारिता विकसित हो रही है। इस नवस्फूर्त एकात्मता और पारस्परिक सहकार के समवेत स्वरों से, अन्तराष्ट्रीय स्तर पर एक नवीन वैश्विक चिति का विकास होगा। भारत ने मानवता के हित में कोरोना के विरुद्ध उपयोगी जिन 24 औषधियों व औषधीय घटकों के निर्यात की छूट देकर, 55 से अधिक देशों को कोरोना से संघर्ष में जो सहयोग दिया है, उस सहकारपूर्ण पहल को इस नवीन वैश्विक चिति के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है। विश्व के कई राष्ट्राध्यक्षों व जन-संचार माध्यमों ने इसकी प्रशंसा की है। देश के लिए आवश्यक होने पर भी, 30 से अधिक देशों के आग्रह को स्वीकारते हुए भारत ने वैश्विक संकट की घड़ी में 55 से अधिक देशों को इन औषधियों का निर्यात कर, मानवता के व्यापक हितों को प्राथमिकता देकर वैश्विक सहकार व मानवीय कर्तव्यबोध जनित ‘धर्म-पालन’ की उदात्त परम्परा का निर्वाह किया है।
 
वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव से उठे भारत के इस कदम की व्याख्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने भी इंटरनेट तकनीक के माध्यम से 26 अप्रैल को दिए अपने उद्बोधन में, बिना भेदभाव के सबके लिये काम करने की भारतीय वृत्ति को रेखांकित करते हुए ही कहा है कि सभी पीड़ित हमारे अपने हैं। यही भारतीय दर्शन विश्व स्तर पर भी अनुकरणीय है। भारत में जिन दवाइयों के निर्यात पर प्रतिबन्ध था, उसे हटाकर अन्य देशों को दवाइयां भेजने की उदार-वृत्ति के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि जो भी कुछ मांगेंगे, उनको वह देना हमारा स्वभाव है। उन्होंने मनुष्यों में भेद न करते हुए पीड़ितों को अपना मानकर उनकी सेवा करने की बात की। उन्होंने आगे कहा कि, हम सेवा किसी अहंकार की तृप्ति व कीर्ति-प्रसिद्धि के लिए नहीं करते हैं। समाज को अपना मानकर सेवा कार्य करते हैं, जिसका आधार ही समाज के प्रति अपनत्व की भावना है और सेवा का काम किसी पर उपकार नहीं है। यह अपने लोगों का काम है। हमारे एकात्म मानव दर्शन के पारम्परिक चिन्तन के प्रतिपादन में पं. दीनदयाल उपाध्याय ने देश व विश्व के स्तर पर जिस पारस्परिक संवेदना युक्त, चिति का महत्व बतलाया था, ये उस दिशा में आगे बढ़ने के ही सूत्र हैं।
संवेदना और संस्कार
आज के कोरोना संकट के अवसर पर भी समयोचित व प्रभावी लॉकडाउन व अन्य सुरक्षा उपायों के माध्यम से 130 करोड़ के देश भारत में बड़े पैमाने पर संक्रमण को रोककर सरकार ने जो वैश्विक प्रतिष्ठा व विश्वसनीयता अर्जित की है। वह प्रतिष्ठा व विश्वसनीयता भी भारत की सहकार की संवेदना एवं संस्कारों पर केन्द्रित वैश्विक चिति के विकास में सहयोगी सिद्ध होगी। विश्व को कोरोना से रक्षार्थ औषधियां सुलभ कराने से लेकर कोरोना की चिकित्सा हेतु औषधियों व टीकों के विकास में साझे अनुसंधानों में जो अग्रणी भूमिका निभाई है, वह भी हमारी उसी सहकार की उदात्त संस्कृति की ही अभिव्यक्ति है। पूर्व में भारत सरकार ने खाड़ी के देशों में चली हिंसा के दौर में एक दर्जन से अधिक देशों के नागरिकों को सुरक्षित निकाला था। अन्तरराष्ट्रीय सहकार की दिशा में संलग्न रह कर ही कोरोना वायरस को अलग करने की सफलता पाने वाले हम चौथे देश हैं। भारत को विश्व के सभी देश सम्मान के साथ देख रहे हैं।
अलग—थलग पड़ा चीन
इस बीमारी के विरुद्ध विश्व को अंधकार में रखने का दोषी चीन, आज दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। सम्पूर्ण विश्व एक स्वर अर्थात एक समवेत चिति से चीन को दोषी ठहरा रहा है। वैश्विक चिति में ऐसा मतैक्य किसी अन्य विषय पर कदाचित ही विकसित हुआ होगा। अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस पर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रस्ताव पर भी ऐसा ही मतैक्य दिखाई दिया था। भारत आज शेष देशों के साथ मिलकर कोरोना के विरुद्ध उनके संघर्ष में, उसकी चिकित्सा में और उसकी रोकथाम व टीके के विकास सम्बन्धी अनुसंधानों से लेकर अपने पूरे अभियान के सम्बन्ध में समग्र पारदर्शितापूर्वक जिस प्रकार सूचनाओं का आदान—प्रदान कर रहा है, उससे वैश्विक सहकार व सहयोग के वातावरण में एक नवीन वैश्विक चिति आकार लेगी।
 
चीन द्वारा इस वायरस को जैविक हथियार के रूप में उपयोग किये जाने के आरोपों की अनदेखी के बाद भी यह निर्विवादत: सत्य है कि चीन में इस वायरस का उद्गम 17 नवम्बर 2019 तक हो गया था। दिसम्बर के अन्त में इससे मानव मृत्यु भी घट चुकी थी और मध्य दिसम्बर 2019 तक हुनान के सामुद्रिक खाद्य बाजार के अनेक ग्राहकों व कर्मचारियों में इस वायरस का प्रकोप प्रकट हो चुका था। लेकिन, चीन इन बातों को छिपाता रहा। फरवरी 14 तक उसके 1700 स्वास्थ्यकर्मी भी संक्रमित भी हो गये थे। तब भी उसने अपने विधिक दायित्व का उल्लंघन करते हुए इन जानकारियों को षड्यंत्रपूर्वक छिपाए रखा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 'अन्तरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमनों' के अधीन ऐसे संक्रामक रोग की जानकारी अनिवार्यत: विश्व स्वास्थ्य संगठन को देने के लिए चीन विधानत: बाध्य था। इसलिए, सारी जानकारियों को छिपाने के लिए अन्तरराष्ट्रीय कानूनों के अधीन चीन, विश्व स्वास्थ्य संगठन और कोरोना प्रभावित 200 से अधिक देशों के प्रति उत्तरदायी व उनका दोषी है।
अन्तरराष्ट्रीय विधि के अधीन, इसकी क्षतिपूर्ति उससे कराई जाना विधि सम्मत है। अन्तराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमनों (इंटरनेशनल हेल्थ रेगुलेशन्स) के अनुच्छेद 6 के अधीन, किसी देश की सीमाओं में उपजे जन स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रत्येक जोखिम की सूचना 24 घण्टे की अवधि में विश्व स्वास्थ्य संगठन को देनी होती है। इन्हीं नियमनों के अनुच्छेद 7 के अधीन, स्वास्थ्य सम्बन्धी उस जोखिम का कारण व उद्गम कुछ भी हो, उसके उद्गम वाले देश को, उसकी सीमा में वैश्विक जनस्वास्थ्य के प्रति संकट की द्योतक प्रत्येक छोटी-बड़ी घटना के सम्बन्ध में, जो भी तथ्य उपलब्ध हैं वे अनिवार्य रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन को उपलब्ध कराने होते हैं।
चीन ने अपने इन दोनों ही वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है। इसलिए विश्व समुदाय द्वारा इसकी क्षतिपूर्ति के लिए चीन को बाध्य किया जाना विधि सम्मत है। वैश्विक चिति उस दिशा में अग्रसर होती भी दिखलाई देती है।

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लन्दन स्थित इण्टरनेशनल काउन्सिल आॅफ ज्यूरिस्ट्स के अनुसार भी चीन का इस प्रकार की क्षतिपूर्ति का असंदिग्ध दायित्व है। चीन का विश्व स्वास्थ्य संगठन के नियमनों के उलंघन का अपराध व दायित्व अत्यन्त गम्भीर है क्योंकि, आज तक भी चीन इस वायरस सम्बन्धी कई उपलब्ध जानकारियां छिपाए हुए है। वह इसकी जांच हेतु अन्य देशों के बहुपक्षीय निरीक्षकों को प्रवेश की अनुमति देने को भी तैयार नहीं है। 30 दिसम्बर 2019 को तो चीनी 'वुहान सेण्ट्रल हास्पीटल' के वैज्ञानिक ली वेन लियांग ने इस कोरोना वायरस के संकट की स्पष्ट शब्दों में चेतावनी ही दे दी थी। उसे व ऐसी सूचनायें देने वाले अन्य वैज्ञानिकों को तत्काल ही गिरफ्तार कर लिया था या बलात् चुप करा दिया गया। चार दिनों के उत्पीड़न के बाद ली को तो स्वयं अपने को झूठा बताने तक को बाध्य कर दिया गया था। इंटरनेट पर भी इस वायरस की कोई सूचनाएं साझा करने के विरुद्ध 1 जनवरी, 2020 को झिन्हुआ समाचार एजेन्सी के माध्यम से सभी नेटीजन्स (नेट पर सूचना साझा करने वालों तक) को कड़ी चेतावनी भी दे डाली।
दिसम्बर के अंत में विश्व को और भी गुमराह करने के लिए वुहान म्यूनिसिपल कमीशन ने जानबूझकर यह झूठ भी प्रसारित कर दिया कि इस रोग का 'मानव से मानव' में संक्रमण ही नहीं होता है। चीन के ही अनुचित प्रभाव में विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने 21 जनवरी को यह तक कह दिया कि इस वायरस का प्रभाव अत्यन्त हल्का (माइल्ड) है व यह पूर्ण रूप से नियन्त्रण में है। इसे षड्यंत्रपूर्ण दुष्प्रचार ही कहा जायेगा।
कोरोना महामारी के कारण विश्व के 100 से अधिक देशों में पूर्ण या आंशिक लॉकडाउन करना पड़ा। 35 लाख लोगों में संक्रमण, सवा दो लाख की मृत्यु, 25 करोड़ लोगों को रोजगार क्षति के साथ ही विश्व अर्थव्यवस्था को 100 खरब डालर की प्रत्यक्ष आर्थिक क्षति हुई है। इस क्षति की पूर्ति चीन से कराई जानी चाहिए और अन्यथा चीन पर सभी देशों को मिलकर सामूहिक रूप से आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने का निर्णय लेना चाहिये।

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भारत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्धारा 26 अप्रैल को 'मन की बात' के अन्तर्गत 'प्रकृति, विकृति और संस्कृति' की समीक्षा करते हुए विकृति की जो व्याख्या की उससे भी कहीं घोर पतनोन्मुख चीन की यह विकृति है। प्रधानमंत्री ने भी स्पष्ट किया था कि कोरोना जनित इस संकट की घड़ी में भारत ने कैसे दुनिया से मिल—बांटकर संकट का सामना करने की अपनी संस्कृति का परिचय कराया है। उन्होंने बताया कि प्रकृति, विकृति और संस्कृति की संकट की घड़ी में पहचान होती है। जब हम अपनी वस्तु के बारे में कहते हैं कि, ये मेरी है, तो इस स्वाभाविक भावना को प्रकृति कह सकते हैं। लेकिन जो अपना नहीं है, उसे छीनकर उपयोग में लाना विकृति है। प्रकृति और विकृति से ऊपर उठकर सोचना संस्कृति है। अपनी चिंता छोड़कर अपने हक के हिस्से को भी बांटकर, किसी दूसरे की जरूरत पूरी करना हमारी संस्कृति है। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि पिछले दिनों भारत ने अपनी इसी संस्कृति के अनुरूप संकट की घड़ी में दुनिया के समृद्ध देशों सहित अन्य देशों के लिए दवाओं के संकट का निवारण किया। अभी, अगर भारत किसी को दवा न देता, तब भी कोई भारत को दोषी नहीं मानता। हर देश समझता है कि भारत के लिए अपने नागरिकों का जीवन बचाना भी प्राथमिकता है। लेकिन, भारत ने अपनी संस्कृति के अनुरूप विश्व के हर जरूरतमंद तक दवा को पहुंचाने का बीड़ा उठाया और मानवता के लिए इस काम को करके दिखाया। इसलिए सभी देश भारत का धन्यवाद कर रहे हैं। जब भी प्रधानमंत्री की अन्य राष्ट्राध्यक्षों से बात होती है तो वे आभार व्यक्त करते हुए 'थैंक्यू इण्डिया', 'थैंक्यू पीपुल्स आॅफ इण्डिया' कहते हैं। हमारी इसी विश्व-मंगल से प्रेरित, 'सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणी पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत' और वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति को विश्व भर में बढ़ाना होगा।
बढ़े सहकार का भाव
वर्तमान कोरोना संकट के बाद विश्व की चिति में दिखाई दे रहे परस्पर सहकार एवं साझेपन को बढ़ाया जाना आवश्यक है। श्री भागवत ने कहा है, ‘हम स्वयं अच्छे बनें और अपनी अच्छाई का उपयोग करके जग को भी अच्छा बनायें’ यही भावना नवीन वैश्विक चिति का आधार बन सकेगी। हम सतत सेवा कार्य इसलिए करते हैं कि अपने पवित्र समाज का संरक्षण और उसकी सर्वांगीण उन्नति के लिए हम प्रतिज्ञाबद्ध हैं। इसलिए नागरिक अनुशासन की पालना, स्वावलम्बन, स्वदेशी, कुटुम्ब में संस्कारों का संवहन, पर्यावरण चेतना और योग व आयुर्वेद आदि से अपनी रोग—प्रतिरोधक क्षमता का संवर्द्धन करना होगा। ये सभी अब हमारी राष्ट्रीय वैश्विक चिति में अंकित हो रहे हैं। हमारे इन्हीं संस्कार मूलक तत्वों की ओर समग्र विश्व उन्मुख हो रहा है। वह योग, आयुर्वेद सहित प्रचीन भारतीय वाङ्गमय में आज विश्व जीवन की प्रमुख समस्याओं का समाधान खोज रहा है। इसलिए वैश्विक सहकार के समवेत स्वरों के साथ भारतीय आचार-विचार और स्वस्थवृत्त के सिद्धान्त, परिवार चिन्तन, इन्द्रिय निग्रह, उपभोग पर अंकुश, पर्यावरण चेतना, उच्च नैतिक मूल्यों का अधिकाधिक अंतर्क्षेप वैश्विक चिति में होता दिखाई देता भी है। इससे एक सहकार व संवेदना आधारित विश्व व्यवस्था की रचना हेतु प्रयास किये जाने आवश्यक हैं।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)