...तो इसलिए चुप हैं ‘मैडम’

    दिनांक 05-मई-2020
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नीरज चंद्र पंत
पालघर हत्याकांड पर सोनिया गांधी की चुप्पी से अनेक लोग चकित हैं। आखिर इस चुप्पी के पीछे कारण क्या हैं?
  
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गत दिनों महाराष्ट्र के पालघर जिले में जूना अखाड़े के दो साधुओं कल्पवृक्षगिरी जी महाराज और सुशीलगिरी जी महाराज एवं उनके चालक निलेश की हत्या हो गई। हत्या स्थल डहाणु तहसील में है, जो बरसों से माकपा और ईसाइयों का गढ़ बना हुआ है। इस हत्या पर तो किसी भी सेकुलर ने दु:ख तक नहीं जताया। यहां तक कि कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी इस पर कुछ नहीं बोला। उनकी इस चुप्पी को समझने के लिए इतिहास में जाना होगा।
हम सबको पता है कि राजीव गांधी की मृत्यु के बाद सोनिया ने भारतीय राजनीति में पदार्पण तो किया, पर लोगों ने उन्हें विदेशी मूल का मानकर उतना ही महत्व दिया, जितना कि जरूरी था। सीधे शब्दों में कहें तो भारत के लोगों ने उन्हें अंतरमन से स्वीकारा नहीं। बरसों तक खामोश रहकर सोनिया ने भारतीयों के मन में पल रही इस अस्वीकृति को समझा। इसके बाद उन्होंने भारतीय राजसत्ता को प्रत्यक्ष रूप से संभालने का विचार मन से निकाल दिया और कांग्रेस पार्टी पर कब्जा करने का मन बनाया। इसके लिए उन्होंने ताना-बाना बुनना शुरू किया और एक दिन तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीतराम केसरी को धकिया कर कुर्सी से उतार दिया और खुद ही कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बन गईं।
 
इसके बाद उन्होंने अपनी एक चौकड़ी का निर्माण किया, जिसमें अधिकतर सदस्य ईसाई और कुछ सदस्य मुस्लिम थे। जैसे अम्बिका सोनी, मार्गेट अल्वा, अहमद पटेल, ए. के. एंटोनी आदि। इसी टीम के जरिए सोनिया ने कांग्रेस पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली और जब 2004 में संप्रग की सरकार बनी तो वह हर तरह से मजबूत हो गईं।
पार्टी और सरकार दोनों को वह चलाने लगीं। उन्होंने अपने फैसलों में यह ध्यान रखा कि कैसे भारत में ईसाई मत फले-फूले। उन्होंने अम्बिका सोनी, जो ईसाई हैं, को कांग्रेस की महासचिव बनाकर उनकी ताकत को बढ़ा दिया। आस्कर फर्नांडीस का भी कांग्रेस में कद एकदम ऊंचा कर दिया गया। उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी गई। मार्ग्रेट अल्वा को कई राज्यों का राज्यपाल बनाया गया।
 
केंद्रीय मंत्री ए. के. एंटोनी परोक्ष रूप से कर्नाटक कांग्रेस को चलाने लगे। अहमद पटेल का कद तो सबको पता है। इस काल में उन कांग्रेसियों की घोर उपेक्षा की गई, जो थोड़े-बहुत भी भारतीय संस्कृति से लगाव रखते थे। गैर-राजनीतिक, लेकिन घोर हिंदू विरोधी ईसाइयों को भारत सरकार ने सोनिया गांधी के कहने पर विभिन्न महत्वपूर्ण समितियों में जिम्मेदारी दे दी।
 
वलसन थम्पू, जिनका वर्षों का शोध कार्य ईसाई केंद्रित रहा है, उन्हें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् में पाठ्यक्रम की समीक्षा के लिए नियुक्त किया गया। इन्होंने पाठ्यक्रम से भारत की परम्पराओं, महापुरुषों एवं संस्कृति की छुट्टी कर दी। सेकुलर जॉन दयाल को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् का सदस्य बनाया गया।
 
जॉन दयाल, दिग्विजय सिंह, पी. चिदम्बरम, सुशील कुमार शिंदे जैसों ने ही ‘हिदू आतंकवाद’ जैसा शब्द गढ़ा। कांचा इलैया जैसे हिंदू विरोधी को भी सोनिया ने बढ़ावा दिया। कांचा ने भारत में जातीय व्यवस्था एवं उसकी कमियों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया। उन्होंने दलितों को ईसाई बनने के लिए भी प्रेरित किया। उनका साथ देने के लिए अजीत जोगी, प्रणव रॉय और अरुंधति रॉय को जोड़ा गया।
एक आंकड़े के अनुसार संप्रग सरकार के कार्यकाल में 4,000 से अधिक विदेशी ईसाई मिशनरी भारत के विभिन्न राज्यों में कन्वर्जन का कार्य कर रही थीं। अब जब साधुओं की हत्या का आरोप ईसाइयों और वामपंथियों पर लग रहा हो, तब भला सोनिया क्यों कुछ बोलें।
(लेखक पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में शोधार्थी हैं)