भारत ने कोरोना प्रबंधन में अन्य देशों के मुकाबले किया है बेहतर प्रदर्शन

    दिनांक 05-मई-2020
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प्रो. बृज किशोर कुठियाला
भारत ने कोरोना प्रबंधन में अन्य देशों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका कारण है कि भारत ने महामारी की मारक क्षमता को न केवल जल्दी भांपा, बल्कि बिना समय गंवाए बचाव के उपाय शुरू कर दिए। खास बात यह है कि दूसरे देशों की नकल करने के बजाए भारत ने इसके लिए स्वदेशी समाधान निकाला

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कोविड-19 के संक्रमण से निपटने के लिए दुनिया के किसी भी देश के पास कोई तैयार मॉडल नहीं था। इस नए विषाणु के संक्रमण और इसके कारण नागरिकों की मृत्यु से कोई भी देश बचा नहीं है। जिन देशों के बारे में यह माना जाता था कि वहां के नागरिकों को सबसे अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं, वहां न केवल संक्रमितों की संख्या अधिक है, बल्कि कोरोना वायरस के कारण मरने वालों की संख्या भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ी हुई है। प्रति दस लाख नागरिकों में करोना वायरस के कारण मृत्यु दर देखें तो बेल्जियम में 490, स्पेन 442, इटली 384, फ्रांस 296, इंग्लैंड 228, अमेरिका 118 है। यह सब तथाकथित विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा केवल 0.4 है। अपने-आप और अपने ही अनुभव व विवेक पर आधारित रणनीति के सफल होने का ही प्रमाण है कि कुछ वैश्विक स्तर के विद्वानों की भविष्यवाणियां झूठ साबित हो गईं, जिनमें उन्होंने अप्रैल में ही लाखों भारतीयों के मरने का डर पैदा किया था।
ऐसा लगता है कि चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन की मिलीभगत से इस अप्रत्याशित आपदा से निपटने के लिए कोई प्रभावी रणनीति भी वैश्विक स्तर पर नहीं बन पाई। हर देश ने अपने-अपने तरीके से महामारी को रोकने का प्रयास किया। यहां तक कि करोना वायरस से संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए भी सहमति बनने के बजाए वैश्विक स्तर पर डॉक्टरों की घोर मत-भिन्नता सामने आई। चीन को पिछले पांच महीनों का अनुभव हैं, लेकिन उसने इसे भी शेष विश्व से साझा नहीं किया है। इटली जैसे देश ने तो ‘हग चाइनीज’ जैसा अभियान चलाकर ‘आ बैल मुझे मार’ की कहावत को चरितार्थ कर दिया। उस देश के नेतृत्व को तो कोरोना के विषाणु के प्रसार में भी मानवाधिकारों का हनन नजर आया। अमेरिका ने तो चीनी विषाणु की मारक क्षमता को ही गंभीरता से नहीं लिया, जिसके परिणामस्वरूप आज वहां का नागरिक शेष विश्व के नागरिकों के मुकाबले सबसे अधिक असुरक्षित है।
महामारी से बचने के उपायों के विषय में इतना मतभेद है कि एक तरफ तो विश्व में मंदिर, चर्च और मस्जिदें आदि पूजास्थल बंद हैं, दूसरी ओर विभिन्न देशों में मस्जिदों में नमाज पढ़ने के लिए तन दूरी रखने के मूल उपाय को भी अमान्य करने का दुराग्रह है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की अकर्मण्यता के कारण इस महामारी से बचने या इलाज का कोई प्रोटोकॉल नहीं बन पाया और हर देश अपने-अपने ढंग से समस्या को कम करने और रोकने का प्रयास कर रहा है। अनेक देशों का नेतृत्व तो हतप्रभ है। पाकिस्तान जैसे अनेक देश तो कमजोर प्रशासन के कारण कुछ भी करने में असमर्थ हैं।
मार्च प्रारम्भ से अब तक के आंकड़ों को देखें तो यह निष्कर्ष उभर कर आता है कि भारत में न केवल संक्रमण की गति अन्य देशों की अपेक्षा कम हैं, बल्कि संक्रमित रोगियों का स्वस्थ होने की दर भी तुलनात्मक दृष्टि से बहुत अधिक है। कोरोना के कारण होने वाला मृत्यु दर भी विश्व में सबसे कम है। भारत द्वारा कोरोना प्रबंधन में अन्य देशों से बेहतर प्रदर्शन करने का कारण यह है कि भारत ने महामारी की मारक क्षमता को जल्दी भांप लिया और बिना समय गंवाए बचाव के उपाय करने प्रारम्भ कर दिए। इससे भी महत्वपूर्ण यह रहा कि अन्य देशों की नकल करने के स्थान पर भारत ने इसके लिए स्वदेशी समाधान निकाला। वैश्विक स्तर पर कितना भ्रम है इसका अनुमान जर्मनी के विदेश मंत्री की उस टिप्पणी से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि चीन ने तो करोना को तानाशाही के डंडे से हांका और अमेरिका की प्रतिक्रिया ढुलमुल रही। इन दोनों में से किसी एक को अनुकरणीय मॉडल नहीं माना जा सकता। भारत ने लगातार इस संकट से जूझने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने के प्रयास किए हैं। सार्क और जी-20 राष्ट्रों से औपचारिक विमर्श इसी लक्ष्य की ओर साहसिक कदम है।
एक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ के अनुसार, भारत ने प्रजातंत्र के मूल सिद्धांत का प्रयोग किया और लॉकडाउन को जनता के सहयोग और सहभागिता से सफल बनाया। जनता से सहयोग की अपील और सत्ता के अधिकार का अभूतपूर्व मिश्रण देखने को मिला। यह शुद्ध रूप से स्वदेशी नवाचार है। इन दिनों राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री के जितने भी संदेश हुए उनमें पहले स्थिति को समझाना, शासन के कार्यों की रिपोर्ट, कुछ करने का निवेदन और फिर प्रशासनिक निर्णयों की घोषणा की शैली स्पष्ट देखी जा सकती है। सभी मुख्यमंत्रियों के उद्बोधनों में भी कहीं आदेशात्मक शब्दावली नहीं थी। अनेक मुख्यमंत्रियों ने तो इस विपदा से निपटने के लिए राजनैतिक मतभेद को किनारे करके ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के विश्वास को साकार किया है। शासक जनता का मालिक नहीं, अपितु सेवक होता है, राजनीति का यह विचार शुद्ध भारतीय है, स्वदेशी है। प्रजा को समझा कर सामूहिक निर्णय लेकर प्रजाहित में कार्य करना, यह भी तो रामराज्य की ही नीति है। परिणाम स्वरूप कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग पूरा भारत लॉकडाउन के नियमों का स्वप्रेरणा से पालन कर रहा है। नेतृत्व का इतना अधिक अनुसरण मन से करने का उदाहरण केवल भारत में ही देखने को मिला। प्रजातंत्र का यह गुण आधुनिक नहीं है। सामूहिकता भारतीयों की धरोहर के संस्कारों में निहित है।
अब धीरे-धीरे हालात को सामान्य करने के प्रयास गति पकड़ेंगे। उद्योगों को क्रमश: चलाना है, व्यापार को खोलना है, शिक्षण संस्थाओं को सक्रिय करना है-कुल मिलाकर जीवन सामान्य करना है। यह सब करने के लिए भी हमें स्व-विवेक का ही लाभ उठाना है। अनेक तथाकथित विशेषज्ञ, देसी और विदेशी कंपनियां पश्चिम की तर्ज पर पुनर्निर्माण के क्रम में लाभ कमाने की चेष्टा में हैं। कोरोना लॉकडाउन के कारण जीवन ठहर गया है। शीघ्र ही इस जीवन को पुन: सक्रिय करने का अवसर आएगा। पश्चिम की दोनों मुख्य विचारधाराओं, पूंजीवाद और साम्यवाद, पर आधारित सामाजिक व्यवस्थाएं पूरी तरह खोखली और मानवता विरोधी सिद्ध हुई हैं। अवसर है कि गली-सड़ी और हानिकारक व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकें तथा नवनिर्माण में स्वदेशहित को सर्वोपरि रखें। वर्तमान के लिए यदि प्राचीन व्यवस्था से कोई लाभ मिलता हो तो लेने में संकोच न करें और जो आधुनिक विचार या ज्ञान देश के अनुकूल हो, उसका भी समावेश करें। भारत का स्वरूप भारतीय ही रहे, पश्चिम की कार्बन कॉपी फिर से न बनें। हम आपदा प्रबंधन के स्वदेशी उपायों को सफल बनाकर शेष विश्व के लिए अनुकरणीय आदर्श भी प्रस्तुत कर सकते हैं।
(लेखक हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं)