पालघर हत्याकांड: आखिर 'भगवा' से इतनी चिढ़ क्यों ?

    दिनांक 05-मई-2020
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संजीव उनियाल
 
लिंचिंग में बहुत सारे लोग एक साथ मिलकर किसी को मार देते हैं, पर पुलिस की मौजूदगी में नहीं। परंतु पालघर की घटना में तो २०० से ज़्यादा अराजक तत्व दो साधुओं व उनके चालक को पुलिस के सामने, पुलिस चौकी पर पीट—पीट कर मारते हैं। वीडियो देखकर तो ऐसा लगता है कि खुद पुलिस उन संतों को भीड़ के सुपुर्द कर देती है। यकीनन वहां जो घटा वह आजाद भारत का सबसे भयावह, ख़तरनाक व शर्मसार करने वाली घटना है।

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महाराष्ट्र के पालघर में 70 वर्षीय महाराज कल्पवृक्ष व 35 वर्षीय महाराज सुशील गिरी जी की हत्या इसलिए हुई कि उन्होंने भगवा धारण किया हुआ था। यह वही भगवा है, जो सम्पूर्ण भारतवर्ष का गुरु है, जो आर्यों की विजय पताका है, त्याग व शुचिता का संदेश देता है, लौकिक व आध्यात्मिक उन्नति का अभय प्रेरणा धाम है। भारत वर्ष की हज़ारों वर्ष पौराणिक सनातन परम्परा का वाहक है, इसी भगवा पताका को लेकर श्री रामचंद्र जी ने लंका पर विजय प्राप्त की थी। यही भगवा विक्रमादित्य, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी की विजय पताका थी और यही भगवा तुकाराम, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और आदि शंकराचार्य जी का मस्तक व वेश था। यह नहीं भूलना चाहिए कि पालघर वर्षों से कम्युनिस्टों एवं ईसाई मिशनरियों के बीच साठगांठ का अड्डा बना हुआ है। ईसाई मिशनिरयां भोले—भाले लोगों के कन्वर्जन में जुटी हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि साधुओं की हत्या के पीछे कौन सी ताकतें हैं। यकीनन यह घटना भयावह व शर्मनाक है।
पुलिस ने किया शर्मसार
लिंचिंग में बहुत सारे लोग एक साथ मिलकर किसी को मार देते हैं, पर पुलिस की मौजूदगी में नहीं। परंतु इस घटना में तो २०० से ज़्यादा अराजक तत्व दो साधुओं व उनके चालक को पुलिस के सामने, पुलिस चौकी पर पीट—पीट कर मारते हैं। वीडियो देखकर तो ऐसा लगता है कि खुद पुलिस उन संतों को भीड़ के सुपुर्द कर देती है। यकीनन वहां जो घटा वह आजाद भारत का सबसे भयावह, ख़तरनाक व शर्मसार करने वाली घटना है। इसे पुलिस सहायता से की गयी लिंचिंग भी कह सकते हैं। अभी तक जो निकलकर आया उसमें स्पष्ट हो रहा है कि सीपीएम नेताओं ने योजनाबद्ध तरीके से भीड़ को भड़काया। ज्ञात रहे कि यह वही क्षेत्र है जहां ईसाई मिशनरियां पिछले कई वर्षों से भोले—भाले वनवासियों का कन्वर्जन करने के काम में जुटी हैं।
घटना के बाद उठते सवाल
आज यह ज्वलंत प्रश्न देश के सामने है कि उन दो साधुओं का क्या अपराध था, जो उनकी व उनके चालक की पुलिस के सामने पीट—पीट कर हत्या की गयी ? क्या पुलिस कर्मियों को कहीं से फ़ोन गया था कि इन महात्माओं को उग्र भीड़ को सौंप दिया जाए ? क्या इस लिंचिंग को दबाने का प्रयत्न किया गया ? निश्चित ही इस घटना ने समूचे देश को झकझोरा है। इसलिए अपराधियों को शीघ्र ही कठोर से कठोर सज़ा देकर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए जिससे कोई भी व्यक्ति पवित्र ‘भगवा’ को कभी टेढ़ी निगाहों से देख तक न सके।
(लेखक उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता हैं।)