धर्म का लक्ष्य न्याय और शांति ही होता है: बाबासाहेब

    दिनांक 05-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 29 :-

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लोग जिसके द्वारा शासित होते हैं, वही धर्म है। धर्म और तत्वधान में फर्क होता है। धर्म का स्वरूप निश्चित है पर तत्वधान में कुछ भी निश्चित नहीं होता। दोनों एक-दूसरे के स्पर्धक जरूर हैं, पर विरोधी नहीं हैं।
धर्म सिर्फ सिद्धांत रूप में होता है, उसमें नियमों का कोई स्थान नहीं होता। जब धर्म नियमों का आधार बन जाता है, धर्म और कानून की मिलावट हो जाती है, और धर्म के नाम पर कानून की वकालत बलप्रयोग से की जाती है तो वह धर्म पूर्णत: नष्ट हो जाता है क्योंकि जवाबदेही लोकोत्तर नहीं रह जाती।
धर्म और कानून दो शक्तियां हैं, जो मनुष्य को नियंत्रित करती हैं। कभी-कभी दोनों में समन्वय होता है तो कभी-कभी दोनों एक-दूसरे को चेक और बैलेन्स भी करती हैं। दोनों में एक फर्क है: कानून ‘पर्सनल’ होता है, इसलिए वह भेद-भाव, अन्याय या विषमता को बढ़ावा दे सकता है। पर धर्म पूर्णत: ‘इम्पर्सनल’ होता है, जिसके कारण वह भेद-भाव, अन्याय और विषमता को पराजित कर सकता है। धर्म ढाल और तलवार दोनों ही रूप में एक बढ़िया साधन है।
राष्ट्र और कम्युनिटी धर्म से ज्यादा शक्तिमान हैं। जब न्याय की पुकार होती है, तब राष्ट्र और कम्युनिटी की सुरक्षा के हित धर्म को सुधार के लिए तत्पर होना ही पड़ता है। धर्म का लक्ष्य न्याय और शांति ही होता है।
धर्म शासन पर भारी होता है। धर्म मानवता के लिए अनिवार्य होता है। धर्म से हीन समाज का अन्त तय है। धर्म लोगों को इकट्ठा रखने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। धर्म ही लोगों की रक्षा करता है तथा अनुशासन सिखाता है। समाज में अगर उसकी नैसर्गिक एकरूपता के कारण एकरूपता नहीं है, तो वह समाज ही नहीं है। इसलिए धर्म मानवीय समाज का हृदय होता है।